1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें

मामलों के बोझ से कराहती भारत की अदालतें

प्रभाकर मणि तिवारी
९ अगस्त २०१९

भारत की अदालतों में लंबित मामलों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने तमाम हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों को 25 से 50 साल पुराने मामलों को शीघ्र निपटाने को कहा है.

https://p.dw.com/p/3NcZ6
Indien Guvahati | Richter Ranjan Gogoi besucht Guvahati und legt Grundstein für ein Auditorium
तस्वीर: DW/P. Tiwari

मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने गुवाहाटी में इस सप्ताह एक सरकारी कार्यक्रम में कहा कि ऐसे मामलों की तादाद एक हजार से ज्यादा है जो 50 साल से लंबित हैं. इनके अलावा दो लाख से ज्यादा मामले 25 साल से लंबित हैं. उनका कहना था कि 90 लाख से ज्यादा लंबित दीवानी मामलों में 20 लाख से ज्यादा में अब तक समन तक नहीं भेजा जा सका है. आपराधिक मामलों के मामले में तो तस्वीर और भयावह है. ऐसे 2.10 करोड़ मामलों में से एक करोड़ से ज्यादा में अब तक समन तक जारी नहीं हुए हैं.

बढ़ते मामले

अदालतों में दीवानी और आपराधिक मामलों की तादाद बीते कुछ वर्षों के दौरान तेजी से बढ़ी है. इस पर समय-समय पर चिंता तो जताई जाती रही है. लेकिन केंद्र ने इस समस्या से निपटने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है. नेशनल ज्युडिशियल डाटा ग्रिड के मुताबिक, निचली अदालतों में 2.97 करोड़ दीवानी व आपराधिक मामले लंबित हैं. इनमें से दो दीवानी मामले तो वर्ष 1951 से ही लंबित हैं. सरकारी आंकड़ों में कहा गया है कि वर्ष 2015 से इस साल जनवरी के बीच सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की तादाद तो 3.8 फीसदी घटी है. लेकिन देश के 24 हाईकोर्टों में लंबित मामलों में 9.7 फीसदी यानी 3.75 लाख की वृद्धि हुई है. इनमें से 7.26 लाख मामलों के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट पहले और 4.49 लाख मामलों के साथ राजस्थान हाईकोर्ट दूसरे स्थान पर है. वर्ष 2017 और 2018 में निचली अदालतों ने क्रमशः 1.26 करोड़ और 1.30 करोड़ मामले निपटाए थे. अप्रैल, 2017 में दस साल से ज्यादा पुराने मामलों को शीघ्र निपटाने के लिए सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की बहाली के लिए न्याय मित्र योजना शुरू की गई थी. लेकिन उससे भी तस्वीर में खास बदलाव नहीं आया है.

Indien Guvahati | Richter Ranjan Gogoi besucht Guvahati und legt Grundstein für ein Auditorium
तस्वीर: DW/P. Tiwari

मुख्य न्यायाधीश की चिंता

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने इसी सप्ताह असम की राजधानी गुवाहाटी में आयोजित एक समारोह में लंबित मामलों की बढ़ती तादाद पर गहरी चिंता जताई थी. उन्होंने कहा था कि दीवानी और आपराधिक मामलों में से क्रमशः 20 लाख और एक करोड़ से ज्यादा में अब तक समन तक नहीं जारी किया जा सकका है. कार्यपालिका से उनका सवाल था, "अगर समन नहीं भेजा गया तो जज मामले की सुनवाई कैसे शुरू करेंगे ?” समन भेजने की जिम्मेदारी कार्यपालिका पर है. गोगोई ने कहा कि लंबित आपराधिक मामलों में से 45 लाख तो बेहद छोटे-मोटे अपराधों से संबंधित हैं. वह कहते हैं, "लंबित मामलों की बढ़ती तादाद के मुद्दे पर अक्सर न्यायपालिका को आलोचना का शिकार बनना पड़ता है. लेकिन वह उसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार नहीं है. न्यायतंत्र को प्रभावी बनाने में कार्यपालिका की भी जिम्मेदारी है.” उन्होंने असम हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश अरूप कुमार गोस्वामी को पुराने मामलों को शीघ्र निपटाने का निर्देश दिया है. असम व पूर्वोत्तर राज्यो में 106 मामले ऐसे हैं जो बीते 25 वर्षों से चल रहे हैं. इससे पहले बीती 10 जुलाई को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के साथ एक बैठक में भी उन्होंने ऐसे पुराने मामलों की शीघ्र निपटाने का अनुरोध किया था.

