पाक-चीन दोस्ती पक्की, पर फायदा सिर्फ चीन का?

दुनिया के सबसे ऊंचे दर्रे से होकर गुजरने वाले काराकोरम हाइवे को चीन-पाकिस्तान फ्रेंडशिप हाइवे भी कहा जाता है. लेकिन इस दोस्ती का फायदा क्या सिर्फ चीन को हो रहा है? चीन में बसे कुछ पाकिस्तानी कारोबारी तो ऐसा ही मानते हैं.

1,300 किलोमीटर लंबा यह हाईवे चीन के पश्चिमी शहर कशगर से पाकिस्तान के पंजाब प्रांत तक आता है. गिलगित से होकर गुजरने वाला यह दो लेन का हाइवे चीन के लिए पाकिस्तान के साथ उसकी मजबूत दोस्ती का प्रतीक है जिसे चीन ने अरबों डॉलर के निवेश के साथ सींचा हैं.

लेकिन चीन में रहने वाले बहुत पाकिस्तानी कारोबारी मानते हैं कि दोस्ती का ज्यादातर फायदा सिर्फ चीन को हो रहा है. चीन के शहर ताशकुरगान में कीमती पत्थरों के कारोबारी मुराद शाह कहते हैं, "चीन कहता है कि हमारी दोस्ती हिमालय से ऊंची और समंदर से गहरी है लेकिन इसमें कोई दिल नहीं है. इस दोस्ती से पाकिस्तान को कोई फायदा नहीं हो रहा है. इससे सिर्फ चीन की ताकत मजबूत हो रही है."

हाल ही में चीन ने सड़क के जरिए कशगर को पाकिस्तान के अहम बंदरगाह ग्वादर से जोड़ने के लिए चीन-पाकिस्तान आर्थिक कोरिडोर परियोजना भी शुरू की है. यह प्रोजेक्ट चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड परियोजना का हिस्सा है. इसके जरिये चीन आज के दौर में सड़क और जल मार्गों के जरिये प्राचीन सिल्क रूट को फिर से साकार करना चाहते है.

2013 में चीन और पाकिस्तान ने 46 अरब डॉलर के एक समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसके तहत चीन-पाकिस्तान कोरिडोर के आसपास परिवहन और ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगा. इसी के तहत काराकोरम हाईवे को फिर से बनाने और अपग्रेड करने पर भी सहमति बनी.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

चीन-मंगोलिया-रूस

जून 2016 में इस प्रोजेक्ट पर चीन, मंगोलिया और रूस ने हस्ताक्षर किये. जिनइंग से शुरू होने वाला यह हाइवे मध्य पूर्वी मंगोलिया को पार करता हुआ मध्य रूस पहुंचेगा.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज

इस योजना के तहत चीन यूरोप से रेल के जरिये जुड़ चुका है. लेकिन सड़क मार्ग की संभावनाएं भी बेहतर की जाएंगी. 10,000 किलोमीटर से लंबा रास्ता कजाखस्तान और रूस से होता हुआ यूरोप तक पहुंचेगा.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

चाइना-पाकिस्तान कॉरिडोर

56 अरब डॉलर वाला यह प्रोजेक्ट चीन के पश्चिमी शिनजियांग प्रांत को कश्मीर और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जोड़ेगा.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

चाइना-सेंट्रल एंड वेस्ट एशिया कॉरिडोर

सदियों पुराने असली सिल्क रूट वाले इस रास्ते को अब रेल और सड़क मार्ग में तब्दील करने की योजना है. कॉरिडोर कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान, ईरान, सऊदी अरब और तुर्की को जो़ड़ेगा.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

दक्षिण पूर्वी एशियाई कॉरिडोर

इस कॉरिडोर के तहत चीन की परियोजना म्यांमार, वियतनाम, लाओस, थाइलैंड से गुजरती हुई इंडोनेशिया तक पहुंचेगी.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

