मलेशिया के पीएम का व्यंग्य चित्र वायरल

मलेशिया और सोशल मीडिया की दीवारों में इन दिनों प्रधानमंत्री नजीब रजाक का एक जोकर नुमा चित्र वायरल हो रहा है. इसे प्रधानमंत्री पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते बनाया गया है.

चित्र मलेशिया के डिजाइनर और एक्टिविस्ट फहमी रजा ने बनाया है. उनकी तुलना स्ट्रीट आर्ट के पुरोधा एक्टिविस्ट बांक्सी से ​की जाने लगी है. इस चित्र को सोशल ​मीडिया पर बहुत ज्यादा शेयर किया गया है. साथ ही इसके पोस्टर और स्टीकर्स भी मलेशिया की दीवारों पर बेतहाशा चिपकाए जा रहे हैं. और अब इसकी कई किस्म की नकलें भी बनाई जाने लगी हैं.

फहमी रजा के ​इस चित्र ने प्रधानमंत्री नजीब पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच को विफल करने की उनकी कोशिश के खिलाफ मलेशिया में उबाल ला दिया है. अपनी एक विदेश यात्रा के दौरान ईमेल के जरिए लिए गए एक साक्षात्कार में फहमी ने ​कहा है, ''हमारा देश मूर्खों और बदमाशों द्वारा चलाया जा रहा है. मैं मलेशिया की राजनीति के पाखंड और फूहड़ता पर चित्र बनाकर चाहता हूं कि लोग इस पर हंस सकें.''

लेकिन दूसरी ओर मलेशियाई अधिकारी इससे खुश नहीं हैं. पहले भी अपने एक्टिविज्म के चलते गिरफ्तार किए जा चुके 38 साल के फहमी पर पुलिस ने उनके इन व्यंग्यात्मक चित्रों के लिए सवाल उठाए हैं और कहा कि वे प्रधानमंत्री के ऐसे मजाकिया चित्र पोस्ट करना बंद करें. इन चित्रों में नजीब को भयानक भौंहों वाले जोकर की तरह दिखाया गया है जिसके खून जैसे लाल रंग के होंठ हैं.

फहमी का कहना है कि पुलिस उन पर मल्टीमीडिया कानूनों के संभावित उल्लंघन की जांच कर रही है और उन्हें इसके लिए 5 साल की जेल हो सकती है. पिछले साल मलेशिया के एक राजनीतिक कार्टूनिस्ट पर सरकार पर कटाक्ष करने के ​चलते ढेर सारे राजद्रोह के मुकदमे दायर किए गए थे. वकीलों का कहना है कि इसके तहत उन्हें 43 सालों के लिए जेल हो सकती है.

फहमी कला को अपना हथियार बताते हैं और कहते हैं, ''वे एक बागी को जेल में डाल सकते हैं लेकिन बगावत को नहीं.''

प्रधानमंत्री नजीब, एक सरकारी कंपनी से अरबों डॉलर की चोरी के आरोप से जूझ रहे हैं जिसके लिए वे जिम्मेदार थे. साथ ही उन पर देश के बाहर 6810 लाख डालर का गुप्त भुगतान करने की बात स्वीकारने का भी दबाव है. हालांकि वे इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं. लेकिन इस मामले में सरकार के आलोचकों और मीडिया के दमन के साथ ही उनकी ओर से जांच को प्रभावित करने की कोशिशों के चलते उनके खिलाफ गुस्सा और अधिक भड़क गया है.

फहमी के चित्रों की नकल न केवल सोशल मीडिया में ​बल्कि सार्वजनिक जगहों में भी चिपकाई जा रही हैं. हालांकि पुलिस इन्हें उतार दे रही है. ​सरकार की ओर से भी इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए सोशल मीडिया पर #RespectMyPM का अभियान चलाया गया है. लेकिन इसके जवाब में #SuspectMyPM का एक नया अभियान ​ट्वीटर में दिखाई दिया है.

आरजे/एमजे (एएफपी)

नाजी दमन के दौर में कला

यहूदी बस्ती के रंग

क्या खौफनाक चीज खूबसूरत भी हो सकती है? बर्लिन में लगी प्रदर्शनी 'आर्ट फ्रॉम दि होलोकास्ट': 100 वर्क्स फ्रॉम दि याद वाशेम कलेक्शन'' में दिखाई देता है कि नाजी यातना शिविरों और यहूदी बस्तियों में रह रहे कई कलाकार मानव ​इतिहास के सबसे त्रासद दौर में भी अपने अनुभवों को उकेरने में किसी तरह कामयाब हो गए. कलाकार योसेफ कोनर नाजी दमन के इस दौर से बच निकले. उनकी यह कलाकृति 'यहूदी बस्ती में एक सड़क'.

नाजी दमन के दौर में कला

'शरणार्थी'

इजराएल के याद वाशेम मेमोरियल सेंटर की ओर से पहली बार बर्लिन के जर्मन हिस्टोरिकल म्यूजिम में इन 100 कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगाई गई है. इसमें शामिल 50 चित्रकारों में से 24 की नाजियों द्वारा हत्या कर दी गई थी. इनमें उस दौर के मशहूर चित्रकार फेलिक्स नुसबाउम भी थे. उनकी हत्या 1944 में आउश्वित्स में की गई. ​उनकी यह मशहूर कलाकृति 'शरणार्थी' भी प्रदर्शनी में शामिल है.

