येरुशलम: ट्रंप के फैसले की दुनिया भर में आलोचना

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने येरुशलम को इस्राएल की राजधानी के तौर पर मान्यता दे दी है. इससे मध्य पूर्व में नए सिरे से अशांति पैदा होने की आशंका है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस मुद्दे पर बैठक बुलायी है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही अपीलों को अनदेखा करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार को येरुशलम को इस्राएल की राजधानी के तौर पर मान्यता दे दी और इस्राएल में अपने दूतावास को तेल अवीव से येरुशलम ले जाने की भी घोषणा की. बहुत से लोग और खास कर फलस्तीनी ट्रंप के इस कदम को इस्राएल का पक्ष लेने के तौर पर देख रहे हैं.

येरुशलम के पूर्वी हिस्से पर 1967 के युद्ध में इस्राएल ने कब्जा कर लिया था जबकि फलस्तीनी लोग पूर्वी येरुशलम को अपने भावी देश की राजधानी बनाना चाहते हैं.

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क्यों है झगड़ा

इस्राएल पूरे येरुशलम पर अपना दावा करता है. 1967 के युद्ध के दौरान इस्राएल ने येरुशलम के पूर्वी हिस्से पर कब्जा कर लिया था. वहीं फलस्तीनी लोग चाहते हैं कि जब भी फलस्तीन एक अलग देश बने तो पूर्वी येरुशलम ही उनकी राजधानी बने. यही परस्पर प्रतिद्वंद्वी दावे दशकों से खिंच रहे इस्राएली-फलस्तीनी विवाद की मुख्य जड़ है.

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जटिल मामला

विवाद मुख्य रूप से शहर के पूर्वी हिस्से को लेकर ही है जहां येरुशलम के सबसे महत्वपूर्ण यहूदी, ईसाई और मुस्लिम धार्मिक स्थल हैं. ऐसे में, येरुशलम के दर्जे से जुड़ा विवाद राजनीतिक ही नहीं बल्कि एक धार्मिक मामला भी है और शायद इसीलिए इतना जटिल भी है.

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टेंपल माउंट या अल अक्सा मस्जिद

पहाड़ियों पर स्थित परिसर को यहूदी टेंपल माउंट कहते हैं और उनके लिए यह सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है. यहां हजारों साल पहले एक यहूदी मंदिर था जिसका जिक्र बाइबिल में भी है. लेकिन आज यहां पर अल अक्सा मस्जिद है जो इस्लाम में तीसरा सबसे अहम धार्मिक स्थल है.

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बातचीत पर जोर

पूरे येरुशलम पर इस्राएल का नियंत्रण है और यही से उसकी सरकार भी चलती है. लेकिन पूर्वी येरुशलम को अपने क्षेत्र में मिला लेने के इस्राएल के कदम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता नहीं मिली है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि येरुशलम का दर्जा बातचीत के जरिए तय होना चाहिए. हालांकि सभी दूतावास तेल अवीव में हैं.

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इस्राएल की कोशिश

इस्राएल लंबे समय से येरुशलम को अपनी राजधानी के तौर पर मान्यता दिलाना की कोशिश कर रहा है. यहीं इस्राएली प्रधानमंत्री का निवास और कार्यालय है. इसके अलावा देश की संसद और सुप्रीम कोर्ट भी यहीं से चलती है और दुनिया भर के नेताओं को भी इस्राएली अधिकारियों से मिलने येरुशलम ही जाना पड़ता है.

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बाड़

येरुशलम के ज्यादातर हिस्से में यहूदी और फलस्तीनी बिना रोक टोक घूम सकते हैं. हालांकि एक दशक पहले इस्राएल ने शहर में कुछ अरब बस्तियों के बीच से गुजरने वाली एक बाड़ लगायी. इसके चलते हजारों फलस्तीनियों को शहर के मध्य तक पहुंचने के लिए भीड़ भाड़ वाले चेक पॉइंट से गुजरना पड़ता है.

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इस्राएली अमीर, फलीस्तीनी गरीब

शहर में रहने वाले इस्राएलियों और फलस्तीनियों के बीच आपस में बहुत कम संवाद होता है. यहूदी बस्तियां जहां बेहद संपन्न दिखती हैं, वहीं फलस्तीनी बस्तियों में गरीबी दिखायी देती है. शहर में रहने वाले तीन लाख से ज्यादा फलस्तीनियों के पास इस्राएल की नागरिकता नहीं है, वे सिर्फ 'निवासी' हैं.

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हिंसा का चक्र

इस्राएल और फलस्तीनियों के बीच बीते 20 वर्षों में हुई ज्यादातर हिंसा येरुशलम और वेस्ट बैंक में ही हुई है. 1996 में येरुशलम में दंगे हुए थे. 2000 में जब तत्कालीन इस्राएली प्रधानमंत्री एरिएल शेरोन टेंपल माउंट गये, तो भी हिंसा भड़क उठी.

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हालिया हिंसा

हाल के सालों में 2015 में एक के बाद एक चाकू से हमलों के मामले देखने को मिले. बताया जाता है कि टेंपल माउंट में आने वाले यहूदी लोगों की बढ़ती संख्या से नाराज चरमपंथियों ने इस हमलों को अंजाम दिया.

