18वें जन्मदिन पर युवाओँ को कल्चर बोनस देगा इटली

इटली की सरकार हर युवा को उसके 18वें जन्मदिन पर 500 यूरो का बोनस देगी. इसका इस्तेमाल किताबें, कॉन्सर्ट, थिएटर, सिनेमा या म्यूजियम की टिकटें खरीदने के लिए या फिर किसी नेशनल पार्क की यात्रा के लिए किया जा सकता है.

इटली की सरकार ने एक अनोखी योजना शुरू की है. युवाओं को उनके 18वें जन्मदिन पर कुछ धन दिया जाएगा. यह धन सरकार की ओर से तोहफा होगा जिसके जरिये युवाओं को संस्कृति और समाज के और करीब लाने की कोशिश होगी.

सितंबर महीने से शुरू हो रही इस योजना के तहत हर युवा को उसके 18वें जन्मदिन पर 500 यूरो यानी भारत के हिसाब से लगभग 35 हजार रुपये का एक वाउचर मिलता है. इस वाउचर को कल्चर बोनस नाम दिया गया है. इसका इस्तेमाल किताबें, कॉन्सर्ट, थिएटर, सिनेमा या म्यूजियम की टिकटें खरीदने के लिए या फिर किसी नेशनल पार्क की यात्रा के लिए किया जा सकता है.

देखिए, जासूसी उपन्यासों की असली जगहें

जासूसी उपन्यासों की असली जगहें

लंदन

बेकर स्ट्रीट 221बी. लंदन शहर के इस पते से कुछ याद आया? जी हां, यह पता है ब्रिटिश जासूसी किरदार शेरलॉक होम्स का. लेखक कोनन डॉयल की कल्पनाओं से गढ़ा गया जासूसी का सबसे मशहूर किरदार. आज लंदन शहर के इस पते पर एक म्यूजियम है जिसमें इस काल्पनिक किरदार से जुड़ी कई चीजें रखी हैं. मसलन उसकी आर्मचेयर, सिगार और चप्पलें.

जासूसी उपन्यासों की असली जगहें

स्टॉकहोम

स्टीग लार्सन के अपराध उपन्यासों की सिरीज 'मिलेनियम' ('द गर्ल विद दि ड्रेगन टैटू', 'द गर्ल हू प्लेड विद फायर' और 'द गर्ल हू किक्ड द हॉर्नेट्स नेस्ट') की शुरूआत स्टॉकहोम सिटी म्यूजिम से होती है. ​नायिका लिस्बेथ सेलेंडर का पहला अपार्टमेंट और उसका रोज का पब, मेलक्विस्ट कॉफी बार और क्वार्नेन रेस्टोरेंट. आप इन सभी जगहों को सोदेरमाल्म बोरो में घूम सकते हैं.

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कॉर्नवाल

मशहूर अंग्रेजी उपन्यासों में कॉर्नवाल के बीहड़ तट अक्सर ​नजर आते हैं. डेफ्ने डू मौरियर के रहस्य उपन्यास 'रेबेका' में उन्होंने फोवे कस्बे के नजदीक मेनाबिली के अपने खुद के घर को चुना. अल्फर्ड हिचकॉक ने इस उपन्यास को सिल्वर स्क्रीन पर पिरोया और इस फिल्म को 1940 में दो ऑस्कर पुरस्कार मिले.

जासूसी उपन्यासों की असली जगहें

येस्टाद

हेनिंग मैनकेल के एक छोटे से स्वीडिश कस्बे येस्टाद पर आए एक अपराध उपन्यास के बाद ये कस्बा दुनियाभर में मशहूर हो गया. ये कहानी एक जासूस कर्ट वालेंडर की है जिसका घर मेरिएंगटन 10 में है. उसकी किताबों की पसंदीदा दुकान मुख्य चौराहे पर है और उसका पसंदीदा कैफे ​फ्रीडॉल्फ की पेस्ट्री की दुकान है. इस कस्बे में अब एक खास नक्शा भी लगा हुआ है इसमें आप कर्ट वालेंडर से जुड़ी खास जगहों को ढूंढ सकते हैं.

