भूख के खिलाफ इन युवाओं ने छेड़ी मुहिम

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा टांगे भारत में भूख बड़ी समस्या है. विकास के तमाम दावों के बीच भूख से होने वाली मौतें रुकी नहीं है. सुखद एहसास तब होता है जब देश के युवा अंतहीन भूख को मिटाने का दृढ़ निश्चय करते हैं.

भारत की राजधानी नई दिल्ली से कुछ किलोमीटर दूर गुरुग्राम की एक निर्माणाधीन इमारत में 8 साल के विनय को अभी-अभी ताजा खाना मिला है. विनय के माता-पिता इसी निर्माणाधीन इमारत में मजदूरी करते हैं, विनय का बचपन सीमेंट, रेत और लोहे की सरियों के बीच गुजर रहा है, विनय के माता-पिता इतना नहीं कमा पाते कि तीन वक्त भरपेट भोजन कर सके. गर्म, स्वादिष्ट और पोषण से भरपूर भोजन देख विनय बेहद खुश हैं, उसकी खुशी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो खाना देने वालों को देख-देख मुस्कुरा रहा है.

मुफ्त में रेस्तरां का खाना

मिलिए 17 साल के अर्जुन साहनी और 18 साल की जेसी जिंदल से, गुरुग्राम के नामी स्कूल में पढ़ने वाले दोनों युवा साल 2016 से इसी तरह से भूखे लोगों का पेट भर रहे हैं. स्कूलों, निर्माणाधीन इमारतों, अनाथालयों और झुग्गी बस्तियों में इन्होंने अब तक 15 हजार खाने की थाली मुफ्त में जरूरतमंदों को दी है. स्कूल की पढ़ाई के बाद ये दोनों ऐसे इलाकों में लोगों की मदद करने निकल जाते हैं जहां मायूसी, गरीबी और भूख हैं. अर्जुन बताते हैं, "करीब पौने दो साल पहले मैंने और मेरी साथी जेसी ने सोचा कि हम क्यों ना अपनी पढ़ाई के अलावा कुछ ऐसा काम करे जिससे भूखे लोगों की मदद हो पाए, हमने तय किया कि हम उन तक ताजा, स्वच्छ और स्वादिष्ट खाना पहुंचाएंगे. हमारे आस-पास रेस्तरांओं की कोई कमी नहीं है. हमने गुरुग्राम के एक रेस्तरां को अपना प्रस्ताव दिया और उससे हमारी मुहिम से जुड़ने की गुजारिश की, उस रेस्तरां ने हमें 20 थाली (खाने का पैकेट) हर महीने स्पॉन्सर करने भरोसा दिया और हमें खाना मुहैया भी कराया. ये खाना खास तौर पर हमारे लिए बनाया गया, खाना वैसा ही था जैसा कि हम लोग किसी रेस्तरां में जाकर खाते हैं.”

पहली बार अर्जुन और जेसी एक अनाथालय में खाने के 100 पैकेट ले कर गए, उस अनाथालय की क्षमता करीब 400 लोगों की थी, जेसी और अर्जुन बताते हैं कि उस अनाथालय में उन्हें जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली, लोग खाने के पैकेट के लिए बेताब दिखे. इस सफल परीक्षण के बाद जेसी जिंदल और अर्जुन साहनी ने फीडऑन नाम के अभियान की शुरुआत की, पहले गुरुग्राम के ही रेस्तरां को इस मुहिम से जोड़ा गया और उसके बाद फाइव स्टार होटल, विदेशी फूड चेन को भी मुफ्त में भोजन देने के लिए प्रोत्साहित किया. 

भारत में भूख की समस्या बड़ी

भारत में भूख और कुपोषण की समस्या बहुत विकराल है, खास कर पोषण की कमी के कारण छोटे बच्चों को सही ढंग से शारीरिक विकास नहीं हो पाता है. वैश्विक भूख सूचकांक की 119 देशों की सूची में भारत 100वें स्थान पर हैं. आपको जानकार हैरानी होगी कि दुनिया के कुपोषितों में से करीब 19 करोड़ लोग भारत में हैं. साल 2017 में आई यूएन की एक रिपोर्ट कहती है कि 2016 में दुनिया में कुपोषित लोगों की संख्या करीब 81 करोड़ थी और इसमें भारत का हिस्सा 23 फीसदी है. भारत में पांच साल से कम उम्र के 38 फीसदी बच्चे सही पोषण की कमी में जीने को मजबूर है.

जेसी जिंदल बताती हैं, "स्कूल में एक दिन हमने सोचा कि हम भूखे लोगों की किस तरह से मदद कर सकते हैं, हमने उन तक ताजा और पोषक खाना पहुंचाना ही बेहतर समझा, इसके लिए रेस्तरां हमारे पास एक बढ़िया विकल्प था, रेस्तरां वाले अपने मेहमानों के लिए खाना बनाते हैं और उसमें अतिरिक्त माल लगाने से भूखे लोगों के लिए भोजन तैयार हो सकता है, ऐसे में रेस्तरां वालों को ज्यादा लागत नहीं लगानी पड़ती है.” 

