नियमों के चलते "अनाथ" हो जाने को मजबूर बच्ची

भारत में सरोगेसी से पैदा हुई एक बच्ची के माता पिता तो ब्रिटिश हैं, लेकिन अभी कुछ समय उसे अनाथालय में गुजराना पड़ सकता है. हालांकि अब सुषमा स्वराज ने कोशिश शुरू की है.

बच्ची का ब्रिटिश पासपोर्ट बनने में देरी हो रही है. इसलिए उसके ब्रिटेन जाने में अभी बाधा है. उसके पिता क्रिस न्यूमैन और मां मिशेल न्यूमैन मेडिकल वीजा पर मुंबई में हैं और उनका वीजा सिर्फ 7 अक्टूबर तक है. उनकी बेटी लिली का मई में जन्म हुआ, जिसके कुछ दिन बाद ही उसके पासपोर्ट के लिए आवेदन कर दिया गया. लेकिन क्रिस और मिशेल का कहना है कि ब्रिटेन के विदेश मंत्रालय ने उनसे कहा है कि उन्हें अपनी बेटी के बिना ही ब्रिटेन जाना पड़ सकता है.

40 की उम्र को पार कर चुके इस दंपति का कहना है कि ऐसा तो वो सोच भी नहीं सकते थे. चेंज.ओआरजी पर एक ऑनलाइन याचिका में उन्होंने लिखा, "हम विश्वास ही नहीं कर सकते कि हमें वो करने को मजबूर किया जा रहा है जो हम सोच ही नहीं सकते कि अपनी बच्ची को यहां भारत में ही छोड़ कर चले जाएं."

भारत में महिलाओं के कानूनी अधिकार

भारत में महिलाओं के कानूनी अधिकार

पिता की संपत्ति का अधिकार

भारत का कानून किसी महिला को अपने पिता की पुश्तैनी संपति में पूरा अधिकार देता है. अगर पिता ने खुद जमा की संपति की कोई वसीयत नहीं की है, तब उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति में लड़की को भी उसके भाईयों और मां जितना ही हिस्सा मिलेगा. यहां तक कि शादी के बाद भी यह अधिकार बरकरार रहेगा.

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पति की संपत्ति से जुड़े हक

शादी के बाद पति की संपत्ति में तो महिला का मालिकाना हक नहीं होता लेकिन वैवाहिक विवादों की स्थिति में पति की हैसियत के हिसाब से महिला को गुजारा भत्ता मिलना चाहिए. पति की मौत के बाद या तो उसकी वसीयत के मुताबिक या फिर वसीयत ना होने की स्थिति में भी पत्नी को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. शर्त यह है कि पति केवल अपनी खुद की अर्जित की हुई संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है, पुश्तैनी जायदाद की नहीं.

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पति-पत्नी में ना बने तो

अगर पति-पत्नी साथ ना रहना चाहें तो पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने और बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांग सकती है. घरेलू हिंसा कानून के तहत भी गुजारा भत्ता की मांग की जा सकती है. अगर नौबत तलाक तक पहुंच जाए तब हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा 24 के तहत मुआवजा राशि तय होती है, जो कि पति के वेतन और उसकी अर्जित संपत्ति के आधार पर तय की जाती है.

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अपनी संपत्ति से जुड़े निर्णय

कोई भी महिला अपने हिस्से में आई पैतृक संपत्ति और खुद अर्जित की गई संपत्ति का जो चाहे कर सकती है. अगर महिला उसे बेचना चाहे या उसे किसी और के नाम करना चाहे तो इसमें कोई और दखल नहीं दे सकता. महिला चाहे तो उस संपत्ति से अपने बच्चो को बेदखल भी कर सकती है.

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घरेलू हिंसा से सुरक्षा

महिलाओं को अपने पिता या फिर पति के घर सुरक्षित रखने के लिए घरेलू हिंसा कानून है. आम तौर पर केवल पति के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस कानून के दायरे में महिला का कोई भी घरेलू संबंधी आ सकता है. घरेलू हिंसा का मतलब है महिला के साथ किसी भी तरह की हिंसा या प्रताड़ना.

भारत में महिलाओं के कानूनी अधिकार

क्या है घरेलू हिंसा

केवल मारपीट ही नहीं फिर मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना भी घरेलू हिंसा के बराबर है. ताने मारना, गाली-गलौज करना या फिर किसी और तरह से महिला को भावनात्मक ठेस पहुंचाना अपराध है. किसी महिला को घर से निकाला जाना, उसका वेतन छीन लेना या फिर नौकरी से संबंधित दस्तावेज अपने कब्जे में ले लेना भी प्रताड़ना है, जिसके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला बनता है. लिव इन संबंधों में भी यह लागू होता है.

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पुलिस से जुड़े अधिकार

एक महिला की तलाशी केवल महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है. महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले पुलिस हिरासत में नहीं ले सकती. बिना वारंट के गिरफ्तार की जा रही महिला को तुरंत गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी होता है और उसे जमानत संबंधी उसके अधिकारों के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए. साथ ही गिरफ्तार महिला के निकट संबंधी को तुरंत सूचित करना पुलिस की ही जिम्मेदारी है.