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वेनिस

डोना लेओन की अपराध उपन्यास श्रृंखला के किरदार कॉमिसारिओ गुइडो ब्रुनेटी के साथ वेनिस के गलियारों और नहरों का जिक्र आम तौर पर पढ़ा जा सकता है. ब्रुनेटी और उसका सहयोगी अधिकारी सेर्जेंट विआनेलो अपनी पुलिस बोट में शहर में गश्त लगाते हैं. और अक्सर रिएल्टो पुल के पास बार डो मोरी में रूकते हैं.

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पेरिस

मशहूर जासूस किरदारों में एक ज्यूल्स मैग्रट, बेल्जियम के उपन्यासकार ज्योर्जेस सिमेनॉन की कल्पना है. अपने तेज दिमाग और जबरदस्त फुर्ती से वह 75 संगीन मामलों को बिना फॉरेंसिक मदद के सुलझा लेता है. अपने काम के बीच में उसे चाहिए ब्रासेरी डाउफाइन से लाया गया सेंडविच और बीयर. इस कैफे की कल्पना पेरिस की डाउफाइन नाम की जगह को खयाल में रखकर की गई है.

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कोपनहेगन

डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन सबसे ज्यादा बिकने वाले ​लेखक जूसी एडलर ओल्सेन की जन्मस्थली भी रही है और उनके अपराध उपन्यासों की पृष्ठभूमि भी. आज वे शहर से कुछ दूर उत्तरी इलाके में रहते हैं. उनके उपन्यासों में दर्शाए गए वीभत्स अपराध पूरी तरह काल्पनिक हैं पर असल शहर उसमें दिखाई देता है.

इस योजना से पांच लाख 75 हजार युवाओं को फायदा होगा. और सरकार पर 29 करोड़ यूरो का बोझ पड़ेगा. लेकिन संसदीय अवर सचिव टोमास नानिचिनी का मानना है कि बोझ नहीं है, यह तो सही जगह पर सही निवेश है. उन्होंने कोरिएर अखबार से कहा, "यह पहल युवओं में एक सीधा संदेश देती है कि जब वे उम्र की एक दहलीज पार करके वयस्क समाज में प्रवेश कर रहे होते हैं तो वह समाज उनका स्वागत करना चाहता है, जिसका वे हिस्सा हैं."

इस योजना का ऐलान तो 10 महीने पहले ही हो गया था लेकिन इसे लागू करने में वक्त लगा. एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि अब सब कुछ लगभग तैयार है. इस बारे में इतालवी अखबार कोरिएर ने खबर छापी है. इस खबर की पुष्टि करते हुए अधिकारी ने बताया कि 15 सितंबर से योजना की औपचारिक शुरुआत हो जाएगी, हालांकि एक-दो दिन इधर-उधर हो सकते हैं.

तस्वीरों में, बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

हर किसी के लिए मौका

इंटरनेट और सेल्फ पब्लिशिंग ने पश्चिम में किताबों के प्रकाशन को काफी हद तक बदल दिया है. अब तक प्रकाशक तय करते थे कि वह किस लेखक की किताब छापेंगे. अब यह बंधन टूट रहा है. अब कोई भी इंटरनेट के माध्यम से अपनी लेखनी को दुनिया भर में पहुंचा सकता है.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

मुश्किल में प्रकाशक

अपनी किताब की मूल प्रति प्रकाशक को देना और फिर जबाव का इंतजार करना, अब तक लेखक इसी प्रक्रिया से गुजरते रहे हैं. लेकिन अब इंटरनेट पर पीडीएफ फाइल के जरिये ई-बुक लॉन्च करने का चलन जोरों पर है. अब प्रकाशकों की अहमियत कम होने लगी है.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

उजड़ते ग्राहक

फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेले में भारतीय कंपनी स्प्रिंग टाइम सॉफ्टवेयर का स्टॉल. यह कंपनी प्रकाशकों और पुस्तकालयों को सपोर्ट सिस्टम मुहैया कराती है. लेकिन जैसी हालत इस स्टॉल की है, वैसी ही कंपनी के ग्राहकों की भी हो रही है. सेल्फ पब्लिशिंग के चलते बाजार सिकुड़ रहा है. बचे खुचे हिस्से के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा हो रही है.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

बच्चों का बाजार

तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बावजूद ज्यादातर देशों में मां-बाप अब भी अपने बच्चों को किताबों से सिखाना पसंद करते हैं. यही वजह है कि फ्रैंकफर्ट बुक फेयर में इस बार बच्चों की किताबें प्रकाशित करने वालों की बाढ़ दिखी.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

