हनुमान मंदिरों पर दलित समुदाय का कब्जा

पिछले दिनों राजस्थान में चुनावी रैली में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हनुमान को ऐसा लोकदेवता बताया जो दलित हैं. तबसे हनुमान मंदिरों पर दलित कब्जे का अभियान शुरू हुआ.

मामले की शुरुआत योगी आदित्यनाथ के बयान से हुई, फिर हिंदू भगवानों को जातियों में बांटने पर बहस शुरू हुई और फिर दलित समाज के लोगों ने इसको लपक लिया. कई शहरों में दलितों ने हनुमान मंदिर पर कब्जा करना शुरू किया. बैनर लगा दिया जिसमें हनुमान को दलित देवता बताया गया. मंदिर प्रबंधन में सहभागिता मांगने लगे और सदियों पुराना जाति का जाल फिर से सामने आ गया.

कैसी कैसी घटनाएं

सबसे पहले आगरा में लखनऊ-कानपुर स्थित लंगड़े की चौकी पर हनुमान मंदिर पर लगभग दो दर्जन दलित समुदाय के लोग पहुंच गए. उन्होंने हनुमान चालीसा पढ़ा और दलित देवता हनुमान का जयकारा लगाया. उनकी मांग थी कि अब चूंकि योगी आदित्यनाथ ने कह दिया है इसलिए हनुमान मंदिर का प्रबंधन उनके दलित समुदाय को सौप दिया जाए. बात धीरे धीरे फैलने लगी.

उत्तर प्रदेश कि राजधानी लखनऊ में एक संस्था 'दलित उत्थान सेवा समिति' के कार्यकर्ता हजरतगंज स्थित पंचमुखी हनुमान मंदिर पहुंच गए. पूजा अर्चना की और मांग रखी कि हनुमान मंदिर का प्रबंधन उनके समुदाय को दिया जाए. वहां पर मीडिया से बात करते हुए समिति के महासचिव विजय बहादुर ने कहा, "अब जब हनुमान जी को दलित बताया गया हैं तो मंदिर के प्रबंधन में हमको स्थान दिया जाये."

Hanuman Mandir, Hazratganj, Lucknow, India

हजरतगंज, लखनऊ में हुमान मंदिर पर कब्जे के बाद धरना देते दलित कार्यकर्ता.

इसके बाद पश्चिम उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दलित समुदाय के लोगों ने दलित क्रांति दल कि अगुवाई में एक हनुमान मंदिर पर दलित हनुमान मंदिर, हनुमान चौक का बैनर लगा दिया. लगभग दो घंटे बाद वो लोग पुलिस के समझाने पर हटाए गए.

राजनीतिकबयानबाजी

कई राज्यों के विधान सभा चुनाव और आगामी लोक सभा चुनाव को देखते हुए योगी आदित्यनाथ के बयान पर राजनीति भी शुरू हो गयी. भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर ने कहा कि दलितों को अब हनुमान मंदिर की कमान अपने हाथों में ले लेनी चाहिए. वहां पुजारी दलित समुदाय से होना चाहिए.

योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल में पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी इससे असहमति जताई और कहा कि भगवान को जातियों में बांटना गलत है. इसके बाद तो तमाम अन्य नेताओं ने भी बयानबाजी शुरू कर दी.

प्रदेश में भाजपा की बहराइच लोक सभा सीट से सांसद सावित्री बाई फुले ने मुख्यमंत्री के बयान का समर्थन किया और यहां तक कह दिया कि हनुमान जी मनुवादियों के गुलाम थे.

मीडिया में छपी राजस्थान की खबरों के अनुसार, एक संगठन सर्व ब्राह्मण महासभा ने इस प्रकरण पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लीगल नोटिस भी भेजनी की बात कही गयी है.

बहुजन समाज पार्टी कि अध्यक्ष मायावती ने भी एक लिखित बयान में कहा, "अब यह जोरदार मांग उठ रही है कि इस आधार पर हनुमान मंदिरों को दलित पुजारियों के हवाले किया जाये. जबकि इन लोगों ने जाति के आधार पर पहले लोगों को बांटा और अब देवी-देवताओं को जाति में बांटने का फरमान जारी कर रहे हैं.”

राजनीतिकऔरसामाजिकनिहितार्थ

भारतीय समाज और विशेषकर हिंदी पट्टी हमेशा से जातिगत खांचो में बटी रही है. यही जातिगत आंकड़े राजनीति को भी प्रभावित करते हैं. चुनाव में जातिवार नेताओं की गणना होती हैं. सवर्ण-पिछड़ा-दलित इसी के इर्द गिर्द राजनीतिक और सामाजिक चक्र घूमता रहता है.

दलित चिन्तक कंवल भारती कहते हैं, "हनुमान को दलित कहना आरएसएस का पुराना विचार है लेकिन ये दांव आदिवासियों में ठीक है पर उसके बाहर नहीं. अब बताइए कैसे एक ब्राह्मण दलित हनुमान की पूजा करेगा. सब कुछ कर लेंगे अब हनुमान को ब्राह्मण भी बता देंगे लेकिन पूंछ का क्या करेंगे. सारे भगवान तो उच्च वर्ण के हैं."

उत्तर प्रदेश वाल्मीकि महासभा के अध्यक्ष जुगल किशोर वाल्मीकि कहते हैं, "चीजें बिलकुल साफ हो गई हैं. जब चुनाव आता है तब भाजपा के लिए दलित हिन्दू हो जाता है. सत्ता पाने के बाद फिर वो दलित हो जाता है. भावावेश में मुख्यमंत्री द्वारा मंच से ये बात निकल गई. अगर हनुमान जी ना होते तो राम क्या करते. मंदिर से अगर किसी को फायदा होगा तो पंडित को होगा, दलितों को नहीं होगा.”