भारत में महिलाओं के कानूनी अधिकार

मुफ्त कानूनी मदद लेने का हक

अगर कोई महिला किसी केस में आरोपी है तो महिलाओं के लिए कानूनी मदद निःशुल्क है. वह अदालत से सरकारी खर्चे पर वकील करने का अनुरोध कर सकती है. यह केवल गरीब ही नहीं बल्कि किसी भी आर्थिक स्थिति की महिला के लिए है. पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता समिति से संपर्क करती है, जो कि महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देने की व्यवस्था करती है.

इस मामले पर मंगलवार रात भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट किया, "क्या एक सरोगेट बच्चे की मंजिल एक अनाथालय होना चाहिए?"

सुषमा स्वराज ने व्यावसायिक सरोगेसी के खिलाफ अपने रुख को भी सामने रखा और इस बारे में सरकार की तरफ से हाल में बनाए गए सख्त कानूनों का बचाव किया. एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, "क्या व्यावसायिक सरोगेसी की वकालत करने वाले बताएंगे कि कैसे हल निकाला जाए और इस बच्ची की मदद की जाए." उन्होंने ये भी बताया कि ब्रिटेन में कमर्शल सरोगेसी पर प्रतिबंध है.

यह ब्रिटिश दंपति उन आखिरी लोगों में शामिल है जिनकी बच्ची भारत में नियम सख्त करने से कुछ दिन पहले ही सरोगेसी से पैदा हुई है. नए नियमों के मुताबिक कोई महिला सरोगेसी के जरिए सिर्फ अपने नजदीकी रिश्तेदार का ही बच्चा पैदा कर सकती है.

देखिए, कामकाजी मांओं की मुश्किलें

कामकाजी मांओं की मुश्किलें

जानकारी

गर्भधारण के साथ ही महिलाओं के लिए करियर संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है. वजन बढ़ना, सूजन, उल्टियां और ना जाने कितनी स्वास्थ्य समस्याएं लगी रहती हैं. ऐसे में अपनी संस्था, कंपनी या नौकरी देने वाले को अपनी कठिनाईयों के बारे में जानकारी देनी चाहिए.

कामकाजी मांओं की मुश्किलें

जिम्मेदारी

कंपनी और अपने बॉस को जानकारी देना इसलिए भी जरूरी है ताकि वह समय रहते आपके लिए छुट्टियों की योजना बना सके और यह भी सोच सके कि उस दौरान काम कैसे चलाना है. ध्यान रखें कि जिस तरह कंपनी की आपके प्रति कुछ जिम्मेदारी है, आप की भी उसके हित के प्रति जवाबदेही है.

कामकाजी मांओं की मुश्किलें

रेस में बने रहें

दुनिया की 500 सबसे बड़ी कंपनियों के प्रमुकों में केवल 21 महिलाएं हैं और विश्व के 197 राष्ट्रप्रमुखों में केवल 22 महिलाएं. किसी भी क्षेत्र में टॉप स्तर पर इतनी कम महिलाओं के होने का कारण महिलाओं का इस रेस से बहुत जल्दी बाहर होना है, जो कि सबसे अधिक मां बनने के कारण होता है.

कामकाजी मांओं की मुश्किलें

रोड़े हटाना

कामकाजी महिलाओं के जीवन में कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवरोध आते हैं. गहरे बसे लैंगिक भेदभाव से लेकर यौन उत्पीड़न तक. ऐसे में घबरा कर रेस छोड़ देने के बजाए इन रोड़ों को बहादुरी से हटाते हुए आगे बढ़ने का रवैया रखें. अमेरिकी रिसर्च दिखाते हैं कि पुरुषों को उनकी क्षमता जबकि महिलाओं को उनकी पूर्व उपलब्धियों के आधार पर प्रमोशन मिलते हैं.

कामकाजी मांओं की मुश्किलें

सपोर्ट नेटवर्क

एक ओर बाहर के रोड़ हैं तो दूसरी ओर कई महिलाएं अपने मन की बेड़ियों में कैद होती हैं. समाज की उनसे अपेक्षाओं का बोझ इतना बढ़ जाता है कि वे अपनी उम्मीदें और महात्वाकांक्षाएं कम कर लेती हैं. आंतरिक प्रेरणा के अलावा अपने आस पास ऐसे प्रेरणादायी लोगों का एक सपोर्ट नेटवर्क बनाएं जो मातृत्व, परिवार और करियर की तिहरी जिम्मेदारी को निभाने में आपका संबल बनें.

कामकाजी मांओं की मुश्किलें

पार्टनर की भूमिका

कामकाजी मांओं के साथ साथ उनके पति या पार्टनर को भी घर के कामकाज में बराबर का योगदान देना चाहिए. परिवार को समझना चाहिए कि महिला के लंबे समय तक वर्कफोर्स में बने रहने से पूरा परिवार लाभान्वित होता है. अपनी पूरी क्षमता और समर्पण भाव के साथ किया गया काम हर महिला की सफलता सुनिश्चित कर सकता है. जरूरत है बस रेस पूरी करने की.

उधर बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटिश गृह मंत्रालय ने कहा है कि बच्ची का पासपोर्ट तभी जारी किया जा सकता है जब एक बार ये सुनिश्चित हो जाए कि बच्ची के हित सुरक्षित हैं और वो ब्रिटिश नागरिक पाने की हकदार है.

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