रसगुल्ले पर लड़ाई में ओडीशा का पलड़ा भारी

रसगुल्ला दक्षिण एशिया में लोकप्रिय छेने वाली मिठाई है. अब तक माना जाता था कि इसकी उत्पत्ति बंगाल में हुई है, लेकिन ओडीशा का दावा है कि पहली बार 12वीं सदी में जगन्नाथ मंदिर में इसका भोग लगाया गया था.

रसगुल्ले का नाम लेते ही मुंह में मिठास घुलने लगती है और जेहन में बंगाल का नाम उभर आता है. सच कहें तो बंगाल और रसगुल्ला एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं. लेकिन अब इस मिठाई पर पड़ोसी ओडीशा के दावे ने इसकी मिठास में कड़वाहट घोल दी है. विवाद इस बात पर है रसगुल्ला सबसे पहले किसने, कब और कहां बनाया? रसगुल्ले के मालिकाना हक के मुद्दे पर उभरे विवाद ने दो पड़ोसी राज्यों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है. लेकिन अब इस लड़ाई में ओडीशा का पलड़ा भारी नजर आ रहा है. अब बंगाल ने भी माना है कि वह सिर्फ अपने राज्य में बनने वाले रसगुल्ले के लिए भौगोलिक पहचान यानी जीआई टैग हासिल करने का प्रयास कर रहा है. रसगुल्ले पर अपना हक जताने के लिए हाल में ओडीशा ने रसगुल्ला दिवस मनाया.

विवाद की शुरुआत

दरअसल, ताजा विवाद बीते साल उस समय शुरू हुआ जब ओडीशा सरकार ने कटक और भुवनेश्वर के बीच स्थित पाहाल में मिलने वाले मशहूर रसगुल्ले को जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी जी आई मान्यता दिलाने के लिए कोशिशें शुरू कीं. जियोग्राफिकल इंडिकेशन वो मुहर है जो किसी उत्पाद पर उस स्थान विशेष की पहचान बताने के लिए लगायी जाती है. इससे यह भी पता चलता है कि संबंधित उत्पाद में उस जगह की कौन-सी विशेषता है. ओडीशा का दावा है कि रसगुल्ला उसकी देन है. इस विवाद की शुरूआत बीते महीने पुरी में समाप्त हुई रथयात्रा के बाद हुई. जगन्नाथ मंदिर से जुड़े शोधकर्ता सूर्यनारायण रथ शर्मा ने दावा पेश किया कि रसगुल्ले का आविष्कार पुरी में हुआ है. जगन्नाथ ने लक्ष्मी को प्रसाद स्वरूप रसगुल्ला दिया था, तब से हर साल भगवान को इसका भोग लगाया जाता है. मंदिर के जनसंपर्क अधिकारी लक्ष्मीधर पूजापंडा कहते हैं, "12वीं सदी में जब जगन्नाथ मंदिर अस्तित्व में आया, तभी से रसगुल्ला रथयात्रा की धार्मिक रीतियों का हिस्सा बनता आ रहा है."

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

छिपी हुई चीनी

चीनी दो प्रकार की होती है. एक जो प्राकृतिक रूप से खाने पीने की चीजों में पाई जाती है, जैसे फलों में फ्रक्टोज और दूध में लैक्टोज. दूसरी, जो अप्राकृतिक रूप से मिलाई जाती है. रोजाना हम जिस चीनी का इस्तेमाल करते हैं उसमें सुक्रोज मिला होता है.

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

आईस टी

एक गिलास में 5 से 7 चम्मच चीनी होती है. यानि अगर आप एक गिलास आईस टी पी चुके हैं, तो अब आप दिन भर और कुछ भी मीठा नहीं ले सकते. मीठी आईस टी की जगह नमकीन नींबू पानी पीने की आदत डालें.

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

कोल्ड ड्रिंक

कोका कोला के एक कैन में 9 से 10 चम्मच चीनी मिली होती है. पानी के बाद कोक में सबसे बड़ी मात्रा चीनी की ही होती है. यकीन नहीं होता, तो उबाल कर देख लीजिए. पानी उड़ जाने के बाद चीनी बची मिलेगी.

