शरणार्थियों के लिए क्यों बंद खाड़ी देशों के द्वार

अगस्त के अंत तक 40 लाख से भी अधिक सीरियाई अपना देश छोड़ कर भाग चुके हैं. सवाल यह है कि खाड़ी सहयोग परिषद के छह देशों में इनमें से कितनों को शरण मिली है.

बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने शरणार्थियों की मदद के लिए अरबों की राशि दान में दी है. लेकिन प्रवासियों को अपने यहां स्वीकार करने में उनकी कथित अनिच्छा को लेकर प्रश्न उठ रहे हैं.

विश्व के सामने खड़े इस अभूतपूर्व मानवीय संकट की घड़ी में यूरोप के मुकाबले खुद से कहीं ज्यादा मिलते जुलते सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्यों वाले सीरिया जैसे देश के लोगों को पुर्नस्थापित करने में खाड़ी देश पीछे क्यों दिख रहे हैं?

यह सवाल केवल पश्चिम में ही नहीं, बल्कि खुद खाड़ी देशों में भी उठाया जा रहा है. हाल के दिनों में खाड़ी के कई सोशल मीडिया यूजरों ने इस हैशटैग "#Welcoming_Syria's_refugees_is_a_Gulf_duty" के साथ अपने असंतोष को व्यक्त किया है.

जॉर्डन में शरण लेने वाले सीरियाई शरणार्थी 30-वर्षीय अबु मोहम्मद कहते हैं, "खाड़ी देशों को यह देखकर शर्म आनी चाहिए कि कैसे यूरोप ने शरणार्थियों के लिए अपने द्वार खोल दिए हैं, जबकि हमारे लिए उनके दरवाजे बंद हैं." इन गर्मियों में यूरोप में सीरियाई शरणार्थियों की बाढ़ आई हुई है. केवल जर्मनी ही इस साल 8,00,000 नए शरणार्थी आवेदन स्वीकार करने वाला है.

कतर के एक प्रमुख अखबार गल्फ टाइम्स ने अपने एक हालिया संपादकीय में लिखा है, "दुखद है कि अमीर खाड़ी देशों की ओर से अब तक इस संकट पर कोई बयान भी जारी नहीं हुआ है. उन शरणार्थियों की मदद के लिए रणनीति तैयार करना तो दूर की बात है, जिनमें ज्यादातर मुसलमान हैं."

एक विशिष्ट अमीराती ब्लॉगर सुल्तान अल कासेमी ने लिखा है कि खाड़ी देशों के सामने अपनी शरणार्थी नीतियों को बदलने का एक "आदर्श, नीतिपरक और जिम्मेदारी दिखाने का" मौका था. तुर्की के तट पर बह कर पहुंचे तीन साल के सीरियाई बच्चे आयलान कुर्दी के शव के अंतिम संस्कार के समय भी उसके पिता ने कहा, "मैं चाहूंगा कि यूरोपीय देश ही नहीं, बल्कि अरब सरकारें देखें कि मेरे बच्चों का क्या हुआ. उन्हें देखते हुए वे दूसरों की मदद करें."

विश्लेषकों का मानना है कि इन आलोचनाओं से खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) देशों पर कोई तेज असर दिखना मुश्किल है. इन्होंने संयुक्त राष्ट्र के शरणार्थी कन्वेंशन पर भी हस्ताक्षर नहीं किए हैं. हालांकि इन देशों ने लेबनान, जॉर्डन और तुर्की में शरणार्थियों के लिए अच्छी खासी आर्थिक मदद भेजी है. लेकिन साथ ही सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद के विरोधियों की मदद के लिए भी धन दिया है. विरोध करने वाले मुख्यतया सुन्नी विद्रोही हैं जो असद को सत्ता से हटाना चाहते हैं. असद के समर्थन में शिया बहुल ईरान है.

जान हथेली पर लिए सीरिया से जर्मनी

घर छोड़ने की मजबूरी

2011 से जारी सीरियाई संघर्ष में अब तक 2,40,000 से भी अधिक लोगों की जान जा चुकी है. किसी तरह सीरिया से जान बचा कर भागने कि लिए लोग कोई भी ट्रेन, पैदल या फिर मानव तस्करों तक की मदद ले रहे हैं.

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पहला स्टॉप: तुर्की

सीरिया से तुर्की के इज्मीर प्रांत पहुंचने वाले कई लोग वहां हॉस्टलों में रहते हैं. जो इसका खर्च नहीं उठा सकते, वे पार्कों और फुटपाथों पर ही सोने को मजबूर होते हैं.

