भारत के एसी बढ़ा सकते हैं दुनिया की गर्मी

भारत में लगभग तीन करोड़ लोग एसी का इस्तेमाल करते हैं. 2050 तक यह आंकड़ा एक अरब के पार हो सकता है. इस एसी बूम को लेकर वैज्ञानिक चिंता जाहिर कर रहे हैं. लेकिन आम लोग कहते हैं कि उन्हें भी तो चैन की नींद चाहिए.

एक वक्त था जब रतन कुमार तपती गर्मी से छुटकारा पाने के लिए गीली चादरों पर सोते थे, तो कई बार रातों को नहाते भी थे. गर्मियों के दिन उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं होते थे लेकिन अब उनके लिए वक्त बदल गया है. अब वह भी हजारों लाखों लोगों की तरह गर्मी से छुटकारा पाने के लिए एसी का इस्तेमाल करते हैं.

भारत का एसी बाजार तेजी से बढ़ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक साल 2050 तक देश में एसी इस्तेमाल करने वाले तीन करोड़ लोगों का मौजूदा आंकड़ा एक अरब तक पहुंच जाएगा. इतना ही नहीं जनसंख्या के लिहाज से दुनिया का दूसरा बड़ा देश एसी कूलिंग का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी बन सकता है.

भारत दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाला बड़ा देश है, जहां हर साल 80 करोड़ टन कोयला जलता है. ऐसे में देश का एसी बूम स्थिति को और भी भयावह बना सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि एसी के इस्तेमाल के चलते बिजली की मांग को पूरा करने के लिए उत्पादन को तीन गुना करना होगा. इन सब बातों के बावजूद भारत के हजारों लाखों लोगों के लिए गर्मी में एसी का होना किसी राहत से कम नहीं है.

Indien Klimawandel l Daikin Air - Klimaanlagenhersteller

राजस्थान में रहने वाले 48 साल के रतन कुमार धोबी का काम करते हैं और महीने में 15 हजार रुपये तक कमा लेते हैं. कुमार ने हाल में अपने दो कमरे के घर में एसी लगवाया है. कुमार कहते हैं, "दिन भर कड़ी मेहनत के बाद रात में मेरे लिए चैन से सोना जरूरी है. मैं बहुत अमीर तो नहीं हूं लेकिन एक आरामदायक जिंदगी की ख्वाहिश जरूर रखता हूं." भारत में चार महीने भीषण गर्मी भरे होते हैं और हाल के सालों में तापमान में काफी वृद्धि दर्ज की गई है.

एसी की जरूरत

आज भारत के महज पांच फीसदी घरों में ही एसी का इस्तेमाल होता है. एसी इस्तेमाल की यह दर अमेरिका में 90 फीसदी तो चीन में 60 फीसदी है. लेकिन अब भारत का ऐसी बाजार तेजी से उभर रहा है. पिछले एक दशक में लोगों की आमदनी में जमकर इजाफा हुआ है जिसके चलते लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ी है.

विज्ञान

क्या है एस्बेस्टस

एस्बेस्टस ग्रीक भाषा का शब्द है. इसका मतलब होता है ऐसा पदार्थ जो आग नहीं पकड़ता. यह प्राकृतिक रूप से मिलने वाले सिलिकेट का एक प्रकार है. यह पदार्थ चट्टानों में मिलता है और इसकी खानें भी होती हैं. आग न पकड़ने की क्षमता के चलते इस रेशेदार मैटीरियल का इस्तेमाल निर्माण उद्योग में खूब किया जाता था. ये सीमेंट के साथ आसानी से प्रोसेस किया जा सकता है.

विज्ञान

छोटे रेशे

इस तस्वीर में एस्बेस्टस के सूक्ष्म रेशे नजर आ रहे हैं. ये केवल तीन माइक्रोमीटर मोटे होते हैं. ये पदार्थ घुलनशील नहीं होता इसलिए फेफड़ों में लंबे समय तक बना रह सकता है. शरीर के भीतर जाने के दशकों बाद भी यह रेशा फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारी पैदा कर सकता है.

विज्ञान

छूना मना

तस्वीर में नजर आ रहे इस लहरदार एस्बेस्टस को काटना, तोड़ना, ड्रिल करना और जमीन में डालना महंगा पड़ सकता है. जब तक इसे छुआ न जाए तब तक इसके रेशे का हवा में घुलने का खतरा नहीं होता. लेकिन इसकी सफाई करने में भी खतरा है. बिल्डिंग पर लगी काई को हाई प्रेशर वाले क्लीनर से साफ करने का मतलब भी खुद की सेहत के साथ-साथ प्रकृति के साथ भी खिलवाड़ हो सकता है.

