सुंदरबन के द्वीपों के साथ डूबते राजनेताओं के वादे

पश्चिम बंगाल में दक्षिण 24-परगना जिले के घोड़ामारा समेत कई द्वीप जलवायु परिवर्तन और समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से खतरे में हैं. आम दिनों में तो यहां के बाशिंदो को कोई पूछता नहीं लेकिन चुनाव में जरूर पूछ बढ़ जाती है.

कोलकाता से महज कुछ सौ किलोमीटर दूर इन द्वीपों में कुछ का बड़ा हिस्सा तो पानी में भी समा चुका है. अमूमन राजनेता इन द्वीपों पर रहने वालों की कोई फिक्र नहीं करते, लेकिन चुनावों के मौसम में उनकी पूछ कुछ बढ़ जाती है. इनमें से ज्यादातर द्वीप उस मथुरापुर संसदीय क्षेत्र में हैं जहां आखिरी चरण में 19 मई को मतदान होना है.

इन द्वीपों पर रहने वालों का भी नेताओं व राजनीतिक दलों से मोहभंग हो चुका है. कई द्वीपों पर तो वोटर इतने कम हैं कि कोई उम्मीदवार प्रचार करने भी नहीं जाता. घोड़ामारा द्वीप पर रहने वाले दीपंकर कयाल समेत सैकड़ों लोगों ने तो आज तक अपने सांसद तक को भी नहीं देखा है. ऐसे में अपनी समस्या क्या कहेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इसी सप्ताह यहां चुनावी रैलियां कर चुके हैं. लेकिन इन दोनों में से किसी ने भी सुदंरबन के डूबते द्वीपों के बारे में एक शब्द तक नहीं कहा. यह दोनों नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने में ही व्यस्त रहे.

जलवायु परिवर्तन मुद्दा नहीं

सुदंरबन इलाका जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित है. इलाके के कुछ द्वीप पानी में डूब चुके हैं और घोड़ामारा जैसे कई द्वीप भी डूब रहे हैं. लेकिन पहले के तमाम चुनावों की तरह अबकी भी पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन कोई मुद्दा नहीं है. असल में इन द्वीपों पर वोटरों की तादाद इतनी कम है कि राजनीतिक दलों को उनकी कोई परवाह ही नहीं है. मिसाल के तौर पर घोड़ामारा में महज साढ़े तीन हजार वोटर हैं.

दीपंकर कयाल कहते हैं कि चुनावों के दौरान तमाम राजनीतिक दल बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनावों के बाद कोई भूले से भी इधर नहीं झांकता. वह बताते हैं, "इन द्वीपों में लोकसभा उम्मीदवार कभी वोट मांगने नहीं आते. जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर उनके स्थानीय प्रतिनिधि ही लोगों को संबंधित उम्मीदवार को वोट डालने के लिए धमकाते या प्रोत्साहित करते हैं.” कयाल को उम्मीद नहीं है कि इस बार भी चुनाव के बाद कुछ बदलेगा. वह कहते हैं, "पर्यावरण के शरणार्थी बनना हमारी नियति है. कोई भी इसे बदल नहीं सकता.”

घोड़ामारा द्वीप कोलकाता से लगभग डेढ़ सौ किमी दक्षिण में  है. किसी दौर में यह लेफ्ट का गढ़ था. लेकिन वर्ष 2009 से टीएमसी के चौधुरी मोहन जटुआ यहां से जीतते रहे हैं. जटुआ इस बार भी मैदान में हैं. कयाल और इस द्वीप पर रहने वाले ज्यादातर लोग मछली पकड़ने का जाल बुन कर और मछली मार कर परिवार के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ करते हैं. कई बार उनको मुख्य भूमि पर जाकर मजदूरी भी करनी पड़ती है.