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

ब्रेड

क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि ब्रेड के दो स्लाइस में कितनी चीनी मिली होती है? लगभग 10 चम्मच. जी हां, मैदे और चीनी से भरी हुई व्हाइट ब्रेड आपकी सेहत के लिए बिलकुल भी अच्छी नहीं.

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

केचप

बच्चों की मनपसंद टोमैटो केचप के हर चम्मच में कम से कम आधा चम्मच चीनी होती है. इसीलिए बच्चों को इससे दूर ही रखना चाहिए. सैंडविच और पकौड़ियों के साथ केचप की जगह घर की बनी चटनी का इस्तेमाल करें.

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

चॉकलेट

थोड़ी मात्रा में चॉकलेट सेहत के लिए अच्छी होती है लेकिन बाजार में अधिकतर चॉकलेट बार चीनी से लैस मिलती हैं. मिसाल के तौर पर एक स्निकर्स बार में लगभग 8 चम्मच चीनी होती है.

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

कोल्ड कॉफी

घर पर ही बना रहे हैं, तब तो ठीक है लेकिन कैफे से खरीद रहे हैं, तो सावधान रहें. स्टारबक्स की फ्रैपुचीनो में 8 से 10 चम्मच चीनी होती है. और अगर आप मैकडॉनल्ड्स वाले शेक के शौकीन हैं, तो ध्यान से पढ़ें.. एक ग्लास में 28 चम्मच चीनी होती है.

बताओ, किसमें कितनी चीनी?

आइसक्रीम

आजकल फ्रोजन योगर्ट का चलन चल पड़ा है. इन्हें आइसक्रीम से बेहतर बताया जाता है लेकिन कई बार दही को मीठा करने के लिए इनसे आइसक्रीम की तुलना में ज्यादा चीनी डाली जाती है. एक कप आइसक्रीम (100 ग्राम) में 5 चम्मच चीनी होती है.

दूसरी ओर, बंगाल शुरू से ही रसगुल्ले पर अपना एकाधिकार मानता रहा है. कहा जाता है कि रसगुल्ले का आविष्कार बंगाल के हलवाई नवीन चंद्र दास ने किया था. रसगुल्ले का आविष्कारक होने के नाते ही उनको मिठाइयों की दुनिया का स्टीव जॉब्स भी कहा जाता है. बाद में उन्होंने बेटे केसी दास के नाम से मिठाई दुकानों की चेन शुरू की. उनकी दुकान उत्तर कोलकाता के बागबाजार में थी. वर्ष 1868 में एक दिन प्रयोग के दौरान उन्होंने छेने की छोटी-छोटी गोलियां बनाईं और उनको चाशनी में डाल दिया. उसी दिन एक नई मिठाई का आविष्कार हुआ जिसका नाम रखा गया रसगुल्ला यानी रस से भरा हुआ.

रसगुल्ला जिला

ओडीशा सरकार ने रसगुल्ले की जड़ों का पता लगाने के लिए एक समिति का गठन किया था. अब समिति ने अपनी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि कर दी है कि रसगुल्ले का जन्म ओडीशा में ही हुआ था. अपनी सौ-पेज की रिपोर्ट में समिति ने इस दावे के समर्थन में कई दस्तावेजी सबूत पेश किए हैं. उसने कहा है कि रसगुल्ले पर बंगाल का दावा गलत है. ओडीशा सरकार ने बीती मई में रसगुल्ले के लिए जीआई टैग हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की थी. लेकिन बंगाल सरकार के रसगुल्ला पर अपना हक होने का दावा जताने की वजह से इस प्रक्रिया में देरी हुई.

ओडीशा में राजधानी भुवनेश्वर और कटक के बीच हाइवे पर स्थित अनाम–सा कस्बा पाहाल रसगुल्ले के मालिकाना हक पर उपजे विवाद के बाद अचानक सुर्खियों में है. इस कस्बे को राज्य का रसगुल्ला जिला भी कहा जाता है.राज्य सरकार का दावा है कि पाहाल के हलवाइयों ने ही सबसे पहले रसगुल्ले का आविष्कार किया था. हाइवे के दोनों तरफ स्थित लगभग 80 दुकानों में रसगुल्ले के अलावा छेने की मिठाई भी मिलती है. यहां बनने वाले रसगुल्ले दो आकार के हैं. बड़े साइज का रसगुल्ला सौ रुपए के बारह मिलते हैं और उससे छोटा सौ रुपए के पच्चीस. इस विवाद के बाद अचानक यहां आने वालों की तादाद बढ़ गई है. इस कस्बे के कोई तीन सौ लोग रसगुल्ले बनाने के काम में जुटे हैं.

