भारत की इंडोनेशिया के साथ नई निकटता

गुट निरपेक्ष आंदोलन के संस्थापक भारत और इंडोनेशिया विश्व मंच पर उसके अर्थहीन होने के बाद फिर से नजदीक आ रहे हैं. फ्रैंकफुर्टर अलगेमाइने त्साइटुंग कहता है कि राष्ट्रपति युधोयोनो का भारत दौरा उनकी नई एकजुटता को दिखाता है.

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति युधोयोनो इस साल भारत के गणतंत्र दिवस समारोहों में विशिष्ट अतिथि थे. कहा जा रहा है कि दौरे का लक्ष्य आर्थिक और व्यापारिक संधियां हैं, लेकिन दोनों देश राजनीतिक रूप से भी करीब आना चाहते हैं. अखबार लिखता है

एशिया के दोनों आबादी बहुल लोकतंत्रों में दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी रहती है, (इंडोनेशिया में 20 करोड़ से अधिक और भारत में 16 करोड़ से अधिक) और वे बहुधार्मिक हैं. दोनों राष्ट्रों ने पिछले सालों में भयानक बम हमलों को झेला है. मंगलवार को भारतीय प्रधानमंत्री सिंह और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति युधोयोनो ने आतंकवाद विरोधी संघर्ष पर एक संधि की, जिसमें खासकर अधिकारियों के बीच निकट सहयोग तय किया गया है. इसके अलावा नई दिल्ली और जकार्ता क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभुत्व पर चिंतित हैं. भारत और आसियान, जिसकी अध्यक्षता इस समय इंडोनेशिया कर रहा है, दोनों का ही बीजिंग के साथ सीमा विवाद है. दूरगामी रूप से चीन के पक्ष में होता शक्ति संतुलन उनकी बड़ी चिंता है. ये कोई संयोग नहीं था कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले साल भारत और इंडोनेशिया का दौरा किया था.

भ्रष्टाचार और करचोरी

भIरत अब एक नए घोटाले से जूझ रहा है. फ्रैंकफुर्टर अलगेमाइने त्साइटुंग का कहना है कि इसका नाम है करचोरी. अखबार के अनुसार 1948 से भारत ने धन के विदेशों में अवैध ट्रांसफर के जरिए 500 अरब डॉलर से अधिक की रकम खो दी है. किन लोगों के कितने पैसे विदेशी बैंकों में जमा हैं, उस पर बहस छिड़ गई है. अखबार लिखता है

यह बहस ऐसे समय में सामने आई है जब कई अन्य घोटालों ने भारत को झकझोर रखा है. संघीय मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रमुख पार्टी नेता, बैंकर, उद्यमियों और जनरलों पर इन घोटालों में शामिल होने के आरोप हैं. "इस समांतर अर्थव्यवस्था का सबसे अधिक लाभ राजनीतिज्ञ, अधिकारी और कारोबारी उठा रहे हैं, और उनकी मामलों को सुलझाने में कोई दिलचस्पी नहीं है," कहना है कि भारत की ब्लैक इकोनमी के लेखक प्रो. अरुण कुमार का. उनका कहना है कि भारत की ब्लैक इकोनमी सकल घरेलू उत्पादन का 50 फीसदी तक है. इसके साथ इस विकासशील देश का अरबों का टैक्स नुकसान हो रहा है, धन के अवैध ट्रांसफर से विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहा है और कर का नुकसान हो रहा है. ग्लोबल फाइनैंशियल इंटिग्रिटी संगठन के रेमंड बेकर चेतावनी देते हैं, "इसका असर भारत के गरीबों पर हो रहा है और आय की खाई बढ़ रही है."

बर्लिन से प्रकाशित टात्स ने भी अपने एक लेख में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है. उसका कहना है कि भ्रष्टाचार भारत को राजनीतिक संकट में डाल सकता है और आर्थिक विकास को जाम कर भारत की आर्थिक महात्वाकांक्षाओं को दशकों पीछे धकेल सकता है. अखबार लिखता है

अक्सर भारतीय राजनीतिज्ञ अपनी परियोजनाओं में देरी को उचित ठहराने के लिए लोकतांत्रिक बाधाओं का नाम लेते हैं. सड़क नहीं बन सकी क्योंकि किसान उसके लिए अपनी जमीन नहीं दे रहे, और भारत में उनपर कोई दबाव नहीं डाल सकता. लेकिन ये आम तौर पर आरामदेह झूठ होते हैं. असल में राजनीतिज्ञ और उद्यमी प्रोजेक्ट के लिए तय भारी सरकारी रकम को आपस में बांट लेते हैं, जिनका बाद में हुए काम से कोई लेना देना नहीं होता.

स्वतंत्र संस्थाओं की जरूरत

टात्स ने काम की गुणवत्ता पर नजर रखने वाली और आर्थिक अपराध की जांच करने वाली स्वतंत्र नियामक संस्थाओं के अभाव की शिकायत की है और लिखा है

लोकतंत्र के बावजूद असरदार विपक्ष का अभाव है. चुनाव के अलावा सरकार पर शायद ही कोई अंकुश है. देश का तेज तर्रार मीडिया भी अंततः बड़े औद्योगिक घरानों का है. ट्रेड यूनियनों का कोई असर नहीं है. अकेले सामाजिक आंदोलन राजनीति और उद्यमियों की आपराधिक साठगांठ को रोक नहीं सकते. फिलहाल परिवर्तन सिर्फ सत्ता केंद्र के अंदर से ही हो सकता है. सारी उम्मीदें नेहरू खानदान के राहुल गांधी और उनकी युवा पीढ़ी के कानून समर्थक राजनीतिज्ञों और विदेशों में प्रशिक्षित मैनेजरों की नई पीढ़ी पर है. लेकिन पुराने लोग कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं.

आत्मचिंतन से उम्मीदें

टात्स के विपरीत म्यूनिख से प्रकाशित ज्युड डॉयचे त्साइटुंग ने उम्मीद जताते हुए लिखा है कि भारत अपनी गलतियों को स्वीकार कर रहा है और खुले दिल से आत्मचिंतन कर रहा है.

भारत आर्थिक सुधारों के 20 साल बाद भी भ्रष्टाचार और सामाजिक विषमता जैसी खामियों को दूर नहीं कर पाया है. लेकिन कम से कम देश का एक हिस्सा अब उस पर आलोचनात्मक बात कर रहा है. 12 महीने पहले जब भारत ने अपने संविधान की 60वीं वर्षगांठ मनाई तो मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले अंग्रेजी अखबारों के समीक्षकों ने सवाल पूछा कि क्या मुल्क ने क्या संस्थापकों के आदर्शों को झुठला दिया है. उनका इशारा आर्थिक विकास के बावजूद जारी सामाजिक विषमता की ओर था. बहुत से लोग अभी भी एक डॉलर के कम दैनिक आय पर निर्भर हैं, जबकि एक भ्रष्ट वर्ग लगातार रईस बन रहा है. यही रवैया उसके बाद भी जारी रहा. कॉमनवेल्थ गेम्स भ्रष्टाचार के कई मामलों के रहस्योद्घाटन के साए में हुए. मीडिया ने गड़बड़ियों पर आक्रामक रुख दिखाया.

संकलन: आना लेमन/मझा

संपादन: ओ सिंह

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