लंबित मामलों की वजह

लेकिन आखिर लंबित मामलों की तादाद बढ़ने की वजह क्या है ? इस सवाल का आसान जवाब है जजों की कमी. मई, 2014 में हाईकोर्ट के जजों की अनुमोदित तादाद 906 थी जिसे दिसंबर, 2018 में बढ़ा कर 1079 किया गया था. लेकिन फिलहाल इन अदालतों में 676 जज ही हैं. यानी 37 फीसदी पद खाली हैं. वर्ष 2013 से 2018 के बीच निचली अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के अनुमोदित पदों की तादाद 19,518 से बढ़ा कर 22,833 कर दी गई थी. लेकिन इनमें से 5,450 पद अभी खाली हैं. इस वजह से निचली अदालतों में लंबित मामलों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. इन अदालतों में लंबित 2.97 करोड़ मामलों में 2.05 करोड़ मामले तो वर्ष 2015 से अब तक जुड़े हैं. तमाम विधि विशेषज्ञ लंबे अरसे से जजों की तादाद बढ़ाने और खाली पदों को शीघ्र भरने की वकालत करते रहे हैं. इस मुद्दे पर कई बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीशों और केंद्र सरकार के बीच टकराव तक हो चुका है. वर्ष 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि निचली अदालतों में 2,279 जजों की नियुक्ति की स्थिति में हर साल आने वाले ताजा मामलों को निपटाया जा सकेगा जबकि 8,152 अतिरिक्त जजों की नियुक्ति की स्थिति पांच वर्षो में तमाम लंबित मामले निपटाए जा सकते हैं. इस साल 11 जुलाई को राज्यसभा में पेश आंकड़े में सरकार ने माना था कि निचली अदालतों में जजों के 5,450 पद खाली हैं.

समाधान

लेकिन क्या महज जजों की तादाद बढ़ा कर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है? कलकत्ता हाईकोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट विकास रंजन भट्टाचार्य कहते हैं, "महज इससे समस्या हल नहीं होगी. अब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा है. जजों की अनुमोदित तादाद बढ़ाने के साथ निचली अदालतों में आधारभूत ढांचे को भी मजबूत करना होगा. विधि आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में यही कहा था.” खाली पदों पर जजों की नियुक्ति में देरी पर भी सरकार व सुप्रीम कोर्ट एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं. सरकार ने हाल में लोकसभा में कहा था, निचली अदालतों में जजों का चयन व नियुक्ति हाईकोर्टों और संबंधित राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है. मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई उम्मीद जताते हैं कि केंद्र सरकार हाईकोर्ट के जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र मौजूदा 62 से बढ़ा कर 65 करने के उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लेगी. गोगोई कहते हैं, "इसका तात्कालिक फायद यह होगा कि तीन साल तक सेवानिवृत्ति रुक जाएगी. इस दौरान बेहतर जजों से 403 खाली पदों को भरा जा सकता है. नए मुख्य न्यायाधीश इस प्रक्रिया को जारी रख कर भारतीय न्यायापालिका का चेहरा बदल सकते हैं.” विधि विशेषज्ञों का कहना है कि पहले मुख्य न्यायाधीश रहे कई जज भी खाली पदों को भरने और लंबित मामलों को निपटाने की वकालत करते रहे हैं. लेकिन अब तक इस मामले में कोई ठोस पहल नहीं की जा सकी है.

 _______________

हमसे जुड़ें: WhatsApp | Facebook | Twitter | YouTube | GooglePlay | AppStore

इस विषय पर और जानकारी को स्किप करें

इस विषय पर और जानकारी

और रिपोर्टें देखें