नकल से परेशान

एक्जैक्ट बुक्स, निर्यात के मामले में भारत का सबसे बड़ा प्रकाशन घर है. कंपनी 66 विदेशी भाषाओं में बच्चों की किताबों के डिजाइन का कॉपीराइट बेचती है. लेकिन डिजाइन की चोरी या नकल एक बड़ी समस्या है.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

दूसरी मुश्किलें

जेजे इम्प्रिंट्स के सीईओ श्रवण जैन के मुताबिक भारत में भी बच्चों की किताबें बनाना और बेचना मुश्किल हो गया है. प्राइवेट स्कूलों द्वारा खुद किताबें बेचने का असर भी प्रकाशकों पर पड़ रहा है.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

पुस्तक मेले का बहिष्कार

भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी के फ्रैंकफर्ट आने से ईरान नाराज हुआ. ईरान ने पुस्तक मेले एक भी किताब पेश नहीं करते हुए मेले का बहिष्कार किया.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

मेला कब तक चलेगा

एक तरफ सेल्फ पब्लिशिंग और दूसरी तरफ अमेजन जैसी बड़ी कंपनी, छोटे और मध्यम स्तर के प्रकाशक इनके बीच घुटने लगे हैं. कम प्रकाशकों के आने से पुस्तक मेले पर भी असर पड़ा है. कभी 8 से 10 हॉलों तक फैला फ्रैंकफर्ट मेला इस बार चार हॉलों में सिमट गया.

बेड़ियों से मुक्त होती किताबें

भविष्य कुछ ऐसा

कंप्यूटर पर अपनी किताबों की मूल प्रति तैयार करने के बाद अब लेखकों के सामने कई तरह विकल्प हैं. वे चाहें तो किताब को इंटरनेट पर खुद प्रकाशित कर दें या फिर किसी प्रिटिंग प्रेस को सीधे मांग के हिसाब से ऑर्डर देकर अपनी किताब छपवा लें. यह काम बिना प्रकाशकों के बड़ी आसानी से होता रहेगा.

नानिचिनी कहते हैं कि यह तोहफा युवाओं को संस्क़ृति से जोड़ने का जरिया है. उनके शब्दों में, "यह तोहफा उन्हें याद दिलाता है कि संस्कृति को ग्रहण करना कितना जरूरी है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इससे उनके व्यक्तित्व का विकास होता है, बल्कि इसलिए भी कि इससे समाज का तानाबाना मजबूत होता है."

यह फंड युवाओं को मिलेगा एक ऐप के जरिए. कल्चर बोनस के लिए एक 18ऐप नाम का एक मोबाइल एप्लिकेशन बनाया गया है जिसके जरिए वाउचर को युवा अपने फोन पर ही डाउनलोड कर सकेंगे. उसके बाद इसका इस्तेमाल ऑनलाइन भी हो सकेगा और अगर कोई स्टोर पर इसे प्रयोग करना चाहे तो वह भी संभव होगा. यह धन सिर्फ इतालवी नागरिकों को नहीं मिलेगा, वे विदेशी युवा भी इसके हकदार होंगे जिनके पास इतालवी रिहायश के वैध कागजात होंगे.

तस्वीरें: युद्ध और बच्चों की किताबें

युद्ध और बच्चों की किताबें

लड़ने गए हैं पापा

अगस्त 1914 में यूरोप और फिर पूरी दुनिया युद्ध में शामिल हो गई. बच्चे भी इससे दूर नहीं थे. उनके भाई और पिता भी इस युद्ध में लड़ने गए थे और वह परिवार के साथ अकेले थे. उस वक्त बच्चों की किताबों में ज्यादातर लड़ाई की बात होती.

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युद्ध के वीर

जर्मन हर ट्रोसडॉर्फ में चल रही प्रदर्शनी में ऐसी किताबें दिखती हैं. कुछ किताबों में देशभक्ति और लड़ाई के लिए उकसाने वाली बाते हैं. कुछ याद दिलाते हैं कि युद्ध में दुश्मन भी इंसान ही होता है.

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हंसी मजाक में

इस किताब में मजेदार तस्वीरों के साथ बताया जा रहा है कि सैनिकों ने किस बहादुरी से दुश्मनों को अपने बगीचे से भगाया. लेकिन कुछ लेखकों ने मजाक की सारी हदें पार कर दीं.