चाइना-बांग्लादेश-इंडिया-म्यांमार कॉरिडोर

इस परियोजना के तहत इन चार देशों को सड़क के जरिये जोड़ा जाना था. लेकिन भारत की आपत्तियों को चलते यह ठंडे बस्ते में जा चुकी है. अब चीन बांग्लादेश और म्यांमार को जोड़ेगा.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

चाइना-नेपाल-इंडिया कॉरिडोर

म्यांमार के अलावा चीन नेपाल के रास्ते भी भारत से संपर्क जोड़ना चाहता है. इसी को ध्यान में रखते हुए चीन ने नेपाल को भी वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट में शामिल किया है.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

प्रोजेक्ट का मकसद

वन बेल्ट, वन रूट जैसी योजनाओं की बदौलत चीन करीब 60 देशों तक सीधी पहुंच बनाना चाहता है. परियोजना के तहत पुल, सुरंग और आधारभूत ढांचे पर तेजी से काम किया जा रहा है. निर्यात पर निर्भर चीन को नए बाजार चाहिए. बीजिंग को लगता है कि ये सड़कें उसकी अर्थव्यवस्था के लिए जीवनधारा बनेंगी.

क्या है चीन का "वन बेल्ट, वन रोड" प्रोजेक्ट

अमेरिका नहीं, चीन

डॉनल्ड ट्रंप की संरक्षणवादी नीतियों के चलते दुनिया भर के देशों को अमेरिका से मोहभंग हो रहा है. चीन इस स्थिति का फायदा उठाना चाहता है. बीजिंग खुद को अंतरराष्ट्रीय व्यापार की धुरी बनाने का सपना देख रहा है. इसी वजह से इन परियोजनाओं पर तेजी से काम हो रहा है.

दोनों देशों का कहना है कि इस परियोजना से चीन और पाकिस्तान, दोनों को फायदा होगा. लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयान करते हैं. चीन को होने वाला पाकिस्तान का निर्यात 2016 की आखिरी छमाही में लगभग आठ प्रतिशत गिर गया है जबकि इस दौरान पाकिस्तान में चीन से होने वाले आयात में 29 फीसदी का उछाल देखने को मिला है.

इतना ही नहीं, मई महीने में पाकिस्तान ने चीन पर आरोप लगाया कि वह उसके बाजार में सस्ते दामों पर बेतहाशा स्टील उतार रहा है. पाकिस्तान ने ऊंचा शुल्क लगाने की धमकी भी दी. वॉशिंगटन के सेंटर फॉर स्ट्रैटजिक एंड इंटरनेशनल स्टटीज के जोनाथन हिलमैन कहते हैं, "पाकिस्तानी निर्यात को लेकर बहुत उम्मीदें और सपने हैं. लेकिन अगर आप चीन से जुड़ रहे हैं तो फिर आप उसे क्या निर्यात करेंगे?"

चीन के शिनचियांग में कुछ पाकिस्तानी कारोबारी ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि आर्थिक कोरिडोर से कुछ फायदा होगा. लेकिन देश में सुरक्षा के हालात और जटिल कस्टम नियम उन्हें बाधा दिखायी पड़ते हैं. कशगर में रहने वाले एक पाकिस्तानी कारोबारी मोहम्मद कहते हैं, "अगर आप चीन से सामान लेते हैं तो कोई समस्या नहीं है. लेकिन अगर आप पाकिस्तानी सामान लाते हैं तो उस पर लगने वाला शुल्क ही तय नहीं है. आज यह पांच प्रतिशत है और कल को 20 प्रतिशत हो सकता है. कभी कभी तो वे सीधे सीधे कह देते हैं कि इसकी अनुमति नहीं है."

चीन के उइगुर मुसलमान

नए नियम, नयी बंदिशें

उइगुर चीन में रहने वाला एक जातीय अल्पसंख्यक समुदाय है. ये लोग सांस्कृतिक रूप से खुद को चीन के मुकाबले मध्य एशियाई देशों के ज्यादा करीब पाते हैं. मुख्यतः चीन के शिनचियांग प्रांत में रहने वाले उइगुर लोग न तो सार्वजनिक रूप से नमाज पढ़ सकते हैं और न ही धार्मिक कपड़े पहन सकते हैं.

