मौसमी बदलाव पर कड़ी चेतावनी

दुनिया भर के मौसम विज्ञानी आज से स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में मिल रहे हैं, जहां से वे इस बात की सख्त चेतावनी देंगे कि मौसमी बदलाव इंसान का किया धरा है और इस शताब्दी में लू, सूखा और बाढ़ के मामलों में तेजी आएगी.

195 देशों की सरकारों के अधिकारियों और वैज्ञानिकों की बैठक में मौसमी बदलाव पर 31 पेज की रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया जाएगा. इस रिपोर्ट में इस बात की भी व्याख्या करने की कोशिश की गई है कि इस सदी में मानवीय और ग्रीस हाउस गैसों के उत्सर्जन में वृद्धि के बावजूद ग्लोबल वार्मिंग में कमी क्यों आई है.

पर्यावरण परिवर्तन पर अंतरसरकारी पैनल आईपीसीसी शुक्रवार को एक संपादित रिपोर्ट पेश करेगी जो सरकारों के लिए आने वाले समय में कदम उठाने के लिए केंद्रीय गाइड होगी. उन्होंने 2015 तक मौसमी बदलाव के बुरे असर को रोकने के लिए एक संयुक्त राष्ट्र संधि तैयार करना तय किया है.

आईपीसीसी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक ईंधन को जलाने जैसी मानवीय गतिविधियां बहुत ही संभावित रूप से, कम से कम 95 फीसदी संभाव्यता के साथ, 1950 के दशक से वार्मिंग का मुख्य कारण है. 2001 की रिपोर्ट में 66 फीसदी और 2007 की रिपोर्ट में 90 फीसदी संभाव्यता की बात की गई थी.

सूखे का शिकार

मानव निर्मित ग्लोबल वार्मिंग के बारे में आईपीसीसी की ड्राफ्ट रिपोर्ट में कहा गया है, "बहुत ज्यादा भरोसा है कि इसने समुद्र को गर्म कर दिया है, बर्फ को पिघला दिया है, वैश्विक औसत समुद्री जलस्तर को बढ़ा दिया है और मौसम को अत्यधिक बदल दिया है." रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर सरकारें उत्सर्जन में भारी कटौती नहीं करती हैं तो हालत और खराब होगी.

यह रिपोर्ट आईपीसीसी द्वारा पर्यावरण परिवर्तन पर अगले साल तक जारी की जाने वाली चार रिपोर्टों में पहली है. इसे तैयार करने में 39 देशों के 259 लेखकों ने योगदान दिया है. अमेरिका के चिंतित वैज्ञानिकों के संघ (यूनियन ऑफ कंसर्न्ड साइंटिस्ट) से जुड़े आल्डेन नायर ने कहा है कि संभाव्यता का 90 से 95 प्रतिशत होना अपने आप में बहुत चिंता की वजह नहीं है, लेकिन 2010 में रूस में सूखे जैसी घटना ने अनाज की कीमत बढ़ा दी थी.

विश्व भर में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही सरकारों ने 2009 में कोपेनहैगेन में पर्यावरण संधि करने में विफल होने के बाद मौसम में बदलाव के मुद्दे पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है. आईपीसीसी की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि हाथ पर हाथ धरे बैठने से इस सदी में धरती का तापमान 4.8 डिग्री सेल्सियस बढ़ सकता है, लेकिन ग्रीनहाउस गैसों में कटौती से उसे 0.3 डिग्री पर रोका जा सकता है.

पिघलता बर्फ

आईपीसीसी की 2007 की रिपोर्ट में 2100 तक तापमान में 1.1 से 6.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि की आशंका जताई गई थी. इस अंतर की वजह नए कंप्यूटर मॉडलों से की गई गणना है. सरकारों ने धरती में तापमान की वृद्धि को औद्योगिक काल से 2 डिग्री ज्यादा पर रोकने का वायदा किया है.

रिपोर्ट के मसौदे में यह भी कहा गया है कि समुद्री जलस्तर में 20वीं सदी में 19 सेंटीमीटर की वृद्धि हुई है, जबकि 21वीं सदी के अंत तक वह 26 से 81 सेंटीमीटर बढ़ सकता है. इससे तटीय इलाकों को भारी खतरा है. यह वृद्धि 2007 की रिपोर्ट में व्यक्त संभावना से ज्यादा है, लेकिन 2007 में ग्रीनलैंड और अंटार्टिका में बर्फ के पिघलने के जोखिमों को आकलन में शामिल नहीं किया गया था.

इस रिपोर्ट के बाद आईपीसीसी के आकलन पर लोगों का ध्यान कुछ ज्यादा ही होगा क्योंकि 2007 की रिपोर्ट में हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की दर को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया था. बाद में आईपीसी ने रिव्यू के बाद कहा था कि उस भूल के बावजूद रिपोर्ट के मुख्य नतीजे प्रभावित नहीं हुए हैं.

रिपोर्ट में यह भी बताने की कोशिश की गई है कि इस सदी में तापमान ज्यादा क्यों नहीं बढ़ा है. तकनीकी रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐतिहासिक मौसमी रिकॉर्ड में 15 साल का विराम सामान्य बात है. प्राकृतिक बदलाव और सूरज की किरणों को कम करने वाली ज्वालामुखियों के विस्फोट जैसी घटनाओं के कारण यह विराम पैदा हुआ है, लेकिन आने वाले सालों में यह फिर शुरू हो जाएगा.

एमजे/एनआर (रॉयटर्स, डीपीए)

हमें फॉलो करें