मैरी कॉम से प्रेरणा लेकर वर्ल्ड चैंपियन बनी रमाला की कहानी

युद्ध की विभाषिका से भागने वाली एक लड़की ने मुक्केबाजी की बदौलत अपने सपनों को पूरा किया है. परिवार से छुपकर मुक्केबाजी करने वाली सोमालिया की रमाला अली मैरी कॉम को अपनी प्रेरणा मानती है.

एक वक्त ऐसा था, जब सोमालिया गृह युद्ध की आग में जल रहा था. इस अफ्रीकी देश की राजधानी होने के कारण मोगादीशू सबसे अधिक इसकी चपेट में था. 1990 के दशक में इस शहर से एक परिवार का पलायन हुआ था और यह पलायन इस देश की पहली महिला अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज रमाला अली के उद्भव का कारण बना.

मोगादीशू में हुए एक बम हमले में रमाला के 12 साल के भाई की मौत हो गई और इसके कारण उनकी मां को परिवार सहित घर छोड़कर ब्रिटेन में शरण लेनी पड़ी थी. रमाला उस समय दुधमुंही थीं लेकिन ब्रिटेन जाने के बाद जो कुछ उनके साथ हुआ, उसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी.

ब्रिटेन पहुंचने तक का रमाला के परिवार का सफर मुश्किलों भरा था. लगभग नौ दिन तक नाव में सफर करने के बाद रमाला का परिवार और अन्य लोग शरणार्थी बनकर केन्या पहुंचे और फिर संयुक्त राष्ट्र की मदद से उन्होंने इंग्लैंड में शरण ली. यहीं रमाला बड़ी हुईं और मुक्केबाजी सीखी. शुरुआत में तो मुक्केबाजी उनके लिए वजन घटाने का साधन था लेकिन धीरे-धीरे यह उनके लिए एक जुनून बन गया, जिसे आज वह जी भर कर जी रही हैं.

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दुनिया | 27.07.2017

मर्दों के छक्के छुड़ाती थाई ट्रांसजेंडर बॉक्सर

अपने घर को छोड़कर दूसरे देश आने की परेशानी के बारे में रमाला ने आईएएनएस से कहा, "मेरे लिए यह अधिक मुश्किल नहीं था, क्योंकि उस समय मैं बहुत छोटी थी. हालांकि, मेरी बड़ी बहन के लिए यह मुश्किल था. वह 16 साल की थी और उसे अपने सभी दोस्तों को पीछे छोड़कर नई दुनिया में आना पड़ा. नए देश में नई शुरुआत करनी पड़ी. हमें भाषा को समझने में संघर्ष करना पड़ा."

मुक्केबाजी की शुरुआत के बारे में उन्होंने कहा, "स्कूल से मैंने मुक्केबाजी की शुरुआत की. सोमालिया का खाना बहुत अच्छा था और इस कारण मेरा वजन काफी बढ़ गया था. पलायन के बाद जब हम ब्रिटेन आए और नए स्कूलों में गए, तो मुझे कई बच्चों ने वजन को लेकर ताने कसे और परेशान किया. इसी कारण मैंने वजन घटाने के लिए मुक्केबाजी शुरू की."

उन्होंने कहा, "मुक्केबाजी से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा और इसके जरिए मैं किसी के सामने भी निडर होकर खड़ी हो सकती थी. इसी कारण मैंने नए देश में नए दोस्त भी बनाए. हालांकि, परिवार का समर्थन मुझे नहीं मिला."

महामानव

यह तस्वीर 1966 में मुहम्म्द अली के पसंदीदा फोटोग्राफरों में से एक जर्मनी के थोमास होएप्कर ने शिकागो में खींची थी.

देशभक्ति

कार्ल फिशर ने 1967 में "एस्क्वायर" पत्रिका के लिए अली की यह तस्वीर बनाई. अमेरिका-वियतनाम युद्ध में अमेरिकी सेना में भर्ती होने से मना करने के कारण उन्हें श्वेत अमेरिकियों का गुस्सा भी झेलना पड़ा.