पाहाल रसगुल्ला व्यावसायी समिति के सचिव निरंजन बेहरा कहते हैं, "हम कई पीढ़ियों से रसगुल्ले बना रहे हैं. अब अचानक कोई (बंगाल) इस पर अपना हक नहीं जता सकता." उनका कहना है कि समिति ने जीआई टैग हासिल करने के लिए सरकार को तमाम दस्तावेजी सबूत सौंप दिए हैं. अब मौजूदा हालात में बंगाल सरकार के सामने अपने कदम पीछे खींचने के अलावा कोई उपाय नहीं बचा है. राज्य सरकार के एक अधिकारी कहते हैं, "हम सिर्फ अपने राज्य में बनने वाले रसगुल्ले के लिए जीआई टैग हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं. ओडीशा से हमारा कोई कंपिटीशन नहीं है."

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

लैवेंडर

जामुनी रंग के लैवेंडर की खुश्बू कमाल की होती है. जुलाई के महीने में इटली और फ्रांस के कई इलाकों में लैवेंडर की खेती होती है. जामुनी रंग के फूलों से भरे खेतों का नजारा अद्भुत होता है. कई लोग इन्हें चाय में मिला कर पीना पसंद करते हैं.

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

जलकुंभी

लाल और पीले रंग के इन फूलों को बहुत चाव से खाया जाता है. यूरोप में अक्सर पांच सितारा रेस्त्रां खाने को इन फूलों से सजाना पसंद करते हैं. इनका स्वाद कुछ कुछ मूली जैसा होता है और इन्हें चीज से भर कर परोसा जाता है.

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

कुकरौंधा

जो लोग खरगोश पालते हैं, वे इस फूल से वाकिफ हैं. इसका स्वाद कड़वा होता है लेकिन खरगोश इसे खाना पसंद करते हैं. बढ़िया शेफ वो है जो इस कड़वाहट का भी इतनी चतुराई से इस्तेमाल करे कि खाने वाले अंगुलियां चाटते रह जाएं. वाइन, जेली और कुकीज में इसे मिलाया जाता है.

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

पैंजी

यह फूल दुनिया के कई देशों और कई रंगों में मिलता है पर इसके बीच का हिस्सा हमेशा काला ही होता है. इसीलिए इसे केक और कुकीज में डाला जाता है. साधारण से दिखने वाले पीले चीजकेक में इस फूल के कारण रंग आ जाते हैं.

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

गेंदा

अक्सर मंदिरों में दिखने वाला गेंदे का फूल खाया भी जा सकता है. गेंदे की कई किस्में होती हैं. इसका इस्तेमाल तरह तरह की क्रीम और लोशन में किया जाता है. साथ ही बेकरी के उत्पादों में भी गेंदे का फूल काम आता है. कभी गेंदे के रस से भरा मफिन चख कर देखें!

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

गुलनार

इन फूलों का इस्तेमाल ज्यादातर पूजा में किया जाता है. लेकिन असल में इनसे स्वादिष्ट जेली और शरबत भी बनते हैं. मक्खन में मिला कर भी इसका आनंद लिया जा सकता है. स्वाद कुछ कुछ लौंग से मेल खाता है.

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

बबूने

इस फूल को पानी में उबाल कर पीने से पेट दर्द से राहत मिलती है. स्वाद हल्का सा कड़वा होता है लेकिन ग्रीन टी के शौकीनों में यह काफी लोकप्रिय है. माना जाता है कि इसकी सुगंध सिरदर्द से भी निजात दिलाती है.

खूबसूरत ही नहीं स्वादिष्ट भी हैं फूल

ग्लैडीओलस

लंबी डंडी वाले ये फूल अक्सर गुलदस्तों में दिखाई देते हैं. कम ही लोग जानते हैं कि इन्हें खाया भी जा सकता है, वह भी यूं ही सलाद में मिला कर.

हमें फॉलो करें