भारत चीन का विवाद जी20 में भी दिखेगा

शुक्रवार से हैम्बर्ग में शुरू हो रहे जी20 सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री की अलग से मुलाकात की संभावना से चीन ने इनकार किया है. आमतौर पर होने वाली दोनों देशों की बैठक का इस बार होना मुश्किल लग रहा है.

जी-20 में शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी की अलग से मुलाकात के बारे में पूछने पर गुरुवार को चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने बीजिंग में कहा, "फिलहाल इसके लिए उपयुक्त वातावरण नहीं है." शी जिनपिंग और नरेंद्र मोदी जी20 की बैठक के दौरान जरूर मिलेंगे और दूसरे नेताओं के साथ उनकी अकेले में मुलाकात होनी है लेकिन आपस में वे शायद अलग से नहीं मिलेंगे.

भारत और चीन के बीच 3,500 किलोमीटर लंबी साझी सीमा में विवाद के कई मसले हैं. पिछले महीने भारत, चीन और भूटान की सीमा पर एक पठार को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव आ गया है. चीन और भूटान इस इलाके को डोकलाम कहते हैं जबकि भारत इसे डोका ला पुकारता है. चीन का दावा है कि भारतीय सेना चीन भारत सीमा पीर कर चीनी इलाके में आ गयी है और उसने चीनी सीमा सुरक्षा बल के रोजमर्रा के कामकाज में बाधा डाली है. उसने भारत से कहा है कि वह अपने सैनिक वापस बुलाए.

उधर भारत का दावा है कि चीनी सेना ने घुसपैठ कर भूटान के एक इलाके में सड़क बनाने की कोशिश की है. दोनों सेनाएं उस संकरी घाटी में उलझ रही हैं जो भारत को भूटान से अलग करता है और जिस पर चीन का कब्जा है. भारत के लिए इस घाटी का महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह उसे सुदूर पूर्वोत्तर इलाकों से जोड़ता है.

भारत का कहना है कि उसने चीन को चेतावनी दी है कि सीमा पर सड़क बनाने से सुरक्षा स्थिति पर गहरा असर पड़ेगा.

भारतीय सेना ने भूटान के साथ मिल कर "चीनी सेना से अपनी हद में" रहने को कहा है. गुरुवार को चीन ने कहा कि सड़क बनाने से रोकने के बहाने भारतीय सेना का सीमा पार करना बेतुका है. चीन ने भारत पर इलाके में अपनी सेना जमा करने का भी आरोप लगाया है. चीनी विदेश मत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने रोजाना होने वाली ब्रीफिंग के दौरान कहा, "भारत अपने सैनिकों को अपने इलाके में बुलाए ताकि स्थिति को गंभीर होने से रोका जा सके." चीन ने यह भी कहा है कि उसे नहीं समझ में आ रहा है कि सड़क बनने में भारत को क्या आपत्ति है. इसके साथ ही चीन ने यह भी कहा है उसे पूरा हक है कि वह अपने इलाके में सड़क बनाए.

गेंग ने यह भी कहा, "बीते कुछ सालों में दरअसल भारत ने सिक्किम सेक्टर में भारत चीन सीमा पर कई निर्माण किये हैं और बड़ी संख्या में अपनी फौज तैनात कर रहा है." चीनी प्रवक्ता का कहना है कि भारत ने कई सैन्य परिसर भी खड़े कर लिये हैं. गेंग ने कहा, "मुझे नहीं पता कि भारत ने इन निर्माणों को खड़ा करते वक्त चीन की सुरक्षा चिंताओं के बारे में सोचा या नहीं."

भारत चीन का सीमा विवाद

लंबा विवाद

तकरीबन 3500 किलोमीटर की साझी सीमा को लेकर दोनों देशों ने 1962 में जंग भी लड़ी लेकिन विवादों का निपटारा ना हो सका. दुर्गम इलाका, कच्चा पक्का सर्वेक्षण और ब्रिटिश साम्राज्यवादी नक्शे ने इस विवाद को और बढ़ा दिया. दुनिया की दो आर्थिक महाशक्तियों के बीच सीमा पर तनाव उनके पड़ोसियों और दुनिया के लिए भी चिंता का कारण है.

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अक्साई चीन

काराकाश नदी पर समुद्र तल से 14000-22000 फीट ऊंचाई पर मौजूद अक्साई चीन का ज्यादातर हिस्सा वीरान है. 32000 वर्ग मीटर में फैला ये इलाका पहले कारोबार का रास्ता था और इस वजह से इसकी काफी अहमियत है. भारत का कहना है कि चीन ने जम्मू कश्मीर के अक्साई चीन में उसकी 38000 किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर रखा है.

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अरुणाचल प्रदेश

चीन दावा करता है कि मैकमोहन रेखा के जरिए भारत ने अरुणाचल प्रदेश में उसकी 90 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन दबा ली है. भारत इसे अपना हिस्सा बताता है. हिमालयी क्षेत्र में सीमा विवाद को निपटाने के लिए 1914 में भारत तिब्बत शिमला सम्मेलन बुलाया गया.

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किसने खींची लाइन

ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने मैकमोहन रेखा खींची जिसने ब्रिटिश भारत और तिब्बत के बीच सीमा का बंटवारा कर दिया. चीन के प्रतिनिधि शिमला सम्मेलन में मौजूद थे लेकिन उन्होंने इस समझौते पर दस्तखत करने या उसे मान्यता देने से मना कर दिया. उनका कहना था कि तिब्बत चीनी प्रशासन के अंतर्गत है इसलिए उसे दूसरे देश के साथ समझौता करने का हक नहीं है.

