विवादों में घिरी पनामा नहर

अटलांटिक और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाली पनामा नहर 2014 में 100 साल की हो जाएगी. कभी पनामा के हिसाब से जहाज बनते थे, आज नहर छोटी पड़ गई है. अर्थव्यवस्था बनाए रखने के लिए तमाम चेतावनियों के बावजूद नहर चौड़ी की जा रही है.

1914 में जब पनामा नहर खोली गई, तब सालाना 1,000 जहाज इससे गुजरा करते थे. आज हर दिन यहां से 42 जहाज गुजरते हैं. बीते करीब 100 साल से यह नहर विश्व के प्रमुख जलमार्गों में है. ये अटलांटिक को सीधे प्रशांत महासागर से जोड़ती है. इंजीनियरिंग के लिहाज से पनामा नहर एक अजूबा है. यह दुनिया का अकेला ऐसा जलमार्ग है जहां जहाज का कप्तान अपने जहाज का नियंत्रण पूरी तरह पनामा विशेषज्ञ कप्तान को सौंप देता है. प्रशांत और अटलांटिक महासागर के बीच बनी इस नहर से गुजरने के लिए हजारों टन भारी जहाज को 85 फुट ऊपर उठाया जाता है और ये काम तीन ब्लॉकों यानी लॉकों में पानी भरकर किया जाता है.

पहले जहाज को सबसे निचले लॉक में लाया जाता है और फिर लॉक को बंद कर उसमें पानी भरा जाता है. पानी से जहाज उठने लगता है. इसके बाद भारी और बेहद ताकतवर लोकोमोटिव इंजन जहाज को साइड में टकराने से बचाते हुए खींचते हैं और दूसरे लॉक में ले जाते हैं. फिर दूसरे लॉक में भी ऐसा ही होता है, पानी भरना, जहाज को खींचना और आगे बढ़ना. तीन लॉकों के जरिए ऊपर उठने के बाद जहाज ताजे पानी की गाटून झील से गुजरते हैं. दूसरे छोर पर पहुंचने के बाद जहाजों को फिर इसी तरह 85 फुट नीचे लाकर महासागर में उतारा जाता है.

अगर पनामा ना हो तो जहाजों को करीब दो हफ्ते तक चक्कर लगाना पड़ेगा.

पानी की किल्लत

लेकिन वक्त के साथ जहाजों का आकार तिगुना हो चुका है. आज के जहाज करीब 400 मीटर लंबे और 50 मीटर चौड़े हैं. पनामा के मुहाने उनके लिए छोटे पड़ते हैं. इससे पनामा को नुकसान हो रहा है. लिहाजा अब इस पर दो चौड़े मुहाने बनाए जा रहे है लेकिन इन लॉकों के लिए दोगुना पानी चाहिए. जलवायु विज्ञानियों की मानें तो भविष्य में मध्य अमेरिका में कम बारिश होगी. ऐसे में पनामा नहर के लिए इस्तेमाल होने वाले ताजा पानी को लेकर बहस छिड़ी है.

पर्यावरण कार्यकर्ता रिकार्डो मार्टिनेज कहते हैं कि लॉक खुलने से लाखों लीटर ताजा पानी बर्बाद हो जाता है, "इस पानी को जल संकट से जूझ रहे पूर्वी पनामा के लोगों में सप्लाई किया जा सकता है. सरकार पनामा वालों को ना तो पानी देती है और ना ही नहर से होने वाला मुनाफा. हमें लगता है कि नहर का विस्तार लोगों के नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी कंपनियों के लिए हो रहा है."

रिकार्डो की संस्था ने पता लगाया है कि बीते सालों में नहर के आस पास की झील खराब हो गई हैं, "झील में खारापन बढ़ रहा है और इसका सीधा असर झील की जैव विविधता पर पड़ रहा है. नए लॉक इस्तेमाल होने से खारे और मीठे पानी के मिल जाने से पानी में रहने वाले जीवों को नुकसान होगा." पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नए लॉकों की वजह से हर दिन करीब 10 अरब लीटर ताजा पानी बर्बाद हो जाएगा और बहकर समुद्र में चला जाएगा. पूर्वी पनामा में वैसे ही पीने के पानी की किल्लत है.

तीन लॉकों के जरिए ऊपर उठने के बाद जहाज ताजे पानी की गाटून झील से गुजरते हैं.

पनामा नहर की अहमियत

पनामा नहर पूर्वी अमेरिका से पश्चिमी अमेरिका या फिर यूरोप से पश्चिमी अमेरिका जाने वाले जहाजों की 12,669 किलोमीटर की यात्रा बचाती है. अगर पनामा ना हो तो जहाजों को करीब दो हफ्ते तक करीब 13 हजार किलोमीटर लंबा चक्कर लगाना पड़ेगा. पनामा के जरिए यह काम 10 घंटे में हो जाता है. यही वजह है कि तमाम मुश्किलों से लड़ते हुए इंसान ने यह नहर बनाई. इसका असर यह हुआ कि अगले 100 सालों तक पनामा ने जहाज निर्माण कंपनियों के लिए स्टैंडर्ड तय कर दिए.

लेकिन वक्त के साथ कारोबार का अंदाज बदल रहा है, उसके केंद्र बदल रहे हैं. पहले जो चीज एक ही जगह बनती थी अब वह दुनिया भर में कई जगहों पर बन रही है. एशिया और अन्य देशों के विकास करने से जहाज बनाने वाली कंपनियों को नया बाजार मिला है. इस नए बाजार के हिसाब से आधा या पूरा तैयार माल ढोने के लिए और ज्यादा बड़े जहाज बन रहे हैं. अनुमान है कि 2020 तक माल ढुलाई का 40 फीसदी बाजार विशाल जहाजों पर निर्भर होगा. पनामा चाहता है कि उसकी नहर इस कारोबार का फायदा उठाए. इसीलिए नहर चौड़ी की जा रही है, हालांकि पर्यावरण के लिहाज से ये बड़ा जोखिम है.

रिपोर्ट: ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: ईशा भाटिया

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