चीन के उइगुर मुसलमान

धार्मिक कट्टरपंथ

नए सरकारी नियमों के मुताबिक मस्जिद में जाने के लिए व्यक्ति को कम से 18 साल का होना चाहिए. इसके अलावा अगर कोई सार्वजनिक जगह पर धार्मिक उपदेश देता दिखा तो पुलिस उसके खिलाफ कार्रवाई करेगी. इसके अलावा धार्मिक रीति रिवाज से शादी और अंतिम संस्कार को भी धार्मिक कट्टरपंथ से जोड़कर देखा जा रहा है.

चीन के उइगुर मुसलमान

शक और संदेह

उइगुर लोग शिनचियांग में सदियों से रह रहे हैं. 20वीं सदी की शुरुआत में उन्होंने अपने इलाके को पूर्वी तुर्केस्तान नाम देते हुए आजादी की घोषणा की थी. लेकिन 1949 में माओ त्सेतुंग ने ताकत के साथ वहां चीनी शासन लागू कर दिया. उसके बाद से चीन और उइगुर लोगों के संबंध संदेह और अविश्वास का शिकार हैं.

चीन के उइगुर मुसलमान

बदल गया समीकरण

शिनचियांग पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए चीन की सरकार ने देश के अन्य हिस्सों से हान चीनियों को वहां ले जाकर बसाया है. 1949 में शिनचियांग में हान आबादी सिर्फ छह प्रतिशत थी जो 2010 में बढ़कर 40 प्रतिशत हो गई. शिनचियांग के उत्तरी हिस्से में उइगुर लोग अल्पसंख्यक हो गए हैं.

चीन के उइगुर मुसलमान

'अच्छे' मुसलमान

चीन में उइगुर अकेला मुस्लिम समुदाय नहीं है. हुई मुस्लिम समुदाय को भाषा और सांस्कृतिक लिहाज से हान चीनियों के ज्यादा नजदीक माना जाता है. उन्हें अधिकार भी ज्यादा मिले हुए हैं. अपनी मस्जिदें और मदरसे बनाने के लिए उन्हें चीन की सरकार से मदद भी मिलती है.

चीन के उइगुर मुसलमान

आतंकवाद और अलगाववाद

शिनचियांग की आजादी के लिए लड़ने वाले गुटों में सबसे अहम नाम ईस्ट तुर्केस्तान इस्लामिक मूवमेंट का है. इसके अलावा तुर्केस्तान इस्लामिक पार्टी भी है जिस पर अल कायदा से संबंध रखने के आरोप लगते हैं. इस गुट को शिनचियांग में हुए कई धमाकों के लिए भी जिम्मेदार माना जाता है.

चीन के उइगुर मुसलमान

समृद्धि का दायरा

शिनचियांग क्षेत्रफल के हिसाब से चीन का सबसे बड़ा प्रांत हैं और यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल है. कभी सिल्क रूट का हिस्सा रहे इस इलाके में चीन बड़ा निवेश कर रहा है. लेकिन उइगुर लोग चीन की चमक दमक और समृद्धि के दायरे से बाहर दिखाई देते हैं.

चीन के उइगुर मुसलमान

असमानता

हाल के बरसों में शिनचियांग में उइगुर और हान चीनियों के बीच असमानता बढ़ी है. वहां हो रहे तेज विकास के कारण चीन भर से शिक्षित और योग्य हान चीनी पहुंच रहे हैं. उन्हें अच्छी नौकरियां और अच्छे वेतन मिल रहे हैं. वहीं उइगुर लोगों के लिए उतने मौके उलब्ध नहीं हैं. (रिपोर्ट: रिज्की नुग्रहा/एके)

शाह बताते हैं कि तीन साल पहले लापिस लाजुली नाम के नीले पत्थरों पर उनसे प्रति किलो 15 युआन लिये गये थे. अब यह शुल्क बढ़ाकर 50 युआन प्रति किलो कर दिया गया है. वहीं कस्टम अधिकारियों का कहना है कि बहुत सारी चीजें हैं जिनसे शुल्क तय होता है और उनके बारे में निश्चित तौर पर बताना मुश्किल है.

