शैवाल से कैंसर का इलाज

जर्मनी में रिसर्चर शैवाल की मदद से कैंसर का इलाज ढूंढ रहे हैं. शोधकर्ताओं को एक खास पदार्थ मिला है जिससे शैवाल खुद को समुद्री हमलों से बचाते हैं.

इसके लिए उत्तरी जर्मनी के शहर कील में तटीय शोध और मैनेजमेंट सेंटर की प्रयोगशाला में पौधों को फिल्टर किया जाता है. कील में रिसर्चर कर रहे लेवेंट पीकर बताते हैं कि दिलचस्प प्राकृतिक तत्वों को ढूंढने के लिए समुद्र में हज़ारों मीटर गहरी डुबकी लगाना जरूरी नहीं है, "सब कुछ तट पर मिल जाता है. हम फिर इन्हें जमा करते हैं और प्रयोगशाला में इन पर काम करते हैं ताकि कैंसर खत्म करने की इनकी क्षमता का पता लगाया जा सके."

पीकर का कहना है कि उन्हें जो शैवाल तट पर मिलते हैं उन्हें भी अपने पर्यावरण में तनाव का सामना करना पड़ता है, "जैसे कि आसपास उगने वाले पेड़ पौधे. एल्गी इनके खिलाफ खास रसायन पैदा करती है जो कैंसर पर असरदार हो सकते हैं."

मिसाल के तौर पर एल्गी का यह खास हथियार पैंक्रियास कैंसर को रोकने में सफल हो सकते हैं. आज तक इसका इलाज नहीं मिल पाया है और रिसर्चरों का मानना है कि एल्गी से इस मर्ज की दवा मिल सकेगी.

इसके अलावा खूबसूरती के लिए खास क्रीमों में एल्गी का इस्तेमाल हो रहा है. पीकर बताते हैं, "समुद्री जीवों में बीमारियों के खिलाफ़ रसायनों के मिलने की संभावना बड़ी होती है क्योंकि ये सीधे अपने हमलावरों या बैक्टीरिया का सामना करते हैं. जमीन पर पौधों और उनके हमलावरों के बीच हवा होती है."

हवा के मुकाबले बैक्टीरिया पानी में ज्यादा तेजी से बढ़ते हैं. और इनसे बचने के लिए शैवाल में खास क्षमता विकसित होती है. लेकिन अब भी रिसर्चर जान नहीं पाए हैं कि दवाइयों जैसे इन रसायनों का राज क्या है. उन्हें बस इतना पता है कि इनसे इलाज हो सकता है.

कील विश्वविद्यालय में कैंसर की कोशिकाओं पर एल्गी के रसायन का असर देखा जाता है. पीकर कहते हैं, "हम कोशिश कर रहे हैं कि इन रसायनों को और साफ किया जाए और इन्हें टेस्ट किया जाए ताकि हम इनके असर को देख सकें. यह जान सकें कि कौन से रसायन और कौन से तत्व इस असर के लिए जिम्मेदार हैं. इस तरह हम उन खास तत्वों तक पहुंच सकते हैं जिनसे दवा बनाई जा सके."

लेकिन प्रयोगशाला से दवा की दुकान का रास्ता लंबा है. कील के शोधकर्ता समुद्र की गहराइयों में छिपे रहस्य ढूंढ रहे हैं. आखिरकार समुद्र को जीवन का स्रोत भी माना जाता है और शायद कैंसर के बाद जिंदगी का राज भी यहीं कहीं छिपा हो.

रिपोर्ट: ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: ईशा भाटिया

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