माहवारी में भगवान की मूर्ति छू कर देखा कुछ ना हुआ

13 साल की धनश्री कांताराम ढेरे ने अपनी आशंकाओं को दूर करने के लिए माहवारी के दौरान घर में हिंदू देवता की मूर्ति को छुआ. उसके साथ कुछ बुरा घटित नहीं हुआ. धनश्री ने हाल में माहवारी को लेकर एक वर्कशॉप में हिस्सा भी लिया था.

भारत में सामान्य रूप से यह धारणा है कि माहवारी के दौरान महिलाएं अशुद्ध होती हैं, उन्हें मंदिर नहीं जाना चाहिए, धार्मिक कार्यों में शामिल नहीं होना चाहिए, खाना नहीं बनाना चाहिए. इसी तरह की कुछ और पाबंदियां भी इस दौरान उन पर लगाई जाती हैं. हाल के वर्षों में इन धारणाओं को चुनौती दी जा रही है. महाराष्ट्र में पिछले साल सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों को आदेश दिया कि वे माहवारी के बारे में सच्चाई क्या है यह विद्यार्थियों को पढ़ाएं.

वीडियो: लड़कियों ने दिए "उन" दिनों के बारे में जवाब

चार महीने पहले धनश्री ढेरे की माहवारी शुरू हुई लेकिन दूसरी लड़कियों से अलग उसे बताया गया कि यह एक स्वस्थ प्रक्रिया है. हालांकि उसकी मां इस बात से बहुत सहमत नहीं और उन्होंने उसे पापड़ बनाने से रोक दिया. धनश्री ढेरे ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया, "मैंने स्कूल में सीखा कि अगर मैं खाना छुऊंगी तो कुछ नहीं होगा इसलिए मैंने छू लिया. हालांकि मैं डरी हुई थी और देख रही थी, कुछ नहीं हुआ. इसलिए मैंने उसके बाद भगवान की मूर्ति भी छू ली."

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

बाल मत धोना

अक्सर लड़कियों को बताया जाता है कि पहले दो दिन बाल नहीं धोने चाहिए. इस सलाह का कोई आधार नहीं है. इसके विपरीत गर्म पानी से नहाने पीरियड्स के दर्द से राहत मिल सकती है.

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

नहाने से भी परहेज

जिस जमाने में ये नियम बने होंगे, तब आज जैसे बाथरूम यकीनन नहीं हुआ करते थे. जिस नहर से पीने का पानी भरना हो, वहीं नहाना पानी को दूषित कर सकता था. लेकिन अब ना तो महिलाओं के नहाने में कोई समस्या है, बल्कि टैम्पॉन लगा कर स्विमिंग भी की जा सकती हैं.

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

अचार को मत छूना

ये कुछ वैसा ही है जैसे छोटे बच्चों को डराना हो तो कह दिया जाता है कि बात नहीं मानोगे तो भूत पकड़ के ले जाएगा. पीरियड्स के दौरान हार्मोन ज्यादा सक्रिय होते हैं. मसालेदार खाने से उनके संतुलन में गड़बड़ हो सकती है लेकिन अचार को आपसे कोई खतरा नहीं है.

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

पापड़ से दूर रहना

जो लोग आपको ऐसी सलाह दें, उन्हें एक टेस्ट कर के दिखा ही दें. ना ही बच्चे को उठाने कभी कोई भूत आएगा और ना ही आपके छूने से अचार खराब होगा या फिर पापड़ का रंग बदलेगा.

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

सेक्स कतई नहीं

पीरियड्स के शुरुआती दिनों में शरीर कमजोरी महसूस करता है, इसलिए आराम करना जरूरी है. ये ना करो, वो ना करो का एक ही तर्क समझ आता है कि आराम कर लो. लेकिन यह सोचना कि उस दौरान सेक्स कर लेंगे तो आपके पार्टनर से उसकी मर्दानगी छिन जाएगी सिर्फ बेवकूफी है.

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रसोई से बाहर

जहां लोग बड़े परिवारों में रहते है, वहां आज भी इसे माना जाता है. लेकिन जहां पति पत्नी ही हैं, वहां कोई इसकी परवाह नहीं करता. तो जब छोटे परिवार का खाना दूषित नहीं होता, तो फिर बड़े परिवार का कैसे हो जाएगा?

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

घर से भी बाहर

यह एक अलग ही स्तर है, जहां महिलाओं को अपने बिस्तर, अपने कमरे में भी सोने नहीं दिया जाता. इससे सिर्फ इतना फायदा हो सकता है कि रात में गलती से बिस्तर पर दाग नहीं लगेगा, गद्दा धुलवाना नहीं पड़ेगा लेकिन महिला को जो तकलीफ होगी उसका क्या?

