लिंडाऊ से मंथन का स्पेशल एडिशन

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08.07.2015

लिंडाऊ से मंथन का स्पेशल एडिशन

साइंस का खास शो मंथन इस बार हाजिर है जर्मनी के शहर लिंडाऊ से जहां हर साल नोबेल विजेताओं की मीटिंग होती है. साथ ही, खास मुलाकात नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी से.

लिंडाऊ लेक कॉन्सटांस पर बसा एक छोटा सा द्वीप है जो महज 33 वर्ग किलोमीटर में फैला है. इस साल 65वीं बार लिंडाऊ में नोबेल पुरस्कार विजेताओं की बैठक हो रही है. बैठक की शुरुआत हुई चोटी के वैज्ञानिकों और युवा रिसर्चरों को साथ लाने के लिए, वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए. इस बार 65 नोबेल विजेता और दुनिया भर के 650 युवा रिसर्चर यहां पहुंचे हैं. क्या क्या होता है इस मीटिंग में, कौन कौन आया है इस बार और पहली बार लिंडाऊ पहुंचे नोबेल पुरस्कार विजेता श्टेफान हेल के लिए कैसी है लिंडाऊ की मीटिंग, जानिए मंथन की खास रिपोर्ट में.

दुनिया भर से लिंडाऊ आए युवा रिसर्चरों में भारत के रिसर्चर भी बड़ी संख्या में हैं. कोई कैंसर पर रिसर्च कर रहा है, कोई नैनो टेक्नॉलॉजी पर, तो कोई भविष्य के लिए बेहतर दवाएं बनाने पर. लिंडाऊ कॉन्फ्रेंस इनके लिए एक मौका होता है अपने हीरो से मिलने का, उन लोगों के साथ बैठ कर बातें करने का, जिनके नाम वे किताबों में पढ़ते रहे हैं. जानिए, कैसे पहुंचते हैं युवा रिसर्चर इस कॉन्फरेंस में और कैसा है उनका उत्साह.

साथ ही मिलवाएंगे आपको भारत की एक ऐसी रिसर्चर से जिन्हें मिली है जर्मनी की प्रतिष्ठित चांसलर फेलोशिप. हर साल दुनिया भर से चुनिंदा लोगों को ही यह स्कॉलरशिप मिल पाती है. जानिए, कैसी होती है एक रिसर्च स्कॉलर की दिनचर्या.

कैलाश सत्यार्थी के साथ खास बातचीत

लिंडाऊ में दुनिया भर के नोबेल पुरस्कार विजेता तो पहुंचे ही लेकिन इस साल की हाइलाइट रहे नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित भारत के कैलाश सत्यार्थी. मंथन से खास बातचीत में उन्होंने शिक्षा में विज्ञान के महत्व और शिक्षा के अधिकार पर बात की. सत्यार्थी ने इस बात पर जोर दिया कि युवा रिसर्चर और नोबेल पुरस्कार विजेता दुनिया से अशिक्षा और बाल मजदूरी खत्म करने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. नोबेल लॉरिएट मीटिंग्स में सत्यार्थी की आधे घंटे की स्पीच के बाद ना केवल पूरा हॉल तालियों की आवाज से गूंज उठा, बल्कि उन्हें स्टैंडिंग ओवेशन भी मिला.

कार्यक्रम के अंत में कराएंगे आपको खूबसूरत कॉन्सटांस की सैर. लेक कॉन्सटांस यूरोप के सबसे खूबसूरत इलाकों में से एक है. टूरिस्ट तो यहां आते ही हैं, साथ ही यहां आने वाले रिसर्चरों को भी आसपास का इलाका देखने का मौका मिलता है. इस जगह की खास बात यह है कि लेक कॉन्सटांस के एक तरफ जर्मनी है, दूसरी तरह ऑस्ट्रिया और तीसरी तरफ स्विट्जरलैंड. यानि एक जगह खड़े हो कर आप तीन देश देख सकते हैं. मंथन में इस जगह की एक झलक. देखना ना भूलें मंथन शनिवार सुबह 11 बजे डीडी नेशनल पर.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

गर्मियों का मजा

जर्मनी में छुट्टियां मनाने वाले अधिकतर लोग लेक कॉन्सटांस जाते हैं. गर्मियां हों, भारी सर्दी या फिर पतझड़, सभी मौसमों में यहां पूरा आनंद उठाया जा सकता है. मध्य यूरोप में 536 वर्ग किलोमीटर बड़ी ये झील तीसरी सबसे बड़ी झील है.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

गुनगुनी गर्मी

आल्प्स पर्वतों के पास जर्मनी, ऑस्ट्रिया और स्विट्जरलैंड से लगा हुआ ये इलाका अत्यंत रमणीक है. नाव में झील पर सफर का मजा, नदी किनारे घूमने का मजा और हल्की हल्की धूप.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

स्वर्गिक

बवेरिया के मुख्यमंत्री हॉर्स्ट जेहोफर अपने राज्य को स्वर्ग की सीढ़ी कहते हैं. लेक कॉन्सटांस का 273 किलोमीटर लंबा हिस्सा बवेरिया में है. और साथ ही में है तस्वीरों से निकलता शहर लिंडाऊ.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

ऊंचाई से

ऊपर से देखने पर लेक कॉन्सटांस कुछ ऐसी दिखाई देती है. कहीं कहीं इसकी चौड़ाई 14 किलोमीटर भी है. और अधिकतम गहराई 254 मीटर. हाल ही में पता चला है कि इस झील में नीचे बहुत बड़े छेद हैं. ये हिमयुग में ग्लेशियर के पिघलने से बने हैं.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

आशिकाना मौसम

न ज्यादा ढंड, न ज्यादा गर्मी और खूब रोशनी लेक कॉन्सटांस की खासियत है. हर साल 10 लाख से ज्यादा लोग यहां पहुंचते हैं. माइनाऊ में गुलाबों की 1000 प्रजातियां देखी जा सकती हैं. यहां की स्पैनिश सीढ़ियां भी एक आकर्षण हैं.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

पाषाण युग से

इस झील के आस पास 70 ऐसी जगहें हैं जहां पाषाण काल में लोगों ने झोपड़ियां बनाई थी. 23 बांस पर बने घरों वाला म्यूजियम पाषाण युग और कांस्य युग के जीवन को दिखाता है.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

मछली पकड़ने के लिए

लेक कॉन्सटांस में 45 तरह की मछलियां पाई जाती हैं. इनमें से सबसे ज्यादा व्हाइटफिश बिकती है. पेर्श मछली भी पसंद की जाती है, लेकिन उनकी तादाद कम हो रही हैं. पानी इतना साफ है कि मछलियों को खाने को ही कुछ नहीं मिलता.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

वाइन और सेब

बढ़िया मौसम के कारण यहां अंगूरों और सेब की बढ़िया खेती होती है. कुछ अंगूरों के खेत यहां 400 से 560 मीटर की ऊंचाई पर भी हैं. जर्मनी में हर साल नौ लाख टन सेब होता है और इसमें से हर तीसरा सेब लेक कॉन्सटांस के इलाके से आता है.

आशिकाना लेक कॉन्सटांस

रोमांटिक

गुनगुनी धूप हो, छुट्टियां हो और एक झूला.. इससे स्वर्गिक अनुभव और क्या हो सकता है कि झूले पर लेटे लेटे ढलती शाम का आनंद लिया जा सके.

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