'हिन्दी ब्लॉग्स पर समृद्ध बहस'

हिन्दी ब्लॉग स्फीयर की शुरुआत ने हिन्दी भाषा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नए आयाम दिए हैं. एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार राजनीतिक बहस में हिन्दी ब्लॉग्स की भूमिका का विश्लेषण कर रहे हैं.

हिन्दी में ब्लॉगिंग की दुनिया ने अभिव्यक्तियों के नए नए इदारों की खोज की है. ब्लॉग से पहले हिन्दी का पब्लिक स्फीयर अखबारों के संपादकीय पन्नों और साहित्य के छोटे-बड़े मंचों तक ही सीमित रहा है. जहां लिखने वाले और मुद्दों का अगर विश्लेषण किया जाए तो थोड़ी बहुत विविधता के साथ एक ही शैली में लिखा जा रहा था. एक तय ढांचे के भीतर नवीनता थी और किसी शैली ने चंद ढांचों को तोड़ा भी तो जल्दी ही वो अपने आप में एक परिपाटी बन गई. हिन्दी ब्लॉग ने नए लेखकों को हिन्दी के पब्लिक स्फीयर में शामिल होने का मौका दिया है. यूं कहिए कि हिन्दी का पब्लिक स्फीयर का विस्तार ब्लॉग के आगमन के साथ शुरू होता है, जहां लिखने वाले किसी साहित्यकार के शिष्य नहीं, कवि नहीं, संपादक नहीं और अखबारों के टिप्पणीकार नहीं थे बल्कि वो लोग थे जो सिर्फ पाठक थे. ब्लॉग ने इन्हीं तमाम पाठकों को लेखक में बदल दिया. सिर्फ लिखने वाले अलग अलग पृष्ठभूमि से नहीं आए बल्कि विषयों की विविधता बढ़ गई.

हिन्दी का ब्लॉग जगत जल्दी ही हिन्दी के अखबारों और न्यूज चैनलों को चुनौती देने लगा. उनकी कड़ी समीक्षा होने लगी. कई ऐसे विवाद उभरे जिसका असर न्यूज रूम के भीतर होने लगा. बाद में जब यही ब्लॉग लेखन फेसबुक पर गया तो असर और व्यापक होता चला गया. फेसबुक पर, न्यूज चैनलों पर निर्मल बाबा नाम के एक तथाकथित चमत्कारिक संत के खिलाफ ऐसा अभियान चला कि पूरे हिन्दी जगत में निर्मल बाबा पर सवाल होने लगे. उन्हीं चैनलों पर निर्मल बाबा के खिलाफ बहस होने लगी और अंत में कुछ चैनलों को लिखना पड़ा कि निर्मल बाबा का यह कार्यक्रम प्रायोजित है. जल्दी कई चैनलों को ऐलान करना पड़ा कि वे अब निर्मल बाबा को नहीं दिखायेंगे.

एनडीटीवी एंकर रवीश कुमार

इस तरह के अंशकालिक और पूर्णकालिक असर के कई प्रमाण आपको मिलेंगे. दिल्ली गैंगरेप की घटना में भले ही हिन्दी पब्लिक स्फीयर के प्राचीन स्तंभ यानी लेखक जमात (चंद अपवादों को छोड़) सक्रिय नहीं हुई लेकिन ब्लॉग से अभिव्यक्ति का अभ्यास पाए नए लोगों ने उतनी ही भागीदारी की जितनी अंग्रेजी की दुनिया ने की. बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन और बाद में अरविंद आंदोलन के दौरान भी हिन्दी के ब्लॉग स्फीयर में जबरदस्त बहस हुई जो अखबारों और टीवी की तुलना में कहीं ज्यादा समृद्ध रही. एक तरह से देखें तो हिन्दी के अखबार और चैनल को खुराक भी ब्लॉग स्फीयर की बहसों से ही हासिल हुई.

हिन्दी में ब्लॉग लेखन अब ब्लॉग तक सीमित नहीं है. फेसबुक ने जब से अपने 140 कैरेक्टर की बंदिश हटाई है, फेसबुक नया ब्लॉग हो गया है. शुरूआती ब्लॉगरों ने ग़जब तरीके से साथी ब्लॉगरों की तकनीकी मदद की. हिन्दी के फॉन्ट की समस्या को सुलझाया, जानकारी दी और लिंक की साझेदारी से एक ऐसा समाज बनाया जो विचारों से एक दूसरे से स्पर्धा कर रहा था, मगर तकनीकी मामले में एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चल रहा था. हिन्दी की दुनिया में ऐसी साझीदारी अगर पहले रही भी होगी तो इस तरह से तो बिल्कुल नहीं रही होगी. ज्यादतर लेखक नए थे. हिन्दी के स्थापित लेखक संसार ब्लॉग रचना संसार से आरंभ से लेकर बीच के सफर तक दूर ही रहा. इसलिए भाषा की ऊर्जा बिल्कुल अलग थी. हिन्दी में बात कहने का लहजा उपसंपादक और व्याकरण नियंत्रकों से आजाद हो गया. कुछ बहसें इतनी तीखीं रहीं कि उसने साहित्य की दुनिया के मुद्दों को भी झकझोर दिया.

ब्लॉगः रवीश कुमार

(यह लेखक के निजी विचार हैं. डॉयचे वेले इनकी जिम्मेदारी नहीं लेता.)

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