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लड़ाई है, मजाक नहीं

ब्रिटिश साहित्य व्यंग्य करने में माहिर है, बच्चों की किताबों में भी. लेकिन इस किताब ने सारी सीमाएं लांघ दी हैं. एक बच्ची को बमों के साथ लुका छिपी खेलते दिखाया जा रहा है.

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आओ बच्चो, खेलें खेल

बच्चों की इस तस्वीर में दिखाया जा रहा है कि कैसे फ्रांस के बच्चे ब्रिटेन और बेल्जियम के साथ मिल कर जर्मन जहाजों को खत्म कर रहे हैं. जर्मन किताबों में भी बच्चे युद्ध का खेल खेलते दिखते हैं.

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ताश में भी लड़ाई

किताबें ही नहीं बल्कि बोर्ड गेम्स और ताश में भी लड़ाई को लाया जाता रहा. इस खेल में सर्बिया के राजा को जोकर बनाया गया है. लड़ाई के लिए प्रचार ही नहीं बल्कि प्रकाशनों ने युद्ध से खूब पैसे कमाए.

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युद्ध की क्लास

घर पर ही नहीं, स्कूल में भी शिक्षक बच्चों को लड़ाई के बारे में बताते. लेकिन अकसर स्कूल की छुट्टी कर दी जाती क्योंकि स्कूल को अस्पताल में बदल दिया जाता या चूल्हे के लिए कोयला या लकड़ी की कमी होती. बच्चों को फिर खेत में मदद करनी पड़ती थी.

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लड़कियों की किताबें

लड़के ही नहीं बल्कि प्रकाशनों ने लड़कियों के लिए भी किताबें निकालीं. इनमें उन लड़कियों की कहानियां होतीं जिनके परिवार वाले युद्ध में लड़ने गए होते और जिन्होंने बर्लिन में युद्ध का अनुभव किया.

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मिनटों में कला

बच्चों की किताबों पर शोध कर रहे फ्रीडरिष सी हेलर कहते हैं कि उस वक्त कलाकार लड़ाई की हर घटना को तस्वीरों में उतारते थे. फ्रांस की किताबों की क्वालिटी ज्यादा अच्छी थी. इस तस्वीर में दिखाया गया है कि जर्मनी का काला बूट किस तरह लियेज शहर को कुचल देता है.

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भूखे नहीं रहेंगे

इस तरह के विज्ञापनों में खाते पीते बच्चे दिखाए गए हैं. इस तस्वीर के नीचे लिखा है, "भूखे नहीं रहने देंगे." इससे सामाजिक संगठन बच्चों के लिए खाना जमा करने की तैयारी कर रहे थे और बता रहे थे कि कमी के बावजूद बच्चों को पूरा खाना मिलना चाहिए.

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खुशी की खबर नहीं

युद्ध के बढ़ने के साथ साथ बच्चों की किताबों में तस्वीरें भी गंभीर होती गईं. मजेदार कहानियों की जगह लड़ाई में जहरीली गैस और टैंकों के बारे में बताया गया.

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रांस का चर्च

इस तस्वीर में दिखाया गया है कि रांस चर्च, जो युद्ध में बर्बाद हो गया है, किस तरह उठ खड़ा होता है और लोगों को एक करता है.

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शांति के कुछ साल

11 नवंबर 1918 को जर्मनी फ्रांस और इंग्लैंड के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर करता है. लेकिन शांति कुछ 20 साल बाद 1939 में खत्म हो जाती है.

प्रधानमंत्री मातेओ रेन्सी ने इस योजना का ऐलान पिछले साल नवंबर में किया था. इसके पीछे उनका मकसद आतंकवाद से लड़ना भी है. तब उन्होंने कहा था, "सुरक्षा पर खर्च किए गए हर अतिरिक्त यूरो के लिए संस्कृति में भी एक अतिरिक्त यूरो का निवेश होना चाहिए."

सरकार ऐसी ही एक योजना शिक्षकों के लिए भी बना रही है. अगले साल ऐसी योजना शुरू हो सकती है जिसके तहत शिक्षकों को 500 यूरो का एक पैकेज मिलेगा जिसे वे इसी तरह के चीजों पर खर्च कर सकेंगे.

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