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समाज

जर्मनी में लाखों लोग चर्च क्यों छोड़ रहे हैं?

क्रिस्टॉफ स्ट्राक
३० जून २०२०

जर्मनी में 2019 में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दोनों ही चर्चों के सदस्यों की संख्या में भारी गिरावट आई है. फिर भी जर्मनी में धर्म और धार्मिक प्रभाव एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं.

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जर्मनी में चर्च पर कोरोना का असर
जर्मनी में घट रहे हैं चर्च जाने वाले श्रद्धालुतस्वीर: Imago Images/Eibner

जर्मन के दो बड़े ईसाई चर्चों के सदस्यों की संख्या में काफी समय से गिरावट आ रही है. लेकिन 2019 में चर्च छोड़ने वाले ईसाईयों में प्रोटेस्टेंटों की तुलना में कैथोलिकों की संख्या कहीं ज्यादा थी. कुल मिलाकर 5,40,000 लोगों ने चर्च से किनारा कर लिया. 1990 के दशक की शुरुआत से अब तक कभी चर्च के सदस्यों की संख्या में इतनी गिरावट नहीं देखी गई.

जर्मनी की आधी से ज्यादा आबादी यानी 4.33 करोड़ लोग अब भी कैथोलिक या फिर प्रोटेस्टेंट चर्च के सदस्य हैं. लेकिन दस साल पहले यह संख्या लगभग 4.83 करोड़ थी. संख्या में गिरावट की एक वजह यह भी है कि मरने वाले चर्च के सदस्यों की संख्या बैपटाइज होने वाले सदस्यों से ज्यादा है.

आंकड़ों पर नजर

कैथोलिक चर्च से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि सदस्यता में गिरावट की दर 2018 में 26.2 प्रतिशत ज्यादा थी. सबसे ज्यादा गिरावट नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया और राइनलैंड प्लैटिनेट जैसे राज्यों में दिखी है जबकि इन राज्यों में म्यूंस्टर, ओस्नाब्रुएक, पैडरबोर्न, ट्रियर और कोलोन जैसे लंबी परंपराओं वाले ईसाई मठ मौजूद हैं.

वेटिकन में कुछ जर्मन पादरियों या फिर अमेरिकी मीडिया में कुछ पर्यवेक्षकों ने सदस्यता में गिरावट के लिए जर्मनी के कैथोलिक चर्च की आलोचना की है और इसके लिए वे जरूरत से ज्यादा उदारवाद को जिम्मेदार बताते हैं, लेकिन उनके लिए यह सब कहना बहुत आसान है.

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जर्मनी में चर्च छोड़ने वाले किसी भी व्यक्ति को अधिकारियों के सामने खुद को रजिस्टर कराना पड़ता है, इसलिए गिरावट के आंकड़े इतने स्पष्ट दिखते हैं. अन्य यूरोपीय देशों में भी चर्च के सदस्य घट रहे हैं लेकिन वहां सिर्फ चर्च में पहुंचने वाले लोगों की कम संख्या को देखकर ही इसका अंदाजा लगाया जाता है.

जो भी हो, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि जर्मनी के दो प्रमुख चर्च जनता को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं. इसके कई कारण हैं. एक है यौन उत्पीड़न से जुड़े मामले जो कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट, दोनों ही चर्चों की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं. एक अन्य वजह यह है कि कैथोलिक चर्च अब भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर मानने को तैयार नहीं है और इसके लिए परंपरा और धार्मिक सिद्धांतों की दुहाई दी जाती है.

कोरोना वायरस के नतीजे

कोरोना महामारी चर्च की सदस्यता में कमी को और बढ़ा सकती है. अभी तक कोरोना वायरस की पाबंदियों के कारण चर्च पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में पूरी निश्चितत्ता के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता है. लेकिन संभव है कि इसके साथ और ज्यादा लोग संगठित धर्म से विमुख हों.

यह स्थिति तब है जब कोरोना महामारी के इस दौर में आध्यात्मिक कल्याण चिंता का मुख्य कारण है, क्योंकि हर जगह भय और अकेलेपन की भावना है. लोगों के अध्यात्मिक कल्याण का मतलब यह नहीं है कि जोर जोर से मंत्रोच्चार किया जाए, बल्कि इसके लिए नियमपूर्वक चर्च की सर्विस कराने से आगे जाकर कदम उठाने होंगे. इसके लिए हाशिये पर पड़े लोगों के करीब जाना होगा, जिन्हें नाकामी हाथ लगी है या फिर जो निराश हो चुके हैं.

धर्म की महत्ता कायम

हमें यह समझने की गलती नहीं करनी चाहिए कि जर्मनी में चर्च की सदस्यता में कमी का मतलब है कि जर्मन लोग अब धर्म की परवाह नहीं करते हैं. प्रोटेस्टेंट चर्चों की संख्या बढ़ रही है. मिसाल के तौर पर हर रविवार को लाखों बैप्टिस्ट लोग पूजा अर्चना करने के लिए जमा होते हैं. दस लाख से ज्यादा ऑर्थोडोक्स ईसाई भी ऐसा ही करते हैं. इस बीच, जर्मनी के यहूदी और मुस्लिम समुदाय महामारी से देश के मुख्य चर्चों के मुकाबले बेहतर तरीके से निपटे हैं. इसके अलावा जर्मनी में छोटे छोटे बौद्ध समुदाय भी हैं.

क्रिस्टोफ श्ट्राक
क्रिस्टोफ श्ट्राक मानते हैं कि जर्मनी में धर्म की अहमियत लगातार बनी हुई हैतस्वीर: DW/B. Geilert

जर्मनी के बैप्टिस्ट, बौद्ध, ऑर्थोडॉक्स ईसाई, यहूदी और मुसलमान उस तरह से संगठित नहीं हैं जिस तरह प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक चर्च हैं. वे शायद ही कोई शैक्षणिक संस्थाएं चलाते हैं और ना ही उनका समाज पर यूनिवर्सिटी और अकादमिकों के जरिए उनका वैसा व्यापक असर है. फिर भी उनके समुदाय एक नेटवर्क और व्यापक परिवार की तरह काम करते हैं. क्या जर्मनी के चर्च ऐसा कर पाएंगे?

जीवन का मकसद

धर्म लोगों के जीवन को सार्थकता दे सकता है, भले ही वे अमीर हों या गरीब. इससे उन्हें एक पहचान मिल सकती है, खासकर ऐसे समय में जब हर कोई सार्वभौमिकता और वैश्विक खिलाड़ियों की बात कर रहा है और व्यक्तिगत तौर पर इंसान कुचला जा रहा है.

जर्मनी में, जहां एकीकरण के 30 साल बाद भी विभाजन है, जहां दौलत होने के बाजवूद गरीबी मिटी नहीं है, वहां लोगों को धर्म की जरूरत है, ईश्वर की जरूरत है.

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