पॉप पंच

1964 में हैरी बेनसन ने कैसियस क्ले की तस्वीरें लीं. उस समय मुहम्मद अली इसी नाम से जाने जाते थे. मायामी में दि बीटल्स से मुलाकात करते क्ले उर्फ अली.

रिंग के शेर

बॉक्सिंग रिंग में ली गई यह शायद मशहूर तस्वीर हो. 1965 में फोटोग्राफर नील लीफर ने अपनी इस फोटो में अली के व्यक्तित्व के आक्रामक पहलू को बहुत खूबी से कैद किया है.

प्रार्थना की शक्ति

क्ले ने 1965 में इस्लाम कुबूल कर अपना नाम बदलकर मुहम्मद अली रखा. थोमस होएप्कर की 1966 की इस तस्वीर में लंदन की रिंग में प्रार्थना में लीन अली.

शो हमेशा जारी

अली के ट्रेनिंग सेशन भी सार्वजनिक आयोजन होते थे. पीटर आंजेलो सीमोन ने 1974 में अली की रस्सी कूदने के अभ्यास की यह तस्वीर ले ली. इसी साल अली ने जॉर्ज फोरमैन को एक जबर्दस्त मुकाबले में हराया जिसे "दि रंबल इन द जंगल" कहा जाता है.

सुंदर तस्वीर

"महानतम" के बाद खुद के बारे में अली दूसरा जो विशेषण इस्तेमाल करते थे, वह था "प्रिटी". वह बाकी मुक्केबाजों की तरह अपने चेहरे पर खरोचों के निशान ना होने को लेकर बड़े खुश होते. शिकागो में बार्बर शॉप में थोमस होएप्कर की ली तस्वीर.

खून, पसीना और आंसू

थोमस होएप्कर की 1966 में ली इस तस्वीर से पता चलता है कि रिंग में शानदार प्रदर्शन करने वाले अली उसके लिए कितनी कड़ी मेहनत किया करते थे.

काम में उस्ताद

इन अच्छी अच्छी तस्वीरों से यह भी पता चलता है कि अली खेल में अच्छे प्रदर्शन के साथ साथ प्रसिद्धि पाने के दूसरे जरूरी तरीकों के बारे में भी जानते थे. फोटोग्राफर अली की तारीफ करते नहीं थकते क्योंकि उनके अनुसार अली फोटोग्राफी के माध्यम को अच्छी तरह समझते थे.

अपने जुनून को पूरा करते हुए रमाला के जीवन में वह पल भी आया, जब उन्होंने एक मुक्केबाज के रूप में पहचान भी कायम की. 2016 में वह ब्रिटिश राष्ट्रीय चैम्पियनशिप जीतने वाली पहली मुस्लिम महिला मुक्केबाज बनीं. रमाला के लिए यह पल सबसे अहम भी था और सबसे मुश्किल भी.

उन्होंने कहा, "मैं जब नेशनल फाइनल्स में पहुंची तो मेरा साथ देने वाला मेरे परिवार का एक भी व्यक्ति वहां मौजूद नहीं था. मेरे कुछ दोस्त थे. मेरी प्रतिद्वंद्वी बॉक्सर का परिवार उसके समर्थन के लिए आया था. उसके पिता ही उसके कोच थे. ऐसे में मुझे बहुत निराशा हुई कि उसके पास इतना समर्थन है और मुझे अपने नेशनल फाइनल्स में खेलने की बात भी मेरे परिवार से छुपानी पड़ी."

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खबरें | 04.11.2012

बॉक्सिंग से टेंशन दूर

रमाला के परिवार में उनकी मां अनीसा माये मालिम और इमाम पिता को यह बिल्कुल भी पसंद नहीं था कि उनकी बेटी मुक्केबाजी करे, क्योंकि इसमें उन्हें छोटे कपड़े पहनने पड़ते थे और यह बात रमाला को बहुत दुखी करती थी. बावजूद इसके उन्होंने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा. रमाला ने आज दुनियाभर में नाम कमाया है. उनका परिवार भी आज उनके साथ है और उन्हें सबसे बड़ी खुशी है कि उनकी मां इस बात से अब खुश हैं.