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कैमरों पर तनातनी

2016 में उस वक्त बड़ा विवाद हुआ जब इस्राएल ने अल अक्सा मस्जिद के पास सिक्योरिटी कैमरे लगाने की कोशिश की. फलस्तीनी बंदूकधारियों के हमलें में दो इस्राएली पुलिस अफसरों की मौत के बाद कैमरे लगाने का प्रयास किया था.

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ट्रंप ऐसा क्यों कर रहे हैं

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान कड़ा इस्राएल समर्थक रुख अपनाते हुए तेल अवीव से अमेरिकी दूतावास को येरुशलम ले जाने का वादा किया था. अमेरिकी कानून के तहत राष्ट्रपति को हर छह महीने में एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर करना होता है, जो दूतावास को तेल अवीव में बनाये रखने की छूट देता है.

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नेतान्याहू के लिए?

तमाम विरोध के बावजूद जहां ट्रंप ने येरुशलम को इस्राएल की राजधानी के रूप में मान्यता देकर अपना चुनावी वादा निभाया है, वहीं शायद वह इस्राएल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतान्याहू को भी खुश करना चाहते थे. विश्व मंच पर नेतान्याहू ट्रंप के अहम समर्थक माने जाते हैं.

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कड़ा विरोध

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अमेरिकी दूतावास को येरुशलम ले जाने की ट्रंप की योजना का विरोध हो रहा है. फलस्तीनी प्रधिकरण ने कहा है कि अमेरिका येरुशलम को इस्राएली की राजधानी के तौर पर मान्यता देता तो इससे न सिर्फ शांति प्रक्रिया की रही सही उम्मीदें भी खत्म हो जाएंगी, बल्कि इससे हिंसा का एक नया दौर भी शुरू हो सकता है.

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सऊदी अरब भी साथ नहीं

अमेरिका के अहम सहयोगी समझे जाने वाले सऊदी अरब ने भी ऐसे किसी कदम का विरोध किया है. वहीं 57 मुस्लिम देशों के संगठन इस्लामी सहयोग संगठन ने इसे 'नग्न आक्रामकता' बताया है. अरब लीग ने भी इस पर अपना कड़ा विरोध जताया है. [रिपोर्ट: एके/ओएसजे (एपी)]

इस्राएल को छोड़ कर किसी भी अन्य देश ने ट्रंप के ताजा कदम का समर्थन नहीं किया है. बहुत से देशों ने इसकी आलोचना करते हुए बयान जारी किये हैं. बोलिविया, ब्रिटेन, मिस्र, फ्रांस, इटली, सेनेगल, स्वीडन और उरुग्वे ने संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने इस बारे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाने को कहा है और उनसे इस बैठक में बोलने को भी कहा है. यह बैठक शुक्रवार को होगी.

ट्रंप की घोषणा के बाद गुटेरेश ने कहा कि येरुशलम के अंतिम दर्जे का फैसला इस्राएल और फलस्तीनियों के बीच बातचीत के जरिए ही होना चाहिए. गुटेरेश ने कहा कि वह "हमेशा एकतरफा तौर पर उठाये जाने वाले कदमों के विरुद्ध बोलते रहे हैं."

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इस बीच, फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने कहा है कि मध्य पूर्व में शांति के लिए मध्यस्थ के तौर पर ट्रंप ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है. ट्रंप के ताजा फैसले के कारण पहले से अस्थिर इस क्षेत्र में नये सिरे से अशांति पैदा हो सकती है. फलस्तीनी प्रधाधिकरण ने गुरुवार को वेस्ट बैंक में हड़ताल की घोषणा की है. वहीं चरमपंथी फलस्तीनी संगठन हमास ने शुक्रवार को "आक्रोश दिवस" मनाने का एलान किया है.

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आज, माउंट ऑफ ऑलिव्स

पुराने शहर की दीवार और सोने का गुंबद डोम ऑफ द रॉक और पीछे नजर आने वाला पहाड़ जो पुराने शहर के पूर्व में स्थित है. यहां दुनिया का सबसे पुराना अभी भी इस्तेमाल हो रहा यहूदी कब्रिस्तान है जो पहाड़ के पश्चिमी और दक्षिणी ढलान पर स्थित है. एक वक्त में यहां बहुत सारे जैतून के पेड़ हुआ करते थे और इसलिये इस क्षेत्र का नाम माउंट ऑफ ऑलिव्स पड़ा.

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1967, माउंट ऑफ ऑलिव्स

यदि प्राचीन ऑटोमन शहर की दीवार और दरगाह तस्वीर में नजर न आये तो लोग शायद यह समझ ही न पायें कि यह वही जगह है जिसकी तस्वीर हमने पहले देखी थी. यह तस्वीर 7 जून 1967 को ली गई थी जब अरब-इस्राएल युद्ध अपने चरम पर था.