समाज के प्रति दायित्व निभाते रेस्तरां और होटल

जेसी बताती हैं कि फीडऑन ऐसे लोगों तक खाना पहुंचाता है जिनके पास पौष्टिक खाने का विकल्प नहीं होता. स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के स्वाद को देखते हुए उन्हें पिज्जा और बर्गर भी दिया जाता है जिससे वो काफी खुश होते हैं. गुरुग्राम से शुरू हुई दो स्कूली छात्रों की ये मुहिम अब दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद तक पहुंच गई है. खास बात ये है कि इस मुहिम के साथ ज्यादातर स्कूली बच्चे जुड़े हैं.

गुरुग्राम में फीडऑन के 100 करीब वॉलंटियर हैं और हफ्ते में एक बार खाना मुहैया कराते हैं. फीडऑन के सह संस्थापक अर्जुन बताते हैं, "जब हम किसी स्कूल, अनाथालय, निर्माण क्षेत्र या झुग्गी बस्ती में जाते हैं तो वहां खाना पाकर लोग बहुत खुश होते हैं, ताजा और स्वादिष्ट खाना खाकर लोग हमारी सराहना भी करते हैं. खासकर बच्चों में उत्सुकता देखते ही बनती है. जब हम झुग्गी बस्ती में जाते हैं तो लोग खाने के पैकेट के लिए झपटते हैं, और हमें तब एहसास होता है कि अच्छा भोजन सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि सबको पसंद हैं और ये उनका भी अधिकार है.”

वहीं फीडऑन के बारे में जानने के बाद कई लोग जन्मदिन के मौके और शादी की सालगिरह पर इससे जुड़ कर रेस्तरां का खाना लागत मूल्य पर खरीद कर जरूरतमंद लोगों को देते हैं. अर्जुन और जेसी बताते हैं कि वो फीडऑन को ज्यादा टिकाऊ मॉडल बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा भूखे लोगों तक भोजना पहुंचाया जा सके.

रिपोर्टः एम अंसारी

गरीबी से जूझते अमीर देशों के बच्चे

खराब हालात

संयुक्त राष्ट्र की बाल संस्था यूनिसेफ के मुताबिक दुनिया के अमीर मुल्कों में बच्चे व्यापक गरीबी से जूझ रहे हैं. यूनिसेफ ने इस स्टडी में दुनिया के 41 उच्च और मध्यम आय वाले देशों को शामिल किया था.

गरीबी से जूझते अमीर देशों के बच्चे

शामिल देश

सर्वे में यूरोप, पूर्वी एशिया और उत्तरी अमेरिका के तमाम देशों समेत इस्राएल, मैक्सिको और चिली को भी शामिल किया गया था.

गरीबी से जूझते अमीर देशों के बच्चे

सकारात्मक बदलाव

रिपोर्ट ने बच्चों और युवाओं पर दिख रहे सकारात्मक रुझानों पर भी चर्चा की है. रिपोर्ट कहती है कि युवाओं में नशे की लत घटी है और किशोरावस्था में गर्भधारण करने के मामलों में भी गिरावट आयी है.

गरीबी से जूझते अमीर देशों के बच्चे

बेहतर जीवन

बच्चों के लिए जिन देशों को बेहतर माना गया है उनमें डेनमार्क, फिनलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, जर्मनी, स्विजरलैंड, दक्षिण कोरिया, स्लोवेनिया और नीदरलैंड्स प्रमुख हैं. दक्षिणी और पूर्वी यूरोप और लैटिन अमेरिकी देशों में बाल गरीबी दर सबसे अधिक है.

गरीबी से जूझते अमीर देशों के बच्चे

नहीं चला रसूख

शक्तिशाली देशों में शुमार अमेरिका भी बाल गरीबी से जूझ रहा है. वहां के तकरीबन 30 फीसदी बच्चे गरीब हैं जो 21 फीसदी की वैश्विक औसत गरीबी दर से कही अधिक है.

गरीबी से जूझते अमीर देशों के बच्चे

पैसा काफी नहीं

यूनिसेफ के मुताबिक उच्च आय बाल जीवन की गुणवत्ता तय नहीं कर सकती. मसलन जापान, अमेरिका और कनाडा जैसे अमीर देशों में बाल गरीबी घटाने के लिये सबसे कम नीतियां हैं.

गरीबी से जूझते अमीर देशों के बच्चे

अपर्याप्त भोजन

अमीर देशों में हर आठ में से एक बच्चे को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता. वहीं तुर्की और मेक्सिको में हर तीन में से एक बच्चे के लिये पर्याप्त भोजन नहीं है. इन देशों में 15 साल की उम्र वाले एक तिहाई बच्चे पढ़ना-लिखना नहीं जानते हैं.

हमें फॉलो करें