संस्कृति की हलचलों का साल 2015

जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ही जानीमानी लेखिका नयनतारा सहगल ने आगाह किया था कि देश खतरनाक रास्ते पर है, अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले बढ़ गए हैं. कौन जानता था कि उनकी ये बात पूरे साल देश को आंदोलित करती रहेगी.

2015 का साल, सबसे ज्यादा अगर याद रखा जाएगा तो सांस्कृतिक उथलपुथल के लिए. अर्थव्यवस्था और राजनीति से अधिक सुर्खियों में थी संस्कृति. ये संस्कृति थी असहिष्णुता और सहिष्णुता की, हिंसा के सामने शांति की, बीफ के बरक्स बहस और अभिव्यक्ति पर अंकुश की. साल बीतते बीतते ये रिपोर्ट भी आ गई कि दादरी में सांप्रदायिक भीड़ ने बीफ़ होने के जिस उन्माद में भारतीय वायुसेना में एक युवा अफसर के पिता मोहम्मद अखलाक को मार डाला था वो दरअसल बीफ नहीं बकरे का गोश्त था. ये वारदात भारत की बहुसंस्कृति और सहिष्णु देश की छवि पर एक गहरी चोट थी.

गाय और मांस की इस उत्तेजना के बीच अभिव्यक्ति की आजादी पर हमलों की वारदातें साल भर सामने आती रहीं. सबसे पहले सीपीआई के मराठा नेता गोविंद पानसरे और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी जैसे तर्कवादियों और एक्टिविस्टों की हत्याओं से लोग स्तब्ध रह गए. तमिल कथाकार पेरुमल मुरुगन ने हिंदू कट्टरपंथियों से मिले अपमान और धमकियों के बाद कह दिया कि लेखक मुरुगन की मृत्यु हो गई है, अब वह सिर्फ एक अध्यापक है. हमलों और हत्याओं के प्रतिरोध में कहानीकार उदयप्रकाश ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया. इसके बाद दादरी कांड हो गया तो मानो संस्कृति, समाज और साहित्य की चूलें हिलने लगीं. फिर तो एक के बाद एक विभिन्न भारतीय भाषाओं के 40 से अधिक लेखकों ने अपने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने शुरु किए. शुरुआती लेखकों में नयनतारा सहगल, अशोक वाजपेयी, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, मनमोहन, काशीनाथ सिंह जैसे नाम शामिल थे.

तीन धर्म एक छत

एक छत के नीचे

बर्लिन में जल्द ही एक ऐसी जगह होगी जहां तीन धर्मों के लोग एक ही छत के नीचे प्रार्थना और ईश वंदना कर सकेंगे. यह प्रार्थना भवन तीन अब्राहमी धर्मों इस्लाम, ईसाइयत और यहूदियों को एक साथ लाएगा.

तीन धर्म एक छत

तीन की पहल

हाउस ऑफ वन के विचार को पास्टर ग्रेगोर होबैर्ग, रब्बी तोविया बेन-चोरिन और इमाम कादिर सांची अमली जामा पहना रहे हैं. कादिर सांची का कहना है कि तीनों धर्म अलग अलग रास्ता लेते हैं लेकिन लक्ष्य एक ही है.

तीन धर्म एक छत

इतिहास वाली जगह

जहां इस समय साझा प्रार्थना भवन बन रहा है वहां पहले सेंट पेट्री चर्च था जिसे शीतयुद्ध के दौरान नष्ट कर दिया गया. आर्किटेक्ट ब्यूरो कुइन मालवेजी ने हाउस ऑफ वन बनाने के लिए चर्च के फाउंडेशन का इस्तेमाल किया है.

तीन धर्म एक छत

शुरुआती संदेह

शुरू में कोई मुस्लिम संगठन इस प्रोजेक्ट में शामिल नहीं होना चाहता था. बाद में तुर्की के मॉडरेट मुसलमानों का संगठन एफआईडी राजी हो गया. उन्हें दूसरे इस्लामी संगठनों के उपहास का निशाना बनना पड़ा.

तीन धर्म एक छत

आलोचना का निशाना

इस प्रोजेक्ट को नियमित रूप से आलोचना का निशाना बनाया गया है. कैथोलिक गिरजे के प्रमुख प्रतिनिधि मार्टिन मोजेबाख को शिकायत है कि इमारत की वास्तुकला इसकी धार्मिकता का प्रतिनिधित्व नहीं करती.

तीन धर्म एक छत

चंदे पर भरोसा

हाउस ऑफ वन प्रोजेक्ट के संचालक इसके विकास में आम लोगों की भूमिका के महत्व से वाकिफ हैं. इसलिए वे चंदे पर भरोसा कर रहे हैं. इमारत बनाने में 43.5 लाख ईंटें लगेंगी. हर कोई इन्हें खरीद सकता है.

