समझौते पर भारी पड़ती मुर्गी

अमेरिका और यूरोपीय संघ आपसी कारोबार को नई ऊंचाई पर ले जाना चाहते हैं लेकिन मुर्गी का मीट आड़े रहा है. यूरोपीय संघ सेहत पर समझौता नहीं करना चाहता और विरोधी ओबामा को पीछे नहीं हटने दे रहे.

अमेरिका और यूरोपीय संघ ने 2014 में अरबों डॉलर का कारोबारी करार करना चाहा लेकिन कुछ मतभेद राह का रोड़ा बन गए. सबसे ज्यादा हंगामा क्लोरीन चिकन पर हो रहा है. अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत के आगे डेमोक्रैट राष्ट्रपति बराक ओबामा कमजोर पड़ चुके हैं. उन पर यूरोपीय संघ के सामने झुके बिना मुक्त व्यापार समझौता करने का दबाव है. दूसरी तरफ यूरोपीय संघ को किसी कीमत पर क्लोरीन चिकन स्वीकार नहीं है.

अगर कारोबारी समझौते से क्लोरीन चिकन के मुद्दे को हटा भी दिया जाए तो भी ओबामा की मुश्किल कम नहीं हो रही. श्रम संगठन, पर्यावरण संगठन और कांग्रेस के सदस्य कह रहे हैं कि ऐसा करने का मतलब होगा कि सरकार, अमेरिका के आर्थिक हित बचाने में नाकाम रही. वहीं यूरोपीय संघ में क्लोरीन चिकन से खासी बेचैनी है. नाराजगी कम करने के लिए जर्मन चासंलर अंगेला मैर्केल को कहना पड़ा कि इस विवादित मुद्दे का अमेरिका-ईयू डील पर असर नहीं पड़ेगा.

क्या है क्लोरीन चिकन

रसायनों से चिकन की सफाई करना, ये बात ज्यादातर लोगों को नागवार गुजरेगी. लेकिन अमेरिका में ऐसा किया जाता है. मीट उ्दयोग में साफ सफाई की खासी अहमियत है. आम तौर मांस में हानिकारक बैक्टीरिया पनपने का खतरा काफी ज्यादा होता है. इससे बचने के लिए अमेरिका में चिकन की क्लोरीन से सफाई की जाती है.

अटलांटिक महासागर के आर पार बसे अमेरिका और यूरोप में सुरक्षित ढंग से मांस का कारोबार करना संवेदनशील मुद्दा है. फॉर्म और बूचड़खानों में सफाई के ऊंचे मानक स्थापित करने के बजाए अमेरिका में अंत में की जाने वाली रासायनिक सफाई पर ज्यादा जोर दिया जाता है. इस सफाई से मीट बैक्टीरिया मुक्त हो जाता है. वहीं यूरोप में मांस में पनपने वाले बैक्टीरिया को रोकने के लिए "फॉर्म से किचन तक" जबरदस्त सफाई रखने का तारीका अपनाया जाता है.

यूरोपीय संघ "इलाज से बेहतर बचाव है" की नीति पर चलता है. यूरोपीय संघ में पूरी उत्पादन श्रृंखला को इस ढंग से तैयार किया गया है कि आखिर छोर पर खड़े ग्राहक सुरक्षित रहे. पोल्ट्री फॉर्म में हाईजीन के कड़े नियम हैं. खास पोशाक और खास जूते पहनने पड़ते हैं ताकि फॉर्म में बाहरी बैक्टीरिया न आए. इसके बाद स्वच्छ ट्रांसपोर्ट, हाई टेक हाईजीन वाले बूचड़खाने और फूड प्रोसेसिंग यूनिट आती हैं.

2015 में अगर यह समझौता हुआ तो इससे अमेरिका और अटलांटिक पार 28 देशों के समूह यूरोपीय संघ दोनों को फायदा होगा. फरवरी 2015 में इस समझौते को लेकर सातवें दौर की बातचीत होगी. यूरोपीय संघ और अमेरिका दुनिया में सबसे बड़े कारोबारी साझेदार हैं. दोनों के बीच कस्टम और आयात शुल्क बहुत कम हैं. नया समझौता इस कारोबार को और आसान बनाएगा. समझौते के तहत फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड के मामले में भी रियायत दी जाएगी. बात यहीं अटक रही है.

ओएसजे/एमजे (डीपीए)

अमेरिका में भी भूख के मारे

तस्वीर में दिख रहे जेम्स वॉशिंगटन की मौजूदा स्थिति से बिल्कुल खुश नहीं हैं. मगर तीन साल पहले नौकरी छूट जाने और कोई दूसरा विकल्प ना होने के कारण वह यहां रहने को मजबूर हैं. वैसे तो उन्हें सरकार की ओर से हर महीने 1,200 डॉलर मिलते हैं लेकिन इतने पैसों में उनका खर्च पूरा नहीं पड़ता.

अमेरिका में भी भूख के मारे

अमेरिकी राजधानी में 'कम्युनिटी फॉर क्रिएटिव नॉन-वायलेंस' बेघर लोगों के लिए सबसे बड़ा आश्रयघर चलाती है. इस सेंटर पर हर रात करीब 1,300 बेघर लोगों को सोने की जगह मिलती है. यह सेंटर अमेरिकी राजधानी में सत्ता के केंद्र यानि यूएस कांग्रेस से कुछ ही दूरी पर है.

अमेरिका में भी भूख के मारे

कम आय वाले परिवारों को भोजन उपलब्ध कराने का काम करता है यह माना फूड सेंटर. 2014 में करीब 3,600 परिवार सेंटर से फूड पैकेट लिया करते हैं. 2011 में यहां से खाना लेने वालों की संख्या औसतन 3,000 हुआ करती थी. इनमें से करीब एक तिहाई लोग या तो बेरोजगार हैं या फिर बेहद बुजुर्ग. बाकी कई छोटेमोटे कामकाज करने वाले लोग हैं.

अमेरिका में भी भूख के मारे

तस्वीर में दिख रही बेथ हर तीन महीने में एक बार माना फूड सेंटर का चक्कर लगाती हैं. दो छोटे लड़कों की मां बेथ के पास कोई नौकरी नहीं है और फिलहाल वह सरकार से मिलने वाले भत्ते पर ही जी रही है. इस फूड सेंटर से खाना खरीदने पर उन्हें थोड़ी मदद हो जाती है.

अमेरिका में भी भूख के मारे

तस्वीर में बांई ओर दिख रही कॉर्ली पहले एक डे केयर सेंटर और मैक डॉनल्ड्स में काम करती थीं. फिर नौकरी चली जाने के बाद उन्हें दो साल तक नई नौकरी के लिए धक्के खाने पड़े. अब वह एक ग्रोसरी स्टोर में काम करती हैं पर कमाई पर्याप्त ना होने के कारण वह फूड सेंटर पर निर्भर हैं.

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