शिनचियांग प्रांत में हाल के दिनों में सुरक्षा भी सख्त हुई है. एक बड़ी मुस्लिम आबादी वाले इस प्रांत में असंतोष और हिंसक घटनाओं को देखते हुए दसियों हजार सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया गया है. ऐसे में, वहां रहने वाले पाकिस्तानी कारोबारियों को संदेह की निगाह से देखा जाता है. कभी कभी तो एक ही दिन में उन्हें कई बार जांच से गुजरना पड़ता है.

मोहम्मद को उम्मीद है कि आर्थिक कोरिडोर से चीजें आसान होंगी, लेकिन सख्त सुरक्षा नियम हमेशा एक बाधा बन रहेंगे. उनका इरादा चीन में अभी तीन साल और रहने का है. मोहम्मद के बाद देखेंगे कि क्या करना है. उनके मुताबिक, "बहुत से लोग तो पहले ही वापस जा चुके हैं."

एके/ओएसजे (एएफपी)

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

तंजानिया-जाम्बिया रेल नेटवर्क

ताजारा कहा जाने वाले इस प्रोजेक्ट के जरिये 1976 में चीन ने पूर्वी अफ्रीका को मध्य और दक्षिणी अफ्रीका से जोड़ा. 1,860 किलोमीटर लंबे नेटवर्क को खड़ा करने के लिए चीन ने 50,000 कामगारों की मदद ली. पूरी योजना चीन की ही आर्थिक मदद से चली.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

तिब्बत तक

एक जुलाई 2006 के दिन तिब्बत की राजधानी ल्हासा तक ट्रेन पहुंचाकर विश्व को हैरान कर दिया. ट्रेन में खुद तत्कालीन चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ भी सवार थे. समुद्र से 5,027 मीटर की ऊंचाई पर बना यह दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे नेटवर्क है.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

जर्मनी तक

अक्टूबर 2013 में चीन की मालगाड़ी, ट्रांस साइबेरियन रूट का इस्तेमाल करते हुए 9,820 किलोमीटर का सफर कर जर्मनी के पोर्ट शहर हैम्बर्ग पहुंची. उस वक्त यह रिकॉर्ड था. इस तरह चीन ने अपने हार्बिन शहर को जर्मनी के कारोबारी शहर हैम्बर्ग से जोड़ा.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

तुर्की में

जनवरी 2014 में चीन ने तुर्की में हाई स्पीड रेलवे नेटवर्क का काम पूरा कर दिया. अब इंस्ताबुल और अंकारा के बीच हाई स्पीड ट्रेनें चलती हैं.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

स्पेन तक

दिसंबर 2014 में चीन की 82 बोगियों वाली मालगाड़ी स्पेन की राजधानी मैड्रिड पहुंची. 18 नंबवर को यिवु शहर से चली यह मालगाड़ी 13,000 किलोमीटर लंबा सफर कर 9 दिसंबर को मैड्रिड पहुंची. ट्रेन, रूस, जर्मनी और फ्रांस समेत 8 देशों को पार करते हुए गई. आज चीन और यूरोप के बीच नियमित रूप से मालगाड़ियां आती जाती हैं.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

म्यामांर तक

2015 में चीन ने म्यामांर की राजधानी यांगोन और कुनमिंग शहर को रेल सेवा से जोड़ने का काम शुरू किया. प्रोजेक्ट 2020 में पूरा होगा. 1,920 किलोमीटर लंबे इस रास्ते पर 140 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से ट्रेनें चलेंगी.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