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अंतरराष्ट्रीय सीमा

1947 में आजादी के बाद भारत ने मैकमोहन रेखा को आधिकारिक सीमा रेखा का दर्जा दे दिया. हालांकि 1950 में तिब्बत पर चीनी नियंत्रण के बाद भारत और चीन के बीच ऐसी साझी सीमा बन गयी जिस पर कोई समझौता नहीं हुआ था. चीन मैकमोहन रेखा को गैरकानूनी, औपनिवेशिक और पारंपरिक मानता है जबकि भारत इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा का दर्जा देता है.

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समझौता

भारत की आजादी के बाद 1954 में भारत और चीन के बीच तिब्बत के इलाके में व्यापार और आवाजाही के लिए समझौता हुआ. इस समझौते के बाद भारत ने समझा कि अब सीमा विवाद की कोई अहमियत नहीं है और चीन ने ऐतिहासिक स्थिति को स्वीकार कर लिया है.

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चीन का रुख

उधर चीन का कहना है कि सीमा को लेकर कोई समझौता नहीं हुआ और भारत तिब्बत में चीन की सत्ता को मान्यता दे. इसके अलावा चीन का ये भी कहना था कि मैकमोहन रेखा को लेकर चीन की असहमति अब भी कायम है.

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सिक्किम

1962 में दोनों देशों के बीच लड़ाई हुई. महीने भर चली जंग में चीन की सेना भारत के लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में घुस आयी. बाद में चीनी सेना वास्तविक नियंत्रण रेखा पर वापस लौटी. यहां भूटान की भी सीमा लगती है. सिक्किम वो आखिरी इलाका है जहां तक भारत की पहुंच है. इसके अलावा यहां के कुछ इलाकों पर भूटान का भी दावा है और भारत इस दावे का समर्थन करता है.

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मानसरोवर

मानसरोवर हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ है जिसकी यात्रा पर हर साल कुछ लोग जाते हैं. भारत चीन के रिश्तों का असर इस तीर्थयात्रा पर भी है. मौजूदा विवाद उठने के बाद चीन ने श्रद्धालुओं को वहां पूर्वी रास्ते से होकर जाने से रोक दिया है.

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बातचीत से हल की कोशिश

भारत और चीन की ओर से बीते 40 सालों में इस विवाद को बातचीत के जरिए हल करने की कई कोशिशें हुईं. हालांकि इन कोशिशों से अब तक कुछ ख़ास हासिल नहीं हुआ. चीन कई बार ये कह चुका है कि उसने अपने 12-14 पड़ोसियों के साथ सीमा विवाद बातचीत से हल कर लिए हैं और भारत के साथ भी ये मामला निबट जाएगा लेकिन 19 दौर की बातचीत के बाद भी सिर्फ उम्मीदें ही जताई जा रही हैं.

भारत और चीन के बीच बीते कुछ महीनों में कई बार तूतू मैंमैं की नौबत आयी है. पिछले दिनों चीन ने तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा के अरुणाचल दौरे को लेकर भारत से सख्त विरोध जताया. भारत ने इसे अपना अंदरूनी मामला कहा.

चीन भारत के उस रुख से भी नाराज हुआ जब उसने चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड में शामिल होने से इनकार कर दिया. इस परियोजना में भारत का चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान खूब बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रहा है. भारत चीन से इसलिए रूठा हुआ है क्योंकि उसने संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता और पाकिस्तानी चरमपंथी मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित कराने की राह में बाधा खड़ी कर रहा है. इसके अलावा उसने न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) में भी भारत को शामिल करने का विरोध किया है. मौजूदा तनाव के बाद चीन ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए इस्तेमाल होने वाले एक रास्ते को भी बंद कर दिया है. 

भारत, चीन और भूटान की सीमा पर जिस पठार को लेकर विवाद हुआ है उसके बारे में चीन ने पत्रकारों को ऐतिहासिक दस्तावेज भी दिखाये है और उसका कहना है कि वह अपने दावे को सच साबित कर सकता है.

हालांकि इसके बाद भी दोनों तरफ से जुबानी जंग जारी है. चीनी अधिकारी भारत को 1962 के युद्ध की याद दिला रहे हैं जिसमें भारत को अपमान का घूंट पीना पड़ा था तो दूसरी तरफ भारत के रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने कहा है, "2017 का भारत 1962 के भारत से बहुत अलग है." रक्षा मंत्री शायद हाल के वर्षों में भारत की बढ़ी सैन्य क्षमता का अहसास दिलाना चाहते हैं.

दोनों देशों की मीडिया भी नेताओं और अधिकारियों के बयानों को खूब बढ़ा चढ़ा कर दिखा रही है. दिल्ली के ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के फेलो अभिजनान रेज का कहना है कि भारत को इस मामले का "हल ढूंढना चाहिए" क्योंकि चीन आपने पारंपरिक सहयोगियों से दूर हो रहा है और खुद को इलाके के नेता के रूप में पेश कर रहा है. रेज ने कहा, "बीते दो सालों में चीन का एक साफ रवैया दिखा है. वह खुद को एशियाई दबंग के रूप में देख रहा है. आप सिर्फ नियमों का पालन करके ऐसा नहीं बन सकते."

सिर्फ डोकलाम की ही बात नहीं है, दोनों देश एक दूसरे के इलाकों पर अपना दावा पेश करते हैं. चीन का कहना है कि भारत ने अरुणाचल प्रदेश में उसकी 90,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर रखा है. चीन इसे इलाके को दक्षिणी तिब्बत का नाम देता है. जबकि भारत का कहना है कि अक्साई चीन में उसकी 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन ने हड़प ली है. 

एनआर/एके (डीपीए, रॉयटर्स)

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