अपना घर छोड़ कर जाना चाहते हैं घोरमारा के लोग

डूबते घर

सुंदरबन डेल्टा में बसा घोरमारा द्वीप अब डूबने की कगार पर है. वहां के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि 4.6 वर्ग किलोमीटर में फैला यह द्वीप पिछले दो दशकों में अपने आकार का आधा हो गया है. फिलहाल घोरमारा में तकरीबन 4,800 लोग रहते हैं जबकि एक दशक पहले तक यहां की आबादी सात हजार थी.

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सुनामी या चक्रवात

इस गांव के प्रधान कहते हैं, "अगर सुनामी या चक्रवात आएगा तो यह द्वीप खत्म हो जाएगा." कोलकाता से 150 किमी दूर है. यह सुंदरवन डेल्टा में स्थित ऐसे द्वीपों में है जो बढ़ते समुद्र स्तर और मिट्टी के कटाव के चलते प्रभावित हो रहा है. वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन को इसका मुख्य कारण मानते हैं.

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घर छोड़ने को तैयार

स्थानीय लोग कहते हैं कि बाढ़ के पानी ने जिंदगी दूभर कर दी है. घोरमारा में रहने वाला शेख आफताबुद्दीन कहते हैं, "अगर सरकार पुनर्वास की व्यवस्था कर दे तो मैं यहां से चला जाउंगा." तस्वीर में शेख आफताब अपनी पत्नी के साथ अपने कच्चे घर के बाहर बैठे हुए दिख रहे हैं.

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इंतजार और इंतजार

घोरमारा में रहन वाले एक निवासी कहते हैं कि अगर सरकार मुफ्त जमीन और घर दे तो आधे से अधिक गांव वाले बाहर जाने को तैयार हैं. उन्होंने बताया कि लोगों को मुआवजे या द्वीप के बाहर जाने के अनुरोध पर अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है.

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मैंग्रोव जंगल

सुंदरबन का इलाका भारत और बांग्लादेश के बीच स्थित है. यह दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव जंगल भी है इसके साथ ही यहां दुर्लभ और विलुप्त पशुओं की श्रेणी में शामिल बाघ, डॉल्फिन, पक्षी और सरीसृप पाए जाते हैं.

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विशेषज्ञों की राय

जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ मानते हैं कि एक न एक दिन इस द्वीप की पूरी आबादी को विस्थापित करना ही होगा. नई दिल्ली के एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट की शोधकर्ता सुरुचि भडवाल कहती हैं कि इन लोगों को दूसरे क्षेत्रों में विस्थापित करने के लिए सरकार को कुछ योजना तैयार करनी चाहिए.

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मछुआरे आजमाते किस्मत

जब जल स्तर बढ़ जाता है तो मछुआरे किनारे पर ही जाल डालकर ज्यादा से ज्यादा मछलियां पकड़ने की ताक में रहते हैं. वहीं जल स्तर बढ़ने के चलते किसानों की फसल खराब हो जाती है. (रॉयटर्स/एए)

घोड़ामार द्वीप पहले तीन कस्बों को मिला कर बना था, लेकिन समुद्र के लगातार बढ़ते जलस्तर की वजह से खासीमारा और लोहाचारा नाम के दो कस्बे पानी में समा चुके हैं. द्वीप की खेती की जमीन भी तेजी से समुद्र में समा रही है. वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण सुंदरबन इलाके के 54 द्वीपों के अस्तित्व पर खतरा लगातार बढ़ रहा है. इन द्वीपों की जमीन धीरे-दीरे पानी में समा रही है.  नौ वर्गकिलोमीटर का यह द्वीप बीते कुछ वर्षों में घट कर आधा रह गया है.

इसी इलाके में स्थित मौसुनी द्वीप के वोटर जब रविवार को अंतिम दौर के चुनाव में अपना वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों तक पहुंचेंगे तो बिजली, पानी और सड़क जैसे आधारभूत मुद्दे उनकी चिंता का विषय नहीं होंगे. यह लोग इस बार मौसुनी को बंगाल की खाड़ी में डूबने से बचाने की उम्मीद में वोट देंगे. मथुरापुर संसदीय क्षेत्र में बसे 24 वर्गकिलोमीटर में फैले इस द्वीप में बिजली, सड़क और पानी के दर्शन दुर्लभ हैं. हालांकि इस द्वीप के लोगों के लिए यह चुनाव वजूद की लड़ाई बन गया है. जिस तेजी से यह द्वीप समुद्र में समा रहा है उससे यह तय करना मुश्किल है कि अगले लोकसभा चुनाव तक यह बचेगा भी या नहीं.