अंगोला में

2015 में चीन ने अंगोला में 1,344 किलोमीटर का रेल नेटवर्क तैयार कर चालू कर दिया. चाइना रेल कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन द्वारा बनाया गया यह रेल ढांचा देश का सबसे अहम आर्थिक गलियारा है.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

तेहरान तक

15 फरवरी 2016 को 32 बोगियों वाली चीनी मालगाड़ी ईरान की राजधानी तेहरान पहुंची. मालगाड़ी झेंगजियांग प्रांत से कजाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान पहुंची.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

फिर से सिल्क रूट का सफर

तेहरान तक ट्रेन पहुंचाकर चीन ने सैकड़ों साल पुराने सिल्क रूट के पैदल रास्ते को फिर से जीवित कर दिया.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

नाइजीरिया में

जुलाई 2016 में चीन की मदद से बने रेल नेटवर्क पर नाइजीरिया में पहली ट्रेन चली. ट्रेन में खुद नाइजीरिया के राष्ट्रपति सवार थे. 186 किलोमीटर लंबा ट्रैक राजधानी अबूजा को काडुना शहर से जोड़ता है. ट्रैक की उच्चतम रफ्तार 150 किलोमीटर प्रतिघंटा है.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

अफगानिस्तान तक

सितंबर 2016 में चीन ने अफगानिस्तान को जोड़ने वाले रेलवे ट्रैक का काम खत्म कर वहां भी मालगाड़ी पहुंचा दी.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

अदिस अबाबा-जिबूती रेल नेटवर्क

अफ्रीका के पांच देशों में भी चीन का रेल नेटवर्क है. अक्टूबर 2016 में अदिस अबाबा-जिबूती में चीन ने 120 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार वाला 752.7 किलोमीटर लंबा ट्रैक बना दिया. चीन इथियोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में मेट्रो रेल नेटवर्क शुरू भी कर चुका है.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

पाकिस्तान तक

दिसंबर 2016 में चीन ने पाकिस्तान के सबसे बड़े शहर कराची तक मालगाड़ी पहुंचा दी. मालगाड़ी पर 500 टन माल लदा था. ट्रेन के जरिये कुनमिंग से कराची तक परिवहन का खर्चा 50 फीसदी घट जाएगा. ट्रेन नियमित रूप से चलेगी.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

मोम्बासा-नैरोबी ट्रैक

2017 के अंत तक चीन केन्या में 480 किलोमीटर लंबा रेल नेटवर्क पूरा कर देगा. इसका काम 2014 में शुरू हुआ था. 2,935 किलोमीटर लंबा ट्रैक राजधानी नैरोबी को मोम्बासा से जो़ड़ेगा. इस ट्रैक पर यात्री ट्रेनें 120 किमी प्रतिघंटा की रफ्तार से चल सकेंगी. देर सबेर इस ट्रैक के जरिये यूगांडा, रवांडा, बुरुंडी और साउथ सूडान को जोड़ा जाएगा.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

नेपाल तक

चीन अब नेपाल तक रेल नेटवर्क का विस्तार करना चाहता है. नेपाल और चीन के बीच इस मसले पर बातचीत भी हो रही है. चीन चाहता है कि वह काठमांडू होते हुए पोखरा और लुम्बिनी तक रेल पहुंचाये. चीन नेपाल को तिब्बत से भी जोड़ना चाहता है.

दुनिया को जोड़ता चीन का रेल नेटवर्क

भारत तक

चीन चाहता था कि तिब्बत व नेपाल को जोड़ने वाले रेलवे ट्रैक से भारत भी जुड़े. ऐसा हुआ तो भारत का रेल नेटवर्क भी ग्लोबल नेटवर्क से जुड़ जाएगा. बीजिंग की कोशिश है कि तिब्बत को भारत, चीन और नेपाल के बीच व्यापारिक केंद्र की तरह इस्तेमाल किया जाए. हालांकि भारत ने अभी तक इस नेटवर्क के बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है.

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