लेजर किरणों से दिखा जमीन में छिपा रोमन साम्राज्य

अतीत के राजों का पता करने के लिए रिसर्चर हवाई यात्रा पर जा रहे हैं. उनके साथ आधुनिक लेजर तकनीक भी है. यह तकनीक अज्ञात भवनों के अवशेषों की जानकारी देती है.

लेजर किरणों की खासियत है कि वे पेड़ों, झाड़ियों और घास को चीरती हुईं जमीन के अंदर देखती हैं. इस तकनीक की मदद से यूरोप के सबसे ताकतवर ढांचे यानी रोमन साम्राज्य की सीमा पर बनाई गई दीवार लाइम्स का फिर से पता लगाया जा रहा है. समय के साथ यह दीवार कहीं छुप गई है. कुछ सेकंड के अंदर ही बड़े इलाकों की मैपिंग की जा सकती है. स्कैनर जमीन तक की दूरी को रोशनी की गति से नापता है. इस डाटा से पता चलता है कि नीचे पेड़ है या सख्त जमीन.

इस काम में लगे पुरातत्वविद मार्टिन शेख बताते हैं कि रोमन काल की सीमाई दीवार के बारे में सौ साल से ज्यादा से शोध हो रहा है, "इस बात की उम्मीद नहीं थी कि बहुत कुछ नया मिलेगा. इसके बावजूद नए पिलर, नए वॉच टावर और लकड़ी के ढांचे मिले हैं. इनके अलावा छोटे किले भी मिले हैं."

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मंथन | 10.02.2015

लेजर से विस्फोटकों का सुराग

2000 साल पहले रोमन साम्राज्य की सीमा 550 किलोमीटर लंबी थी. वहां 900 वॉच टावर और 120 बड़े और छोटे किले मौजूद थे. इस दीवार का मकसद बाहरी आक्रमण से सुरक्षा था. अब इसे प्रकृति ने पूरी तरह अपने आगोश में ले लिया है. यदि लेजर स्कैनर से डाटा न मिला होता, तो ये सब कुछ खो ही गया होता. अब पता चली जानकारी की मदद से अज्ञात टावर फिर से पुराने आकार में बनाए जा सकते हैं. इस तरह रोमन साम्राज्य की रक्षा पंक्ति को नए सिरे से समझा जा सकता है. लेजर समर्थित विश्लेषण ने रोमन दीवारों का लंबे समय से छुपा राज खोल दिया है.

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खबरें | 10.09.2013

रोशनी से सफाई

लेजर पुरातत्ववेत्ताओं का एक और प्रोजेक्ट है वालहाल्ला यानी प्रसिद्ध लोगों को सम्मान देने के लिए बना जर्मन स्मारक. इसे ग्रीस के पैंथियन के अनुरूप बनाया गया है. हालांकि यह स्मारक सिर्फ 200 साल पुराना है लेकिन वैज्ञानिकों के लिए कम दिलचस्प नहीं है. उन्होंने इस बिल्डिंग को अंदर और बाहर से नाप लिया है. अब तल की बारी है. नम जमीन में वे और सटीक स्टेशनरी लेजर स्कैनर लगाते हैं. पूरे ढ़ाचे का सटीक माप कुछ सेकंड में ही मिल जाता है. ऐसी दरारों के बारे में भी पता चलता है, जिन्हें आंखें नहीं देख पाती और दूसरे नुकसान का भी पता चलता है, जो इमारत को खतरे में डाल रहे हैं.

लेजर किरणों की मदद से अतीत की खोज अभी शुरू ही हुई है. पुरातत्वविदों की टीम नई एरोनॉटिक्स तकनीक का विकास कर रही है ताकि सटीक तरीके से इतिहास के बारे में पता लगाया जा सके.

लेजर प्रिंटर से बनेगा विमान

नई उड़ान

विमान उद्योग में कई हिस्से अब 3डी प्रिंटर से बनाए जा रहे हैं. क्या जल्द ही पूरा विमान छापखाने में बनने लगेगा. इसी से जुड़े थे आखेन में हुई लेजर कांग्रेस के कई इनोवेशन.

लेजर प्रिंटर से बनेगा विमान

नया अनुभव

आने वाले दिनों में यात्री विमान से और खूबसूरत नजारों का मजा ले सकेंगे. 3डी लेजर प्रिंटर से निकला एयरबस का ये नमूना दिखाता है कि आने वाले दिनों में विमान का ढांचा कैसा दिख सकता है.

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हल्का है तो अच्छा है

लेजर प्रिंटर से निकले हल्के हिस्से ऐसे दिखेंगे. महीन लेकिन बहुत स्थिर ढांचे का वजन कम होता है. ये हिस्सा सिलेक्टिव लेजर मेल्टिंग से बनी है. पावडर में इसे परत दर परत तैयार किया गया है.

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कम घर्षण

हेलिकॉप्टर की टरबाइन की ये लाइनिंग भी लेजर प्रिंटर में बनाई गई है. इससे हवा नियंत्रित की जाती है. कंघे जैसी संरचना के कारण घर्षण कम होता है क्योंकि घर्षण पैदा करने के लिए सतह ही कम होती है.

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प्रिंटर का जादू

ये हिस्से भी 3डी लेजर प्रिंटर से निकले हैं. अभी ऊपरी सतह थोड़ी खुरदुरी है. इसका कारण इस्तेमाल किया गया मेटल पावडर है. अंदर हालांकि मेटल पूरी तरह फ्लैट और बढ़िया है.

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बड़ी टरबाइन ब्लेड

बड़ी टरबाइन के हिस्से भी प्रिंट हो सकते हैं. यात्री विमान की टरबाइन ब्लेड को बहुत ज्यादा तापमान झेलना होता है. इसके लिए 3डी प्रिंटर एक दम आदर्श हैं क्योंकि वो हर संभव मिश्रधातु के साथ काम कर सकते हैं.

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हिला मिला कर

दो बर्तनों में अलग अलग धातु के पावडर हैं. ये लेजर वेल्डिंग के दौरान काम आते हैं. इंजीनियर इनसे मिश्रधातु का अनुपात बदल सकते हैं. इस तरीके से बने उत्पाद में कई गुण और आ जाते हैं.

लेजर प्रिंटर से बनेगा विमान

आसान रिपेयर

टरबाइन ब्लेड के पुराने होने या घिस जाने पर लेजर से इसे ठीक भी किया जा सकता है. छोटे डब्बे लेजर किरणों के फोकस में धातु छिड़कते हैं और छेद देखते देखते बंद हो जाते हैं.

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इनोवेशन पुरस्कार

2014 में लेजर टेकनोलॉजी में इनोवेशन पुरस्कार फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर सोलर एनर्जी सिस्टम्स, फ्राइबुर्ग के राल्फ प्रॉय को दिया गया है. उन्होंने ऐसा तरीका बनाया जिससे सौर सेल का पिछला हिस्सा सिलिकन वेफर से अच्छे से जुड़ जाता है.

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और ज्यादा बिजली

इस शोध के कारण प्रॉय एक वर्ग सेंटीमीटर के हिस्से में इस तरह के चार सौ कॉन्टैक्ट प्वाइंट बना सके. फायदा ये हुआ कि इन सेलों की बिजली बनाने की क्षमता सामान्य इलेक्ट्रोड की तुलना में पांच फीसदी बढ़ गई.

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