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मैर्केल पर लगा साम्यवाद का आरोप

१५ मई २०१३

राजनेताओं और जानी मानी हस्तियों के जीवन की कहानी जानने की लालसा अक्सर लोगों में होती है. इसीलिए बाजार में आए दिन नई नई जीवनियां प्रकाशित होती हैं. इन दिनों जर्मनी में चांसलर अंगेला मैर्केल की जीवनी काफी चर्चा में है.

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तस्वीर: Hoffmann und Campe/Piper/Ullstein

कुछ समीक्षक इसे एक बड़ी शख्सियत की जिंदगी का खुलासा बता रहे हैं तो अन्य इसे समय की बर्बादी कह कर खारिज कर रहे हैं. 'डास एर्स्टे लेबेन डेयर अंगेला एम' यानी अंगेला एम का पहला जीवन, यह शीर्षक है इस नई किताब का. चांसलर मैर्केल की जीवनी लिखी है गेओर्ग रोएथ और गुएन्थर लाखमन की जोड़ी ने. लेखकों ने इसमें मैर्केल के जीवन के उस हिस्से को दिखाने की कोशिश की है जिस पर रोशनी डाल कर यह समझा जा सकता है कि वह किस तरह से अपने करियर में आगे बढीं.

साम्यवाद से जुड़े तार

किताब का अधिकतर हिस्सा पूर्वी जर्मनी जीडीआर में रहने वाली युवा मैर्केल के बारे में है. यहां उस समय का वर्णन है जब मैर्केल साम्यवादी युवा संगठन फ्री जर्मन यूथ (एफडीजे) का हिस्सा थीं. किताब के अनुसार वह संगठन के मत प्रचार और आंदोलन करवाने के लिए जिम्मेदार थीं. जीडीआर के किसी निवासी का ऐसे संगठन से जुड़ा होना कोई हैरान कर देने वाली बात नहीं है, लेकिन मौजूदा जर्मनी की चांसलर का साम्यवादी संगठन से तार जुड़ना उनकी छवि के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है. गौरतलब है कि जर्मनी में अगले चार महीनों में चुनाव होने हैं.

Angela Merkel DDR
1973 में दोस्तों के साथ युवा अंगेलातस्वीर: picture-alliance/dpa

डॉयचे वेले से बातचीत में लेखक लाखमन ने कहा कि उन्होंने अपनी 336 पन्नों वाली किताब में वह जानकारी देने की कोशिश की है जो अब तक लिखी गयी मैर्केल की जीवनियों में कभी नहीं दी गई और वह इस सवाल को बहुत अहम मानते हैं कि मैर्केल एफडीजे की अध्यक्ष क्यों बनीं.

वहीं जर्मन सरकार का कहना है कि यह कोई बहुत बड़ा खुलासा नहीं है.मैर्केल ने कभी अपने अतीत को छिपाने की कोशिश नहीं की. 2005 में प्रकाशित हुई किताब 'माइन वेग' यानी मेरी राह में मैर्केल का इंटरव्यू छापा गया था जिसमें भी इस बात का जिक्र था. सरकारी प्रवक्ता गेओर्ग श्ट्राईटर ने चुटकी लेते हुए कहा कि उनकी सलाह है कि पहले इस किताब को पढ़ा जाए.

अतीत से डर नहीं

इसके जवाब में लेखक लाखमन कहते हैं कि 'माइन वेग' में मैर्केल ने बस इतना कहा था कि उन्हें याद नहीं पड़ता कि क्या वह मत प्रचार और आंदोलन का हिस्सा थीं, जबकि अपनी किताब में वह इसे प्रमाणित कर रहे हैं., "हमारे पास दो सबूत हैं". लाखमन ने पता लगाया है कि मैर्केल के अलावा उनके करीबी मित्र भी एफडीजे के अध्यक्ष रहे हैं. इसके अलावा वह बीजीएल का हिस्सा भी रहीं. जीडीआर के कारखानों में कमर्चारी एक यूनियन का हिस्सा होते थे और यूनियन के नेता एक अन्य संगठन बेट्रीब्स-गेवेर्कशाफ्ट्स-लाइटुंग (बीजीएल) का. बीजीएल से जुड़े होने का मतलब होता सीधे साम्यवादी सरकार से जुड़ा होना.

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1971 में 10वीं क्लास के साथ युवा मैर्केलतस्वीर: picture-alliance/dpa

हालांकि जीडीआर विशेषज्ञ मैर्केल की साम्यवादी संगठनों में सदस्यता ज्यादा तूल देने वाली बात नहीं समझते. बर्लिन की फ्री यूनिवर्सिटी के क्लाउस श्रोएडर ने डॉयचे वेले से बातचीत में बताया, "एफडीजे का सदस्य होने या वहां किसी पद को संभालने से कुछ भी सिद्ध नहीं होता."

श्रोएडर बताते हैं कि जीडीआर में किसी संगठन से जुड़े होने को सामाजिक कर्तव्य के रूप में देखा जाता था और युवा संगठन भी इसी का हिस्सा थे. एफडीजे का काम ही था कि वह यूनिवर्सिटी छात्रों के बीच जाए और तरह तरह के कार्यक्रम आयोजित करे. इसी तरह वह बीजीएल से जुड़े होने को भी कोई तवज्जो नहीं देना चाहते हैं, "यह एक ऐसा पद है जो जीडीआर में हजारों लोगों के पास था".

श्रोएडर का कहना है कि जरूरी बात यह है कि मैर्केल अन्य 20 लाख जीडीआर निवासियों की तरह सोशलिस्ट यूनियन पार्टी एसईडी का हिस्सा नहीं बनीं, "जीडीआर में हालात ऐसे थे कि आप खुद को हर गतिविधि से दूर नहीं रख सकते थे. लोगों पर इस बात का दबाव डाला जाता था कि वे संगठनों का हिस्सा बनें और वहां कार्यक्रमों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें". लेकिन एसईडी का हिस्सा बन जाने पर लक्ष्मण रेखा पार हो जाती थी. वह बताते हैं कि एसईडी या ऐसी ही किसी पार्टी से जुड़ जाने का मतलब होता था सीधे सरकार से जुड़ जाना.

लेखक लाखमन खुद मानते हैं कि वह केवल इतना ही बता सकते हैं कि मैर्केल इन संगठनों से जुडी थीं और वहां सक्रिय थीं, लेकिन उन्होंने क्या क्या किया इसका ब्योरा वह नहीं दे सकते. उनका कहना है कि ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब उन्हें अभी नहीं मिले हैं और जो केवल मैर्केल ही दे सकती हैं.

रिपोर्ट: आंद्रेयास ग्रीगो/आईबी

संपादन: आभा मोंढे

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