बढ़ रही है टैटू की दीवानगी

टैटू की दीवानगी अक्सर युवाओं में देखी जाती है, लेकिन जर्मनी में यह चलन हर उम्र के लोगों में बढ़ रहा है, चाहे वे यूनिवर्सिटी में पढने वाले हों या दफ्तर जाने वाले. आखिर टैटू इन सब को इतना आकर्षित क्यों कर रहा है?

अफ्रीका और भारत में भले ही गोदने का रिवाज सदियों से चला आ रहा हो, पर पश्चिमी देशों में यह कभी भी संस्कृति का हिस्सा नहीं रहा. औरों की देखा देखी टैटू फैशन बन कर पश्चिम में पहुंच गया. जानकारों का मानना है कि जनरेशन वाय पहली ऐसी पीढी है जो टैटू के इस्तेमाल को मुख्यधारा में लाई. जनरेशन वाय यानी वे लोग जो 1980 से 2000 के बीच पैदा हुए हैं. इस से पहले पैदा हुए लोगों को जनरेशन एक्स और इसके बाद वालों को जनरेशन जेड के नाम से जाना जाता है.

बड़ी हस्तियों का हिस्सा

अमेरिका में हुई एक शोध में सामने आया कि इस आयुवर्ग में कम से कम 40 प्रतिशत लोगों ने अपने शरीर पर कहीं ना कहीं टैटू करवाया है. जर्मनी में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं. टैटू की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि कई बड़ी हस्तियों की पहचान ही उनके टैटू से होने लगी है. इसमें जॉनी डेप, रिहाना, एंजलीना जोली और सबसे बढ़ कर तो डेविड बेकहम हैं.

पहले कागज पर बनता है डिजाइन

भारत में भी बॉलीवुड की कई जानी मानी शख्सियतों ने अपने शरीर पर टैटू बनवाए हैं. मंदिरा बेदी ने अपनी पीठ पर एक ओंकार गुदवाया है तो ईशा देओल ने गायत्री मंत्र. साथ ही सैफ अली खान की बांह पर बेकहम के अंदाज वाला पत्नी करीना के नाम का टैटू कौन नहीं जानता.

'कूल' दिखने से बढ़कर

इन मशहूर हस्तियों को देख कर लोगों में भी इन्हें ले कर दिलचस्पी खूब बड़ी है. भारत में दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में कई टैटू पार्लर खुल गए हैं. टैटू उद्योग से जुड़े लोगों की मानें तो टैटू गुदवाना केवल 'कूल' दिखने से कई ज्यादा मायने रखता है.

गुइल जेकरी एक जानेमाने टैटू कलाकार हैं. इस्राएल में पैदा हुए गुइल ने पैरिस में कला की पढाई की और अब जर्मनी के कोलोन शहर में रिइनकारनेशन नाम का टैटू पार्लर चलाते हैं. गुइल का कहना है कि उनके कई ग्राहकों के लिए टैटू थेरेपी जैसा है, "कई लोग टैटू करवाते हैं क्योंकि यह उनके लिए बहुत जरूरी होता है, क्योंकि वे कुछ कहना चाहते हैं या फिर क्योंकि वे समाज के एक अलग तबके से जुड़ना चाहते हैं."

रिइनकारनेशन स्टूडियो में टैटू करते गुइल जेकरी

पिछले दस साल में खास तौर से महिलाओं में इनका चलन ज्यादा बढ़ा है. लाइप्जिग यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक शोध में बताया गया है कि 2003 से 2009 के बीच जर्मनी में टैटू करवाने वाली महिलाओं की तादाद दोगुना हो गयी है. मारिया मेदाना रिइनकारनेशन में टैटू बनाने की ट्रेनिंग ले रही हैं. उन्होंने खुद 15 साल की उम्र से ही टैटू करवाने शुरू कर दिए थे. वह कहती हैं कि उन्हें टैटू की यह बात लुभाती है कि वह हमेशा के लिए आपके साथ जुड़ जाता है, "आप अपने शरीर पर एक निशान बना लेते है. इस से पता चलता है कि आप हमेशा के लिए उस चीज से जुड़े रहना चाहते हैं."

ना उम्र की सीमा हो..

मारिया बताती हैं कि जर्मनी में टैटू के चलन के बारे में आप कोई व्यापक अनुमान नहीं लगा सकते, "सब लोग अलग अलग उम्र के हैं, अलग अलग पेशों से जुड़े हैं. कुछ लोग तो 50 या 60 साल के होते हैं, जब वे अपना पहला टैटू कराते हैं. यहां हमने सबसे अधिक उम्र वाले जिस व्यक्ति के लिए टैटू बनाया था वह 74 साल का था और वह उसका पहला टैटू था."

टैटू के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीनें

यह तो साफ है कि टैटू का उद्योग बढ़ रहा है और आने वाले समय में यह और विकास करेगा. यही वजह है कि कभी तंग गलियों में छिपी हुई दुकानों में जो काम होता था उसे अब बड़े बड़े टैटू पार्लर की शक्ल मिल गयी है.

पर जैसे जैसे यह काम बढ़ रहा है वैसे वैसे इसे बनाने वालों की जिम्मेदारी भी. टैटू की पूरी प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए नई तरह की तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है. गुइन कहते हैं, "आप त्वचा को छेद रहे हैं. यह आपके शरीर का भीतर से बाहरी दुनिया के साथ पहला संपर्क होता है. इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि यह एक जिम्मेदारी से भरा काम है."

रिपोर्ट: पावेल स्राज/ ईशा भाटिया

संपादन: आभा मोंढे

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