विज्ञान

ऐसे गमलों से सावधान

फाइबर सीमेंट या एस्बेस्टस सीमेंट से बने इस गमले को देखिए. सीमेंट और एस्बेस्टस के तत्वों को मिलाकर ऐसे बिल्डिंग मैटीरियल बनाए जाते हैं. इस गमलेनुमा बॉक्स का इस्तेमाल आप जारी रख सकते हैं. अगर आप फावड़े या रेती से काम करते हैं तो इस सीमेंट के गमले को मत खरोंचे. इससे छुटकारा पाना चाहते हों तो सबसे अच्छा रास्ता है कि इसे फेंक दें.

विज्ञान

पाइप ब्लॉक

अगर आपके घर के एस्बेस्टस सीमेंट वाले पाइप में कचरा अटक गया है, या नाली ब्लॉक हो गई है तो साधारण प्लम्बर को बुलाने की बजाए विशेषज्ञों को बुलाइए. ऐसे मामलों में एस्बेस्टस को हटाने के सख्त नियमों को देखा जाना चाहिए, बेहतर है विशेषज्ञों को बुलाया जाए.

विज्ञान

जहरीला फ्लोर

इस तरह के फ्लोर-फ्लैक्स पैनल आजकल हर घर में मिल जाते हैं. इनमें से अधिकतर में एस्बेस्टस होता है. हालांकि यहां भी सुरक्षा, लैब टेस्ट के बाद ही सुनिश्चित की जा सकती है. फ्लोर पर इन पैनल को चिपकाने के लिए एस्बेस्टस युक्त पदार्थ का इस्तेमाल किया जाता है. इसलिए आप इसे निकालने की कोशिश भी न करें.

विज्ञान

सावधान रहें

अकसर फ्लोर कवरिंग में एस्बेस्टस यु्क्त कण होते हैं. अगर आपने फ्लोर फ्लैक्स को निकाल दिया है और आपको काला चिपकने वाला ग्लू मिला है तब भी सावधान रहिए. अधिकतर ग्लू में एस्बेस्टस मौजूद होता है. आप इसका कुछ न करें, जितना दूर रहें उतना ही अच्छा.

विज्ञान

एस्बेस्टस और हेयरड्रायर

एक वक्त था जब एस्बेस्टस का इस्तेमाल हेयर ड्रायर में ताप प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने और आग से बचने के लिए किया जाता था. 1970 के पहले बने अधिकतर हेयर ड्रायर में एस्बेस्टस का उपयोग होता था. तो अगर आप अब भी पुराने हेयर ड्रायर का प्रयोग कर रहे हैं तो उसे फेंक कर नया खरीद लीजिए.

विज्ञान

पुराने सामान से बचे

संभव है कि तस्वीर में नजर आ रही टोस्टर की ये डिजाइन एक बार फिर फैशन में आ जाए. अगर ऐसा होता भी है तो बेहतर होगा कि पुराना टोस्टर इस्तेमाल करने की बजाय, पुराने अंदाज का नया टोस्टर खरीद लिया जाए. पुराने टोस्टर में लगे तारों में एस्बेस्टस होता था जो नए में आपको नहीं मिलेगा. (फाबियान श्मिट/एए)

जापानी कंपनी डायकिन के भारत में प्रमुख कंवलजीत जावा कहते हैं, "यह अब कोई लक्जरी नहीं है बल्कि जरूरत बन गया है." डायकिन की राजस्थान में फैक्ट्री है जहां हर साल तकरीबन 12 लाख एसी तैयार किए जाते हैं. जावा कहते हैं, "एसी लोगों की कार्यक्षमता के साथ-साथ जीवन प्रत्याक्षा बढ़ाता है और हर कोई इसका हकदार है."

क्या है समस्या

आम लोग गर्मी से निपटने के लिए फ्रिज और एसी का इस्तेमाल करते हैं. वहीं ये इलेक्ट्रॉनिक आइटम ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों का उत्सर्जन करते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक एसी से निकलने वाली गैसें तापमान में इजाफा कर देती हैं.

भारत अपनी दो-तिहाई बिजली का उत्पादन करने के लिए कोयले और गैस पर निर्भर करता है. अक्षय ऊर्जा के लिए महत्वाकांक्षी योजनाओं के बावजूद देश आने वाले दशकों तक हाइड्रोकार्बन पर अत्यधिक निर्भर रह सकता है. ऐसे में भारत को एक मदद कम ऊर्जा खपत वाले एसी से मिल सकती है, जिसे अब डायकिन जैसी कंपनियां जोर-शोर से पेश कर रहीं हैं. हालांकि नई तकनीक अब भी महंगी है और उपभोक्ता पुरानी तकनीक से नई तकनीक पर स्विच करने में थोड़े धीमे हैं. हाल में भारत सरकार ने एक "सलाहकारी" निर्देश जारी करते हुए एसी निर्माताओं से कहा था कि बिजली की खपत को कम करने के लिए डिफॉल्ट सेटिंग को 24 डिग्री पर सेट किया जाए लेकिन इसे अनिवार्य नहीं बनाया गया है.