तीन धर्म एक छत

शांति की कोशिश

इस प्रोजेक्ट के कर्णधारों की उम्मीद है कि नई इमारत तीनों धर्मों के लोगों के बीच सांस्कृतिक आदान प्रदान का केंद्र बनेगी और इसकी वजह से पारस्परिक आदर पैदा होगा. पड़ोसी के बारे में जानना उन्हें करीब लाता है.

चुनिंदा फिल्मकारों सईद मिर्जा, आनंद पटवर्धन, देबाशीष बनर्जी और गोविंद निहलानी आदि ने भी प्रतिरोध के समर्थन में अपने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार लौटा दिए. प्रसिद्ध लेखिका अरुंधति रॉय ने भी पटकथा के लिए मिला अपना राष्ट्रीय पुरस्कार लौटाया. प्रमुख वैज्ञानिक पीएन भार्गव ने पद्मभूषण वापस कर दिया. अभिव्यक्ति की आजादी और असहिष्णुता पर अपने बयानों से सबसे ज़्यादा ध्यान खींचा भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी, भारतीय मूल के ही विख्यात ब्रिटिश चित्रकार अनीश कपूर और अंग्रेजी लेखक विक्रम सेठ ने. जानेमाने इतिहासकारों और वैज्ञानिकों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा. अंतरराष्ट्रीय साहित्य की नामी संस्था पेन इंटरनेशनल ने इस प्रतिरोध को अपना समर्थन दिया.

हालांकि इसके समांतर सरकार समर्थक कलाकार भी मैदान में कूदे. इनकी अगुवाई जानेमाने फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने की. लेकिन फिल्मी गलियारे से भूचाल तब उठा जब बॉलीवुड स्टार शाहरुख खान ने कहा कि देश में असहिष्णुता का माहौल है और आमिर खान ने अपनी पत्नी के हवाले से कुछ ऐसी ही आशंका जाहिर की. बीजेपी समर्थकों की जमात उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गई और उन पर चौतरफा हमला बोल दिया.

संस्कृति की दुनिया में 2015, सरकार और सत्ता के अहंकारी रवैये के लिए भी याद किया जाएगा. जिसका एक प्रमुख शिकार बना देश का शीर्ष फिल्म ट्रेनिंग संस्थान, एफटीटीआई जिसमें अध्यक्ष पद पर विवादास्पद टीवी एक्टर गजेंद्र चौहान की नियुक्ति की गई. इसके खिलाफ एफटीटीआई के छात्रों ने एक लंबा आंदोलन चलाया. फिल्म निर्देशक और मोदी के चुनाव प्रचार के लिए गीत बनाने वाले पहलाज निहलानी को फिल्म सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया. इसी तरह शिक्षा, इतिहास और संस्कृति के उच्च संस्थानों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई लोगों की नियुक्ति भी विवादों में रहीं.

अभिव्यक्ति पर हमले थमे नहीं. एक राहत जरूर आई आईटी एक्ट की विवादास्पद 66ए धारा को हटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के रूप में. लेकिन इसी बीच मशहूर पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के मुंबई कार्यक्रम को कट्टरपंथियों की चेतावनी की वजह से रद्द करना पड़ा. यहीं पर पूर्व पाकिस्तानी विदेश मंत्री कसूरी की किताब के विमोचन के मौके पर सुधींद्र कुलकर्णी पर स्याही भी फेंकी गई. पिछले दिनों तमिल लोक कवि एस कोवान पर देशद्रोह का आरोप ठोंक दिया गया क्योंकि वो सरकार विरोधी गाने गा रहे थे.

शिव सेना का पाकिस्तान विरोध

वीना मलिक और अली सलीम

रिएलिटी शो बिग बॉस में पाकिस्तानी कलाकार वीना मलिक और अली सलीम की प्रतिभागिता पर शिव सेना ने आपत्ति जताई. उन्होंने आयोजकों से दोनों को कार्यक्रम से बाहर निकालने को कहा.

शिव सेना का पाकिस्तान विरोध

पाकिस्तान के साथ क्रिकेट नहीं

साल 1999 में पाकिस्तान के भारत में क्रिकेट टूर के विरोध में शिव सेना ने फिरोजशाह कोटला की पिच को खोद डाला. हालांकि ऐसा करने पर भी सिरीज रोकी नहीं गई. 2006 में मुंबई में सीरियल ब्लास्ट के बाद शिव सेना ने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी के जयपुर और मोहाली में पाकिस्तान के साथ होने वाले मैचों का भी विरोध किया.