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'दुख का आत्म चित्र'

शार्लोटे सालोमोन की कलाकृतियां पहले भी जर्मनी में दूसरी जगहों पर दिखाई गई हैं. उनकी 700 कलाकृतियों में से 'जिंदगी या रंगमंच? एक नृत्यनाटिका' नाम से उनका खुद का बनाया यह पोट्रेट भी इस प्रदर्शनी में शामिल है. चित्र में सालोमोन ने एक यहूदी के बतौर अपनी दुखभरी जिंदगी को बयान किया है. 1943 में दक्षिणी फ्रांस से निर्वासित कर दी गई गर्भवती सालोमन जब आउश्वित्स पहुंची वहां उनकी हत्या कर दी गई.

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छिपी लड़की के चित्र

नेली टॉल की कहानी कम ही लोग जानते हैं. वह और उनकी मां इस दौर में ​इसलिए बच गए क्योंकि उन्हें उनके ईसाई दोस्तों ने छिपाकर पोलिश शहर लुवोफ पहुंचा दिया. कमरे में बंद टॉल ने कई चित्र बनाए जिनमें यह चित्र 'खेत में ल​ड़कियां' भी शामिल है. अब 81 साल की हो चलीं टॉल इस प्रदर्शनी के उद्घाटन के लिए अमेरिका में अपने घर से बर्लिन पहुंचीं.

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'बैरेकों के बीच का रास्ता'

बॉन शहर के लियो ​ब्रॉअर ने प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी के लिए लड़ाई लड़ी. हिटलर के सत्ता में आने के एक साल बाद 1934 में उन्हें हेग जाना पड़ा और फिर वहां से ब्रसेल्स. वहां उन्हें चित्र बनाने के मौके मिल पाए. 1940 में उन्हें फ्रांस में सेंट सिप्रियेन नजरबंदी शिविर के बाद गुर्स के कैंप में ले जाया गया जहां उन्होंने जल रंगों में अपने अनुभवों को उकेरा. 1975 में लियो की मौत बॉन में हुई.

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कलात्मक साझेदारी

गुर्स में लियो ब्रॉअर ने फोटोग्राफर और ​चित्रकार कार्ल रॉबर्ट बोडेक के साथ मिलकर एक कैंप कैबरे के लिए स्टेज का डिजाइन किया. इन दोनों ने 1941 तक ग्रीटिंग कार्ड्स और इस तरह की कई कलाओं में साझा काम किया. इसके बाद बोडेक को एइक्स ऑन प्रॉवॉन्स के नजदीक ले मील कैंप में भेज दिया गया. इसके बाद अंत में उन्हें आउश्वित्स भेजा गया जहां 1942 में उनकी हत्या कर दी गई.

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कलाकार का खूफिया जीवन

बेडरिष फ्रिटा थेरेसियनस्टाट यातना शिविर में थे जहां से ​प्रोपागांडा समग्री का उत्पादन होता था. लेकिन फ्रिटा और उनके सहयोगियों ने ​खूफिया तरीके से नाजी यातना शिविरों की दहशत को अपने चित्रों में उकेरा. कुछ समय बाद उनका यह भेद खुल गया. फ्रिटा की मृत्यु आउश्वित्स में ही हुई. जब थेरेसियनस्टाट आजाद हुआ तो उनकी 200 कलाकृतियां दिवारों और जमीन के भीतर गाड़ी हुई पाई गईं.

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मौत के परे दोस्ती

यातना शिविर के भयानक जीवन को उकेरने में बेडरिष फ्रिटा को लियो हास ने बेहद मदद की. साखसेनहाउसेन में उन्हें मित्र राष्ट्रों की नकली मुद्रा के नोट बनाने का का आदेश दिया गया था. वे दमन के इस दौर से जिंदा बचने में कामयाब रहे और उन्होंने फ्रिटा के बेटे टोमास को गोद लिया. युद्ध के बाद हास को थेरेसियनस्टाट में उनकी छिपाई 400 के करीब कलाकृतियां मिलीं.

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खूफिया डॉक्टर

पावेल फांटल भी थेरेसियनस्टाट के चित्रकारों के समूह से ही थे. एक डॉक्टर होने के नाते वे ​शिविर में एक गुप्त टाइफस क्लिनिक भी चलाया करते थे. लेकिन फ्रिटा की तरह ही उनका भेद भी खुल गया और उन्हें यातनाएं देकर आउश्वित्स भेज दिया गया. जनवरी 1945 में एक डैथ मार्च के दौरान उन्हें गोली मार दी गई. उनकी 80 कलाकृतियों को खूफिया तरीके से थेरेसियनस्टाट से बाहर भेजा गया था.

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कला अध्यापक

याकोब लिपशित्स विलनियस के आर्ट इंस्टीट्यूट में पढ़ाया करते थे. 1941 में उन्हें काउनुस की एक यहूदी बस्ती में जबरदस्ती ले आया गया. यहां वे कलाकारों के एक खूफिया संगठन में शामिल हो गए और अपने चित्रों में दमन के दौर को दर्शाने लगे. लिपशित्स की मौत 1945 में काउफरिंग यातना शिविर में हुई. युद्ध के बाद उनकी पत्नी और बेटी यातना शिविर के कब्रगाह से उनकी कई कला​कृतियों को तलाशने में कामयाब हुए.

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त्रासद दौर में उम्मीद के चित्र

इस प्रदर्शनी में शामिल चित्र नाजी शिविरों की क्रूरता और अमानवीयता का दस्तावेज हैं. साथ ही ये यह भी दिखाते हैं कि इन चित्रकारों ने खुद को कैद करने वालों के खतरनाक इरादों के ​इतर जाकर अपनी किस्म की दुनिया रचने की कोशिश की. ये चित्र मोरित्स मुलर की कलाकृति ''सर्दियों में छत'' है. बर्लिन के जर्मन हिस्टोरिकल म्यूजियम में यह प्रदर्शनी 3 अप्रैल तक चलनी है.

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