द्वीप के गोपाल मंडल कहते हैं, "हमें सड़क, पानी, बिजली या दूसरी कोई सुविधा नहीं चाहिए. हम चाहते हैं कि इस बार यहां से जीतने वाला सांसद इस द्वीप को बचाने के लिए समुद्र तट पर तटबंध बनवा दे.” मंडल के परिवार के पास इस डूबते द्वीप पर रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. बीते साल कोई पांच सौ लोग यहां से सुरक्षित स्थानों पर जा चुके हैं. बीते साल अक्तूबर में द्वीप पर बना तीन किलोमीटर लंबा तटबंध टूट गया था. उसके बाद समुद्र के खारे पानी ने इलाके में खेत और उसमें खड़ी फसलों को लील लिया. अब खारे पानी के चलते वह जमीन उपजाऊ नहीं रही.

जादवपुर विश्वविद्यालय के समुद्र विज्ञान विशेषज्ञ तूहिन घोष कहते हैं, "इलाके में भूमि कटाव की समस्या पर अंकुश लगाने के लिए कई उपाय हैं. इनमें सबसे बेहतर उपाय मैंग्रोव पेड़ों की तादाद बढ़ाना है. इस पेड़ की जड़ें मिट्टी को बांध कर कटाव से रोकती हैं.”

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

10. रोशनी में नहाते शहर

रात में रोशनी से जगमग बड़े शहर अंतरिक्ष से साफ साफ नजर आ जाते हैं. जो शहर जितना विकसित और बड़ा होगा, उसकी रोशनी का आकार भी उतना ही बड़ा दिखता है.

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09. पाल्म आइलैंड

दुबई में इंसान द्वारा निर्मित यह सबसे बड़ा द्वीप है. अरब सागर में बनाया गया यह द्वीप समूह अंतरिक्ष से ताड़ के वृक्ष सा दिखता है.

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08. जलसंधियां

दो महासागर जिस जगह पर मिलते हैं, वहां पर पानी के खारेपन और वनस्पतियों की भिन्नता के कारण नायाब नजारा बनता है. यह नजारा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से भी दिखता है.

Klimawandel Folgen Umweltzerstörung Flash-Galerie (epa)

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

07. स्पेन के ग्रीनहाउस

स्पेन के अलमेरिया इलाके में 64,000 एकड़ में ग्रीनहाउस फैले हैं. दिन में इनसे परावर्तित होती रोशनी अंतरिक्ष से भी देखी जा सकती है. इन ग्रीनहाउसों में यूरोप के लिए फल और सब्जियां उगाई जाती हैं.

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

06. गीजा का पिरामिड

दुनिया के सात अजूबों में शुमार गीजा का पिरामिड अंतरिक्ष से भी नजर आता है. गीजा का पिरामिड धरती पर मौजूद सबसे बड़ा पिरामिड भी है.

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

05. सुंदरबन डेल्टा

हिंद महासागर में समाने से पहले गंगा नदी विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा बनाती है. डेल्टा करीब 400 किलोमीटर तक फैल सकता है. इसी विस्तार के कारण यह अंतरिक्ष से भी नजर आता है.

Flash-Galerie Die Wunder der Natur (Fotolia/Katrina Brown)

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

04. ग्रैंड कैनियन

अमेरिका के एरिजोना प्रांत में लाखों साल से चट्टानों को काटकर खाई बना रही कैनियन नदी का करिश्मा भी दूर से नजर आ जाता है. करीब 400 किलोमीटर लंबी ग्रैंड कैनियन वैली आईएसएस से साफ पहचानी जाती है.