ग्लोबल वॉर्मिंग से बड़ी चिंताएं

जलवायु सम्मेलनों पर जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे मुद्दे जोर-शोर से उठाए जाते हैं लेकिन अब भी लोगों में इसे लेकर गंभीरता नहीं आई है. राजस्थान के एक दुकानदार राम विकास यादव कहते हैं, "लोगों को घर ठंडा रखने के लिए एसी की जरूरत है. लोगों की इस जरूरत ने उनकी बिक्री को तकरीबन 150 फीसदी तक बढ़ा दिया है." यादव कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में भी परिवार अब पारंपरिक तरीकों के बजाय इलेक्ट्रॉनिक सामानों पर विश्वास जता रहे हैं, जिनमें पंखा, कूलर आदि प्रमुख हैं. कुमार कहते हैं, "वैज्ञानिक ऐसी बातें कहते रहे हैं लेकिन हमें भी तो चैन की नींद चाहिए."

प्रकृति और पर्यावरण

बूझो तो जानें

इस तस्वीर को समझने के लिए इसे बहुत ध्यान से देखना होगा. आसमान से ली गई इस तस्वीर में सूखी जमीन पर एक पेड़ और कुछ दूरी पर एक जल कुंड देखा जा सकता है. ऑस्ट्रेलिया में अगस्त का वक्त गर्मी का नहीं, बल्कि सर्दी का होता है और सर्दी के दौरान भी बरसात की कमी के चलते भीषण सूखा पड़ सकता है.

प्रकृति और पर्यावरण

कैंसर जैसा

न्यू साउथ वेल्स का 95 फीसदी इलाका सूखे से प्रभावित है. यहां की एक किसान मार्गो वॉलेस्टन कहती हैं, "सूखा कुछ कुछ कैंसर जैसा होता है. वह आपको अंदर ही अंदर खाने लगता है. एक बार शुरू हो जाए तो और बुरा होता रहता है, आपकी ज़िन्दगी पर और असर करता है." तस्वीर उनके खेत पर पड़े एक पेड़ की है.

प्रकृति और पर्यावरण

कुएं के पास प्यासा

ये जमीन पर रखी अंगूठी की तस्वीर नहीं है, बल्कि पानी का टैंक है, जिसमें से कंगारू पानी पी रहा है. जानवरों पर सूखे का बेहद बुरा असर पड़ता है. सूखे के कारण जंगल में आग ना लग जाए, इस डर से युकलिप्टस के पेड़ों को काट दिया गया. लेकिन ये पेड़ ही कोआला भालुओं के घर होते हैं. अब वे कहां जाएं?

प्रकृति और पर्यावरण

मंगल की तस्वीर?

जमीन लाल जरूर है लेकिन ये तस्वीर मंगल ग्रह की नहीं है. खेत के बीचोबीच एक पानी का कुंड और तीन टैंक. जिम्मी मैकक्वेन के इस खेत पर 2010 के बाद से बरसात नहीं हुई है. उनके दादा ने 1901 में यहां खेती शुरू की थी. लेकिन इस बार जैसा नुकसान अब तक कभी भी नहीं हुआ था.

प्रकृति और पर्यावरण

थोड़ा सा खाना

सूखे के चलते फसल को भारी नुकसान हुआ है. एक किसान ने थोड़े बहुत अनाज को एक कतार में रख दिया है. यूं लगता है जैसे चींटियां एक दूसरे के पीछे चल रही हों. ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने एक अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की मदद का वादा किया है. किसानों के लिए ये बेहद जरूरी है.

प्रकृति और पर्यावरण

खाने का इंतजाम

जो दो नीले बिंदु दिख रहे हैं, वे किसान हैं. एक पेड़ पर चढ़ कर गायों के लिए चारे का बंदोबस्त कर रहा है और आसपास भूरे रंग की गायें अपने खाने का इंतजार कर रही हैं. ऑस्ट्रेलिया में दिसंबर से फरवरी तक गर्मी का मौसम होता है, जो कि पिछले साल रिकॉर्डतोड़ रहा. इसके बाद पतझड़ में भी बरसात नहीं हुई.

प्रकृति और पर्यावरण

खेत के बीच हल

गुन्नेडाह इलाके के एक खेत की तस्वीर. बीचोबीच एक हल रखा है. सूखे के निशान यहां साफ देखे जा सकते हैं. ऐसा लगता है जैसे किसी कलाकार ने यहां लकीरें उकेरी हों. कुदरत का नजारा इंसान द्वारा बनाई गई किसी भी पेंटिंग से ज्यादा प्रभावशाली होता है. रिपोर्ट: डेविड एल

एए/आईबी (एएफपी)