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आज, अल-अक्सा मस्जिद

चांदी के रंग के गुंबद और विशाल हॉल वाली अल-अक्सा मस्जिद टेंपल माउंट पर स्थित है. मुस्लिम इस मस्जिद को "नोबल सेंचुरी" कहते हैं लेकिन यह यहूदी धर्म का भी सबसे पवित्र स्थल माना जाता है. मान्यता है कि यहां ऐसे दो इबादतखाने थे जिनका उल्लेख बाइबिल में मिलता है. इसे मक्का और मदीना के बाद सुन्नी इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल कहा जाता है.

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1967, अल-अक्सा मस्जिद

अल अक्सा का अनुवाद, "सबसे दूर स्थित" मस्जिद होता है. यह येरुशलम की सबसे बड़ी मस्जिद है. 1967 के छह दिवसीय युद्ध में येरुशलेम पर विजय प्राप्त करने के बाद इस्राएल का इस इलाके पर सख्त नियंत्रण रहा है. उस वक्त नेताओं के बीच यह सहमति बनी थी कि मस्जिद का प्रबंधन इस्लामिक धार्मिक ट्रस्ट, वक्फ के पास होगा.

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आज, दमिश्क दरवाजा

इस दरवाजे का नाम दमिश्क दरवाजा इसलिये पड़ा क्योंकि यहां से गुजरने वाली सड़क दमिश्क को जाती है. येरुशलम के फलस्तीनी हिस्से का यह व्यस्त प्रवेश द्वार है. पिछले दो वर्षों में यह कई बार सुरक्षा संबंधी घटनाओं और फलस्तीन की ओर से इस्राएल पर हमलों का केंद्र रहा है

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1967, दमिश्क दरवाजा

इस ऐतिहासिक दमिश्क दरवाजे को तुर्क सुल्तान सुलेमान ने साल 1537 में तैयार करवाया था. यह काफी कुछ वैसा ही नजर आता है जैसा कि ये साल 1967 में नजर आता था. सात दरवाजों से होकर पुराने शहर और इसके अलग-अलग क्वार्टरों में प्रवेश संभव है.

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आज, ओल्ड सिटी

येरुशलम की ओल्ड सिटी 1981 से यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में है और काफी जीवंत नजर आती है. यहां विभिन्न धर्मों के कई महत्वपूर्ण स्थल हैं, मुस्लिमों के लिये डोम ऑफ द रॉक, अल अक्सा मस्जिद, यहूदियों के लिए पश्चिमी दीवार, ईसाइयों के लिये चर्च. साथ ही यहां खाने-पीने और खरीदारी करने के भी शानदार ठिकाने हैं. यह पर्यटकों का मुख्य आकर्षण केंद्र है.

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1967, ओल्ड सिटी

यह तस्वीर साल जुलाई 1967 में ली गई थी. 50 साल बाद भी यहां कुछ चीजें बिल्कुल नहीं बदली हैं. सिर पर थाल लिये एक लड़का यहां की गलियों में ब्रेड बेच रहा है. अन्य लोगों की चहलकदमी भी साफ नजर आ रही है.

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आज, वेस्टर्न वॉल

यह यहूदी लोगों के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है. यहूदी लोग यहां प्रार्थना करने आते हैं और दीवार की दरारों में कई बार नोट भी रख जाते हैं. यहां महिलाओं और पुरुषों के लिये अलग-अलग व्यवस्था है और यह स्थल साल भर खुला रहता है. लेकिन अंदर आने के लिये सुरक्षा जांच अनिवार्य है.

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1967, वेस्टर्न वॉल

इस दीवार को "वेलिंग वॉल" के नाम से भी जाना जाता है लेकिन यहूदी इसे एक अपमानजनक शब्द मानते हैं और इसका इस्तेमाल नहीं करते. दीवार पर आने वालों की यह तस्वीर उस वक्त ली गई थी जब इस्राएल ने छह दिन चले युद्ध के बाद इस क्षेत्र को अपने नियंत्रण में ले लिया था. 19 साल पहले इस इलाके पर जॉर्डन ने कब्जा कर लिया था.

अब्बास ने कहा है कि फलस्तीनी नेतृत्व आने वाले दिनों में बैठक करेगा और अरब नेताओं के साथ सलाह मशविरा कर इस मुद्दे पर अपना रुख तय करेगा. तुर्की और ईरान ने ट्रंप के कदम की कड़ी आलोचना की है. तुर्की ने इसे "गैरजिम्मेदाराना और गैरकानूनी" फैसला बताया है जबकि ईरान ने कहा है कि इसके "मुसलमान भड़केंगे और नए इंतेफादा को चिंगारी मिलेगी". अमेरिका के सहयोगी सऊदी अरब ने भी इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा है कि यह फलस्तीनी लोगों के अधिकार के खिलाफ "पक्षपाती रवैया" को दर्शाता है.

जर्मनी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वह ट्रंप के इस फैसले का "समर्थन नहीं करता" है. जर्मन विदेश मंत्री ने कहा है कि इससे "आग में घी डालने" का काम होगा. ब्रिटेन समेत कई अन्य यूरोपीय देशों ने भी अमेरिकी राष्ट्रपति के फैसले की आलोचना की है.

एके/एनआर (एएफपी, डीपी, एपी)