अब भी समुदाय में कुछ लोग उनका समर्थन नहीं करते हैं. इस पर रमाला ने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है. कुछ लोग सोचते हैं कि महिलाओं का काम घर और बच्चे संभालना है. विश्व चैम्पियनशिप में प्रतिस्पर्धा का स्तर दर्शाता है कि महिलाएं पुरुषों से पीछे नहीं हैं. हम लोग अन्य महिलाओं के लिए भी रास्ता बना रहे हैं, ताकि वह इस खेल में अच्छा प्रदर्शन कर सकें. मुझे लगता है कि जो लोग महिलाओं की मुक्केबाजी के खिलाफ हैं, उन्हें यह चैम्पियनशिप देखनी चाहिए. इससे उनकी सोच बदलेगी."

बकौल रमाला, "हम 1960 के दशक में नहीं रह रहे हैं. यह 21वीं सदी है. मेरी मां ने भी सोचा था कि मेरा मुक्केबाजी करना अच्छा नहीं लेकिन वह अब मेरा समर्थन करती हैं. अगर मेरी मां की सोच बदल सकती है, तो किसी की भी सोच बदल सकती है."

जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा के बारे में पूछे जाने पर रमाला ने पांच बार की विश्व चैम्पियन एमसी मैरी कॉम का नाम लिया. उन्होंने कहा, "मैरी कॉम और मेरे जीवन का संघर्ष एक जैसा ही रहा. उनके परिवार ने भी शुरुआत में उनका समर्थन नहीं किया था. उन्होंने इतनी बड़ी उपलब्धियां हासिल की और वह इस समय में महिला मुक्केबाजी का चेहरा हैं, तो ऐसे में वह सभी के लिए प्रेरणास्रोत हैं. मुझे इससे उम्मीद मिली कि एक दिन मैं उनकी तरह बनूंगी और अन्य लोग मुझे देखते हुए प्रेरणा लेंगे."

मोनिका चौहान (आईएएनएस)

टीम का चयन

लीग के जरिये भारतीय कबड्डी टीम चुनी गई. लीग में तीन टीमों ने हिस्सा लिया. राष्ट्रीय टीम के लिए तीनों से उम्दा खिलाड़ी चुने गए.

कबड्डी कबड्डी

कबड्डी खालिस भारतीय खेल है. इसकी शुरुआत भारत में ही हुई. कबड्डी की एक टीम में सात खिलाड़ी होते हैं. एक सांस में कबड्डी कबड्डी कहते हुए दूसरी टीम के खेमे में जाना, वहां ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ियों को छूकर वापस लौटना, ये आसान नहीं होता.

क्या करती है सामने वाली टीम

सामने वाली टीम विपक्षी टीम के कबड्डी कबड्डी कहकर आए खिलाड़ी को दबोचती है. अगर सात खिलाड़ी विपक्षी खिलाड़ी को अपने इलाके में अच्छे से काबू कर लेते हैं तो उन्हें एक अंक मिलता है.

दम चाहिए

कबड्डी का एक गेम 40 मिनट का होता है. इस दौरान एक बार इंटरवल होता है. फुटबॉल और हॉकी की तरह कबड्डी में भी ताकत और चपलता का जबरदस्त संगम चाहिए.

नारी शक्ति

क्रिकेट के दीवाने भारत में दूसरे खेलों की राह आसान नहीं. लेकिन इसके बावजूद एक कबड्डी टीम की कप्तान ममता पुजारी निराश नहीं हैं. कबड्डी को वह महिलाओं खिलाड़ियों के लिए एक बड़ा मौका मानती हैं.

रिकॉर्ड दर्शक

भारत में महिला कबड्डी लीग के पहले दो मैचों को टीवी पर तीन लाख से 80 लाख लोगों ने देखा. स्टार इंडिया चैनल के मुताबिक दर्शकों की इतनी बड़ी संख्या उत्साह बढ़ाने वाली है.