शिव सेना का पाकिस्तान विरोध

गायकी का कार्यक्रम

साल 2012 में एक टीवी कार्यक्रम में पाकिस्तानी कलाकारों के हिस्सा लेने के खिलाफ शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मिलकर साथ आए. उनका कहना था कि राज्यसभा सदस्य अनिल देसाई और गायिका आशा भोसले को पाकिस्तानी कलाकारों के साथ एक ही मंच पर नहीं होना चाहिए.

शिव सेना का पाकिस्तान विरोध

प्रो कबड्डी लीग

भारत में प्रो कबड्डी लीग के प्रारंभिक सत्र 2014 में तीन पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शिव सेना की धमकी के कारण मैचों में नहीं खिलाया गया. शिव सेना ने आयजकों से मांग की कि आने वाले सालों में पाकिस्तानी खिलाड़ियों को मुंबई या पुणे में होने वाले मैचों में ना खिलाया जाए.

शिव सेना का पाकिस्तान विरोध

आतिफ असलम का कॉन्सर्ट

25 अप्रैल 2015 को पुणे में पाकिस्तानी गायक आतिफ असलम का एक कॉन्सर्ट होना था जिसे शिव सेना से मिली धमकी के बाद रद्द कर दिया गया.

शिव सेना का पाकिस्तान विरोध

गजल गायक गुलाम अली

पाकिस्तानी गजल गायक गुलाम अली को 10 अक्टूबर को भारतीय गजल गायक जगजीत सिंह की पुण्यतिथि पर पुणे में आयोजित एक कार्यक्रम में गाने के लिए बुलाया गया था. इसे भी शिव सेना की धमकी के बाद रद्द कर दिया गया.

शिव सेना का पाकिस्तान विरोध

खुर्शीद कसूरी की किताब

पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद कसूरी की किताब के विमोचन के लिए उन्हें ऑबजर्वर रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक सुधींद्र कुलकर्णी ने मुंबई बुलाया था. शिव सेना की धमकी के बाद भी जब कुलकर्णी पीछे नहीं हटे तो पार्टी कार्यकर्ताओं ने कार्यक्रम से पहले उनके मुंह पर स्याही पोत दी.

शाहरुख के बयान की गाज उनकी फिल्म “दिलवाले” पर गिरी जिसके खिलाफ प्रदर्शन हुए. कुछ ऐसा ही सुलूक “बाजीराव मस्तानी” के साथ किया गया क्योंकि उसमें कुछ दृश्य कथित रूप से पेशवा आचार के अनुकूल नहीं लग रहे थे. हिंदी फिल्मों में पहले “तनु वेड्स मनु रिटर्न्स” और “पीकू” ने धमाल किया. फिर बारी आई “बाहुबली” और “बजरंगी भाईजान” की. “तमाशा” को भी लोगों ने पसंद किया. लेकिन संस्कृति की दुनिया में साल खत्म होते होते एक तमाशा और हुआ. गाय फिर विवादों में लौटी. जयपुर के एक कला आयोजन में एक कलाकार ने प्लास्टिक की गाय बनाकर उसे हवा में लटका कर पर्यावरण की चिंता करता इंस्टॉलेशन पेश किया तो उसे हिरासत में ले लिया गया और आयोजकों को जलील किया गया.

हिंदी साहित्य के लिए एक तरफ ये समाज में उतरने की एक नई करवट का साल था तो गहरा शोक भी ये साल दे दे गया. लंबी बीमारी और अदम्य जिजीविषा के बाद हिंदी के वरिष्ठ कवि वीरेन डंगवाल नहीं रहे. अपनी ही तरह के जनकवि और छात्रों-एक्टिविस्टों में लोकप्रिय रमाशंकर विद्रोही का निधन हुआ. फिल्मी दुनिया में पहले नेत्रहीन संगीतकार रवीन्द्र जैन और अपने दौर की सिने तारिका साधना नहीं रहीं.

भारत के पिकासो कहे जाने वाले प्रख्यात पेंटर एमएफ हुसैन का ये जन्मशती वर्ष भी था लेकिन सांस्कृतिक झंझावात में किसी को अपने इस महानायक की याद नहीं आई. लेकिन अंततः राहत ये रही कि कट्टरपंथियों की समाज को घिनौने ध्रुवीकरण में झोंकने की कोशिश कामयाब नहीं हो सकी. क्योंकि देश की बहुलतावादी संस्कृति लाख घायल होकर भी मिटती नहीं, कायम रहती है और अपने जख़्मों को आप सोखते रहने की उसमें एक घनीभूत विलक्षणता है.

ब्लॉग: शिवप्रसाद जोशी

हमें फॉलो करें