रहमान पर रहम करो

कहीं फतवा है तो कहीं खाप है. कभी कभी भारत को देखकर यह सवाल उठता है कि कुछ लोगों के धार्मिक उन्माद के आगे देश का लोकतंत्र मजबूत है या कमजोर.

भारत में पिछले काफी समय से नागरिक, सामाजिक, लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक चेतना के बजाए प्रतिबंधों, भावनाओं और अपने अपने फलसफे की बात हो रही है. संख्याबल के आधार पर लोकतंत्र को दबाव में लाने की परंपरा पनपन रही है.

ताजा मामला एआर रहमान के खिलाफ जारी कथित फतवे का है. पेशेवर संगीतज्ञ ने अब तक सैकड़ों फिल्मों में संगीत दिया लेकिन कभी विवाद नहीं हुआ. लेकिन पैगंबर मुहम्मद पर बनी ईरानी फिल्म की धुनें बांधते ही वो कुछ स्वघोषित धार्मिक नेताओं के निशाने पर आ गए. सानिया मिर्जा और एआर रहमान के जरिए एक कार्टून में इस पर तंज किया गया है.

फतवा विवाद के चलते अब मुंबई की रजा अकादमी की भी काफी चर्चा हो रही है. सोशल मीडिया में ज्यादातर लोग रजा अकादमी के प्रति अपनी नाराजगी जता रहे हैं. वरिष्ठ स्तंभकार स्वप्न दासगुप्ता ने रजा अकादमी के बारे में जारी एक रिपोर्ट का लिंक शेयर किया है. रिपोर्ट वॉशिंगटन के मिडिल ईस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट के दक्षिण एशिया स्टडीज विभाग के निदेशक तुफैल अहमद ने लिखी है. अहमद के मुताबिक रजा अकादमी भारत में जिहाद की जमीन तैयार कर रही है.

शबाना आजमी और कुछ अन्य हस्तियों को छोड़ बॉलीवुड का बड़ा हिस्सा रहमान के मामले में चुप है. सोशल मीडिया पर सिनेमा जगत की इस चुप्पी की भी काफी गूंज रही है.

रहमान के खिलाफ फतवे की बात सामने आते ही भारतीय न्यूज चैनलों में बहस भी शुरू हो गई. समय समय पर हिन्दुओं को नसीहत देने वाले वाले बीजेपी सांसद साक्षी महाराज भी इस मामले में बोले. साक्षी महाराज का कहना है कि मीडिया को फतवों को जगह नहीं देनी चाहिए. कुछ लोगों ने इसी पर तंज किया कि क्या मीडिया को साक्षी महाराज को भी जगह देनी चाहिए?

ओएसजे/आरआर

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