सुलगते जंगलों में कैसे आए शांति

छत्तीसगढ़ में हिंसा के बाद भावी कदमों पर केंद्र सरकार विचार कर रही है. डीडब्ल्यू ने लंबे समय से नक्सल इलाकों में काम कर रहे समाजसेवी और गांधीवादी हिमांशु कुमार से इलाके की समस्या और उनके समाधान के तरीकों पर बात की.

दिल्ली में सर्वदलीय बैठक बुलाई गई है इससे किसी ठोस कदम की उम्मीद बन रही है जो नक्सल समस्या के हल की ओर जाती दिखे?

मैं अपने निजी अनुभव से कह सकता हूं कि सरकार इस समस्या के समाधान के लिए जो कदम उठाती है वो समझ में नहीं आते. सरकार क्या करेगी वो सेना या सुरक्षा बलों को इलाके में भेज देगी. माओवादी वहां सरकार के इंतजार में तो बैठे नहीं होंगे. सेना और सुरक्षा बल वहां गांववालों और निर्दोष लोगों को पकड़ेंगे, मारेंगे तरह तरह से परेशान करेंगे. नतीजा यह होगा कि नक्सलियों की ताकत और बढ़ जाएगी.

क्या इस बात की उम्मीद नहीं कि सरकार विकास और दूसरे उपायों से उन्हें मुख्यधारा में लाने के बारे में सोचे? यह उपाय कितने सफल रहेंगे?

सरकार की तरफ से अब तक ना तो कोई ऐसी बातचीत हुई है ना बयान आया है. विकास की जो बात की जाती उसके बारे में आप जानते हैं. सलवा जुड़ूम को सर्वोच्च अदालत ने भी असंवैधानिक करार दिया लेकिन सरकार ने आज तक नहीं माना. नतीजा हुआ है कि आदिवासी सरकार से डर गया है. आप गलती नहीं मानते और सोचते हैं कि उसे थोड़ा चावल, कपड़े और मकान बनाने के लिए कुछ पैसे दे कर उन्हें अपनी ओर कर लेंगे.

लेकिन इस तरह के हिंसक अभियानों से क्या कोई हल निकल सकेगा?

हिंसा से कोई हल निकलेगा ऐसा मैं नहीं मानता लेकिन देश के किसी हिस्से में हिंसा न हो इसकी जिम्मेदारी सरकार की है. यह माओवादियों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे वहां लोकतंत्र बहाल करें, वहां शांति लाएं.

हिंसा होगी तो सरकार तो सुरक्षाबलों को ही भेजेगी?

नहीं ऐसा नहीं है राज्य हिंसा ही नहीं कर सकता, राज्य बिना हिंसा के भी अपने देश के लोगों के साथ काम कर सकता है. आदिवासियों के साथ परंपरागत रूप से अन्याय होता आया है. इस अन्याय को रोके बिना वहां शांति नहीं आएगी. देश के बुद्धिजीवी सरकार से कहते रहे हैं लेकिन आज तक उसे रोकने के लिए कार्रवाई नहीं की गई. इसी का नतीजा है कि ऐसी अशांति वहां हुई है.

सरकार ने पहले भी वहां सुरक्षा बलों को भेजा था लेकिन उससे समस्या खत्म नहीं हुई. नक्सल संघर्ष कोई आतंकवादी समस्या नहीं है कि थोड़ी सी फौज भेज दी तो वो डर कर शांत हो जाएंगे और समस्या खत्म हो जाएगी. यह लंबे समय से चली आ रही असमानता का नतीजा है और इसे इस नजरिए से समझे बगैर इसका समाधान नहीं हो सकता.

यह भी कहा जाता है कि यह सरकार और नक्सलियों के बीच संसाधन की लड़ाई है जिस पर दोनों अपना अपना कब्जा चाहते हैं?

मैं नहीं मानता कि माओवादी वहां के संसाधनों पर कब्जा चाहते हैं. हां, वो यह जरूर कहते हैं कि संसाधन इस देश के लोगों के हैं और संसाधनों को देश के कुछ पूंजिपतियों की मिल्कियत नहीं बनाया जा सकता. देश के गरीबों के लिए इसका इस्तेमाल होना चाहिए, इसमें सरकार को क्या दिक्कत है.

आपके मुताबिक सरकार को क्या करना चाहिए?

मैं तो कहता हूं कि लोगों से माफी मांगिए. कहिए कि हमसे गलती हुई हमने आप पर हमला किया और फिर उनका दिल जीतिए. लोकतंत्र तो लोगों का तंत्र है लोगों से ही बात करिए कि वो क्या चाहते हैं.

लेकिन ऐसा लगता है कि बातचीत करने के लिए तो कोई तैयार ही नहीं?

किसने कहा... अरे मैं कहता हूं कि छोड़िए माओवादियों को आप सीधे बस्तर के लोगों से बात कीजिए. उनसे बात करने में क्या मुश्किल है. मैंने तो राहुल गांधी और पी चिदंबरम से भी कहा कि सीधे बस्तर के लोगों से ही बात करिए. लेकिन सरकार तो बस लोगों को बेवकूफ बनाने में जुटी है.

हिमांशु कुमार ने लंबा समय नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के इलाके में समाजसेवा करते हुए बिताया है. इस दौरान उन्होंने उनकी समस्याओं और चुनौतियों को बहुत करीब से देखा, जाना और समझा है.

इंटरव्यूः निखिल रंजन

संपादनः प्रिया एसेलबॉर्न

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