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

मंदिर, हे भगवान!

जब पहली बार लड़कियां पीरियड्स को महसूस करती हैं, तब ज्यादातर माएं सबसे पहली सलाह यही देती हैं. ऐसा तब है जब देश में ऐसे भी कई मंदिर हैं जहां देवी के "उन दिनों" की पूजा की जाती है. महाराष्ट्र में पहले पीरियड्स पर पूजन होता है. अगर पहली बार पवित्र है तो उसके बाद अपवित्र क्यों?

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

जादू टोने वाला खून

पीरियड्स का खून ना केवल नापाक होता है, वो इतना खतरनाक होता है कि उससे काला जादू भी किया सकता है - क्या आपको लगता है कि ऐसी बिना सिर पैर की बातें सिर्फ गांव देहात के लोग करते हैं? जी नहीं, अभिनेत्री कंगना राणावत के पढ़े लिखे बॉयफ्रेंड ने भी ऐसी बातें की हैं.

पीरियड्स से जुड़ी 10 गलतफहमियां

पौधों को पानी नहीं

चार दिनों के लिए महिलाओं को शैतान समान बना दिया जाता है जिनके छूने से ना जाने क्या क्या बिगड़ जाएगा. जी नहीं, तुलसी या कोई भी पौधा आपके पानी देने से मुरझाने वाला नहीं है.

भेदभाव से लड़ाई

मुंबई से करीब 150 किलोमीटर दूर खेवारे महाज गांव के स्कूल में ढेरे की इस स्वीकारोक्ति के बाद उसकी सहेलियां इस बारे में बात कर रही हैं. यह लड़कियां महाराष्ट्र के सात जिलों की उन 3 लाख छात्राओं में हैं जिन्हें पिछले दो सालों में माहवारी के मिथकों को दूर करने के लिए शिक्षा दी गई. संयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी यूनीसेफ के युसूफ कबीर ने यह जानकारी दी.

पीरियड्स को ऐसे पहले किसी ने नहीं देखा

पीरियड्स के दौरान इस पूल में आना मना है

पांच साल पहले यूनिसेफ ने महाराष्ट्र के जालना और औरंगाबाद जिले से यह कार्यक्रम शुरू किया और अब सरकार के साथ मिल कर पूरे राज्य भर में इस कार्यक्रम का विस्तार कर रही है. दो साल पहले केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान में इस कार्यक्रम को भी जोड़ दिया. स्वच्छता के लिए जिम्मेदार केंद्र सरकार की संयुक्त सचिव वेनेलांगाती राधा ने बताया कि इस कार्यक्रम को अब दूसरे राज्यों में भी गैरसरकारी संगठनों के साथ मिल कर शुरू किया जा रहा है. उन्होंने यह भी कहा, "लेकिन महाराष्ट्र इसमें अगुआ है. यूनीसेफ और स्थानीय अधिकारियों ने बहुत अच्छा काम किया है."

इस कार्यक्रम की पहली चुनौती शिक्षक हैं जो पाठ्यक्रम को पढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं. यूनिसेफ के प्रशिक्षकों को पहले उन्हें यह समझाना पड़ता है कि माहवारी में कुछ भी अशुद्ध नहीं है. इस कार्यक्रम के लिए पाठ तैयार करने वाली भारती ताहिल्यानी ने कहा, "शिक्षक इन मिथकों पर विश्वास करते हैं और उनकी तरफ से बहुत अवरोध थे. 80 फीसदी से ज्यादा शिक्षक मानते थे कि माहवारी का रक्त अशुद्ध होता है." भारती ने बताया छात्रों से माहवारी के बारे में बात करने के लिए उन्हें रजामंद करना टेढ़ी खीर थी.

कई सत्रों की ट्रेनिंग के बाद ही यह मुमकिन हो सका. एक बार वो तैयार हो जाएं तो फिर छह महीने का पाठ्यक्रम शुरू किया जाता है. इनमें सिर्फ छात्राएं हिस्सा लेती हैं. छात्रों के लिए सिर्फ एक सत्र होता है जिसमें उन्हें एक फिल्म दिखाई जाती है. पारंपरिक किताबों के अलावा पाठ्यक्रम में खेल, गीत और नाटक को भी शामिल किया गया है.