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ग्रीस की ओर

तुर्की छोड़ने के बाद कई रिफ्यूजी ग्रीस की ओर से यूरोप में प्रवेश की कोशिश करते हैं. तस्वीर में दिख रहा एक सीरियाई समूह तुर्की के तटीय इलाके से एक फुलाने वाली छोटी सी नाव में बैठकर ग्रीस के कॉस द्वीप की ओर बढ़ते हुए.

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यूरोप की मुख्यभूमि तक

तस्वीर में एक छोटी सी सीरियाई लड़की कॉस से ग्रीस मुख्यभूमि पर पिरेउस तक जाने वाली फेरी में. दस घंटे की यात्रा के बाद कई रिफ्यूजी उत्तर की ओर बढ़ते हुए ग्रीस और मैसेडोनिया की सीमा और फिर मैसेडोनिया से होते हुए सर्बिया की ओर इस "बाल्कन रूट" पर आगे बढ़ते हैं.

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सीलबंद सीमाएं

अगस्त में मैसेडोनिया ने शरणार्थियों की बढ़ती तादाद को देखते हुए आपातकाल घोषित कर दिया. सेना को देश की सीमाओं को बंद करने के आदेश दिए गए. तस्वीर में मैसेडोनिया से सर्बिया जाने वाली ट्रेनों में भरे हुए शरणार्थी.

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बेलग्रेड में सुस्ताते

सर्बिया की राजधानी बेलग्रेड में कई रिफ्यूजी सार्वजनिक स्थलों पर कुछ समय तक रुक कर सुस्ताते हैं. अंतरराष्ट्रीय आप्रवासन संगठन के आंकड़े दिखाते हैं कि 2015 की शुरुआत से जून के मध्य तक ही करीब 1,60,000 प्रवासियों ने दक्षिण यूरोपीय देशों में कदम रखे हैं.

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सर्बिया के बाद हंगरी बेहाल

हंगरी में गैरकानूनी रूप से सीमा पार करने की कोशिश करने वालों के लिए सजा कड़ी कर दी गई है. ईयू नियमों के अनुसार पकड़े जाने पर ऐसे लोगों का हंगरी में ही रजिस्ट्रेशन करवाया जाना चाहिए, लेकिन रिफ्यूजी आगे जर्मनी तक जाने की कोशिश कर रहे हैं.

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अप्रत्याशित रोड़ा

हंगरी के बाद अगला पड़ाव ऑस्ट्रिया है, जहां इनको शरण के लिए पंजीकृत किए जाने पर लोगों ने विरोध प्रदर्शन शुरु कर दिया. ऑस्ट्रिया के बिचके स्टेशन पर ऐसे ही एक प्रदर्शन में जर्मनी जाने देने की मांग करती एक रिफ्यूजी बच्ची.

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गर्मजोशी से स्वागत

कई दिनों तक हंगरी में अटके रहने के बाद हजारों रिफ्यूजी ऑस्ट्रिया और जर्मनी तक पहुंच रहे हैं. जर्मन शहर म्यूनिख में तो कई जर्मन एक बेहद मुश्किल यात्रा के बाद जर्मनी पहुंचने पर रिफ्यूजी दल के स्वागत के लिए पहुंच रहे हैं.

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अब आगे क्या?

जर्मन राजनीतिज्ञ बड़ी संख्या में जर्मनी पहुंचने वाले रिफ्यूजी को शरण देने संबंधी व्यवस्था और खर्च का हिसाब लगाने में व्यस्त हैं. केवल सीरिया से भागने वालों के लिए ही नहीं बल्कि उन्हें शरण देने वालों के सामने भी एक बड़ी चुनौती है.

सीरिया से आने वाले ज्यादातक शरणार्थी भी खाड़ी के अधिकतर लोगों की ही तरह सुन्नी संप्रदाय से हैं, लेकिन फिर भी शरण देने की तैयारी नहीं है. यूएई, कतर जैसे कुछ छोटे खाड़ी देशों में पहले से ही लाखों विदेशी कामगार रहते हैं जिनकी संख्या स्थानीय लोगों से भी अधिक है. खाड़ी देशों में आईएस जैसे संगठनों से सुरक्षा खतरों और विदेशियों की अधिकता से देश का संतुलन बिगड़ने का भी डर जताया जा रहा है.

आरआर/आईबी (एएफपी)

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