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

03. अमेजन नदी

विश्व की सबसे बड़ी और लंबी नदी अमेजन एक नहीं, बल्कि कई जगहों पर अंतरिक्ष से दिखाई पड़ती है.

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

02. ग्रेट बैरियर रीफ

ऑस्ट्रेलिया में मौजूद मूंगे की सबसे बड़ी चट्टानें ग्रेट बैरियर रीफ भी सैकड़ों किलोमीटर ऊपर से दिखाई पड़ती हैं. 2,300 किलोमीटर लंबी रीफ अद्भुत नजर आती है.

पृथ्वी की ये चीजें, अंतरिक्ष से भी दिखती हैं

01. हिमालय

दुनिया की सबसे बड़ी और ऊंची पर्वत श्रृंखला हिमालय बिना किसी परेशानी के अंतरिक्ष से दिख जाता है. माउंट एवरेस्ट समेत हिमालय की सैकड़ों ऊंची चोटियों की चमक अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में भी पता चलती है.

मौसुनी द्वीप के जलालुद्दीन बताते हैं, "पहले की लेफ्टफ्रंट सरकार हो या फिर अब टीएमसी की, किसी ने इन द्वीपों को बचाने की कोई पहल नहीं की है. विकास के नाम पर कहीं सड़कें बना दी जाती हैं तो कहीं पीने के पानी के लिए डीप ट्यूबवेल, लेकिन यहां तो जीना ही सबसे बड़ी समस्या है.” स्थानीय लोगों का आरोप है कि मनरेगा के तहत कुछ लोगों के कार्ड जरूर बने हैं लेकिन उनको काम नहीं मिलता है और काम मिला भी तो समय पर पैसे नहीं मिलते. जलालुद्दीन कहते हैं, "अब तो सरकार अगर हमें कहीं और बसा कर हमारे लिए रोजगार की व्यवस्था करे तभी जान बच सकती है.” लेकिन किसी भी राजनीतिक दल की इन बातों में दिलचस्पी नहीं है. बावजूद इसके इलाके के लोग रविवार को वोट डालने निकलेंगे. शायद स्थानीय दादाओं के डर से. हालांकि कोई इस बात को कबूल नही करता.

निवर्तमान टीएमसी सांसद चौधुरी मोहन जटुआ कहते हैं, "राज्य सरकार ने इन द्वीपों को बचाने के लिए केंद्र को कई पत्र लिखे हैं. लेकिन केंद्र इस मामले पर चुप्पी साधे बैठा है. यह काम अकेले राज्य सरकार के बस का नहीं है.” यहां उनके मुकाबले सीपीएम के शरत हाल्दार मैदान में हैं और बीजेपी के श्यामा प्रसाद हाल्दार. इन दोनों का आरोप है कि राज्य सरकार को सुदंरबन के द्वीपों पर रहने वालों के वोट तो चाहिए, लेकिन इनकी समस्याओं पर उसका कोई ध्यान नहीं है. हालांकि यह दोनों नेता भी यह नहीं बताते कि वह क्या कर सकेंगे. श्यामा प्रसाद हाल्दार कहते हैं, "मैं संसद में यह मुद्दा उठाऊंगा. "

जलालुद्दीन कहते हैं, "हम तो मजबूरी में वोट डालने जाते हैं.” राजनेताओं के हवाई वादे सुनते हुए उनको पचास साल बीत गए. वह कहते हैं कि स्थानीय लोगों का राजनीति से मोहभंग हो चुका है. अगर राजनीति करेंगे तो परिवार का पेट कैसे भरेंगे ? यह सवाल इन द्वीपों पर रहने वाले उन हजारो लोगों का है जो तेजी से पर्यावरण के शरणार्थी बनते जा रहे हैं. लेकिन इनके लिए कुछ करने की बजाय तमाम राजनीतिक दल अपनी सियासी रोटियां सेंकने में जुटे हैं.

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