जानकारी का अभाव

इस पाठ्क्रम की बहुत जरूरत महसूस की जा रही थी. लड़कियों में इसे लेकर कई तरह की भ्रांतियां हैं और इसकी वजह से उन्हें बहुत सी तकलीफों का सामना करना पड़ता है. सरकारी डॉक्टर तारुलता धानके ने बताया, "कई बार तो माहवारी के दौरान लड़कियों ने अपनी योनि में टांके लगवाने की मांग की थी." सबसे बड़ी मुश्किल तो यह है कि इस बारे में जल्दी कोई बात करने के लिए भी तैयार नहीं होता.

लड़कियों को इस बारे में जानकारी से फायदा यह हुआ कि उन्हें अब माहवारी को लेकर बुरा महसूस नहीं होता. वो पीरियड के दौरान भी स्कूल आती हैं और खुद को बीमार नहीं महसूस करतीं. लड़कियों के स्कूल छुड़ाने में माहवारी की बड़ी भूमिका है. माहवारी के दौरान अकसर उन्हें स्कूल जाना बंद करना पड़ता है. इसकी वजह यह भी है कि स्कूलों में पैड बदलने के लिए सुरक्षित जगह या टॉयलेट नहीं हैं.

पाठ्यक्रम में लड़कियों को माहवारी के दौरान स्वस्थ रहने के तरीके भी बताए जाते हैं. अकसर उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं होती. भारत में 60 फीसदी से ज्यादा महिलाएं माहवारी के दौरान सैनिटरी पैड की जगह कपड़े का इस्तेमाल करती हैं और कई बार उससे भी संक्रमण का खतरा रहता है. इनका बार बार इस्तेमाल होता है. इन कपड़ों को धोना सुखाना भी एक समस्या है महिलाएं अकसर इन्हें छिपा कर रखती हैं. पाठ्यक्रम में इसके बारे में जानकारी मिलने के बाद अब लड़कियां सुरक्षित तरीकों का इस्तेमाल कर रही हैं.

एनआर/एमजे (रॉयटर्स)

पीरियड्स पर 5 जरूरी बातें

शौचालय क्यों जरूरी है?

रोजाना पूरी दुनिया में 15 से 49 साल की 80 करोड़ महिलाएं पीरियड्स में होती हैं. वॉटरएड दुनिया की सवा अरब औरतों को पीरियड्स के दौरान शौचालय की सुविधा नहीं होती. यूएन का अनुमान है कि इस वजह से हर 10 में से एक लड़की पीरियड के दौरान स्कूल नहीं जाती. धीरे-धीरे उसका स्कूल छूट जाता है.

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पीरियड्स पर बात क्यों नहीं होती?

पीरियड्स के लिए दुनियाभर में 5000 से ज्यादा सांकेतिक शब्दों का इस्तेमाल होता है क्योंकि सीधे-सीधे इसका नाम लेने में शर्म आती है. नेपाल जैसे देशों में आज भी चौपदी परंपराएं मानी जाती हैं जब पीरियड्स के दौरान महिलाएं खुद को परिवार से अलग कर लेती हैं. ईरान में 50 फीसदी और भारत में 10 फीसदी लड़कियां मानती हैं कि पीरियड्स बीमारी हैं.

पीरियड्स पर 5 जरूरी बातें

नजरअंदाज क्यों करते हैं?

एक स्वस्थ, प्रोडक्टिव और सम्मानजनक जीवन के लिए महिलाओं को पीरियड्स के दौरान पानी, साबुन, शौचालय और सैनिटरी पैड जैसी चीजें जरूर मिलनी चाहिए. वे अपने जीवन के 6-7 साल पीरियड्स में गुजारती हैं. यह उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा है. फिर भी उन्हें मूलभूत सुविधाएं तक नहीं मिल पातीं.

पीरियड्स पर 5 जरूरी बातें

क्या असर?

पीरियड्स पर बात न हो पाने का असर ही है कि इसका नाम लेने तक में शर्म आती है. इसे बीमारी समझ जाता है. महिलाओं को परिवार से अलग तक कर दिया जाता है.

पीरियड्स पर 5 जरूरी बातें

क्या कहती है आयशा?

घाना की रहने वाली हाई स्कूल की छात्रा आयशा कहती है कि पीरियड्स के दौरान अगर स्कर्ट पर खून का धब्बा लग जाए तो लड़के हमें बेशर्म कहते हैं और शर्मिंदा करते हैं. हमें खुद को खराब लगता है कि लड़कों ने हमारे कपड़ों पर खून देख लिया. हमारे लिए तब उनके सामने जाना तक मुश्किल हो जाता है.

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