समाजवादी पार्टी के सदस्य विधान परिषद् और प्रवक्ता सुनील सिंह साजन कहते हैं, "ये दुर्भाग्यपूर्ण बयान है वो भी एक ऐसे व्यक्ति द्वारा जो एक मंदिर का महंत हैं. ये ओछी मानसिकता है जिसमें भगवान की भी जाति बताई जाने लगी.”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर अर्शी खान कहते हैं, "ये एक शुद्ध राजनीतिक बयान है. इस बयान के जरिए एक जाति विशेष तक पहुंचने की कोशिश की गयी है जो पिछले कुछ महीनों से काफी प्रताड़ित थी. ये धार्मिक बयान बिलकुल नहीं है.”

वैसे ये कहना कि मुख्यमंत्री के इस बयान से दलित समुदाय एकदम से भाजपा को वोट देगा, शायद अतिश्योक्ति होगा. ये जरूर हुआ कि शहरों में दलित अब हनुमान मंदिर पर दावा करने लगे. योगी के पूरे बयान को भी नहीं समझा गया और बीच से ‘दलित' शब्द उठा कर हवा दे दी गयी. इतना जरूर हुआ कि राजनीतिक मौसम में मूलभूत मुद्दों से ज्यादा बहस अब इस तरह के मुद्दों पर होने लगी है.

राजनीति

दलित-मराठा टकराव (जनवरी 2018)

महाराष्ट्र में साल 2018 की शुरुआत दलित-मराठा टकराव के साथ हुई. भीमा-कोरेगांव लड़ाई की 200वीं सालगिरह के मौके पर पुणे के कोरेगांव में दलित और मराठा समुदायों के बीच टकराव हुआ जिसमें एक युवक की मौत हो गई. मामले ने तूल पकड़ा और पूरे महाराष्ट्र में इसकी लपटें नजर आने लगीं. दलितों संगठनों ने 3 जनवरी को महाराष्ट्र बंद का ऐलान किया. इस बीच प्रदेश के अधिकतर इलाकों से हिंसा, आगजनी की खबरें आती रहीं.

राजनीति

सहारनपुर में ठाकुर-दलित हिंसा (मई 2017)

साल 2017 में उत्तर प्रदेश का सहारनपुर दलित विरोध का केंद्र बना रहा. क्षेत्र में दलित-ठाकुरों के बीच महाराणा प्रताप जयंती कार्यक्रम के बीच टकराव हुआ. इसके चलते दोनों पक्षों के बीच पथराव, गोलीबारी और आगजनी भी हुई. विरोध इतना बढ़ा कि मामला दिल्ली पहुंच गया. जातीय हिंसा के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर दलितों की भीम आर्मी ने बड़ा प्रदर्शन किया.

राजनीति

गौ रक्षकों के खिलाफ गुस्सा (जुलाई 2016)

जुलाई 2016 में गुजरात के वेरावल जिले के ऊना में कथित गौ रक्षकों ने गाय की खाल उतार रहे चार दलितों की बेरहमी से पिटाई की थी. इनमें से एक युवक की मौत हो गई थी. घटना का वीडियो वायरल हुआ. गुजरात में दलित समुदायों ने इसका जमकर विरोध किया. विरोध प्रदर्शन के दौरान करीब 16 दलितों ने आत्महत्या की कोशिश भी की. इस मामले की गूंज संसद तक पहुंची.

राजनीति

कोपर्डी गैंगरेप केस (जुलाई 2016)

यह एक ऐसा मामला था जिसमें मराठा समुदाय की ओर से एससी/एसटी कानून को खत्म किए जाने की मांग की गई. 13 जुलाई 2016 को मराठा समुदाय की एक 15 साल वर्षीय लड़की को अगवा कर उसका गैंगरेप किया गया. जिसके बाद उसकी हत्या कर दी गई. महाराष्ट्र में इस घटना के खिलाफ काफी प्रदर्शन हुआ था जिसने बाद में मराठा आंदोलन का रूप अख्तियार कर लिया. मामले में तीन दलितों को दोषी करार दिया गया जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई.

राजनीति

रोहित वेमुला की आत्महत्या (जनवरी 2016)

हैदराबाद यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या ने देश में दलितों और छात्रों के बीच एक नया आंदोलन छेड़ दिया. यूनिवर्सिटी के छात्र संगठनों ने प्रशासन पर भेदभाव का आरोप लगाया. रोहित ने अपने सुसाइड नोट में विश्वविद्यालय को जातिवाद, चरमपंथ और राष्ट्रविरोधी तत्वों का गढ़ बताया था. इसके बाद देश भर में दलित आंदोलन हुए और मामला देश की संसद तक पहुंचा.

राजनीति

खैरलांजी हत्याकांड (सितंबर 2006)

जमीनी विवाद के चलते महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव में 29 सितंबर को एक दलित परिवार के 4 लोगों की हत्या कर दी गई थी. परिवार की दो महिला सदस्यों को हत्या के पहले नंगा कर शहर भर में घुमाया गया था. इस घटना के विरोध में पूरे महाराष्ट्र में दलित प्रदर्शन हुए थे. सीबीआई ने अपनी जांच में गैंगरेप की बात को नकार दिया था. दोषियों को मौत की सजा मिली थी, जिसे बंबई हाईकोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया.