अबला नारी से नहीं छूटा नाता

कभी मर्दों को भारतीय सिनेमा में औरतों के भेष में आना पड़ता था. बाद में महिला किरदारों ने सिक्का जमाया और उन पर आधारित फिल्में बनने लगीं. ऑस्कर तक पहुंचीं. लेकिन वक्त ने औरत को एक बार फिर हाशिए पर ला खड़ा किया.

दादा साहेब फाल्के ने जब भारत की ऐतिहासिक पहली फिल्म बनाई, तो उनके सामने दिक्कत यह थी कि महिला किरदार निभाने के लिए कोई था ही नहीं. आखिर में पुरुषों को ही मेकअप करके महिलाओं के तौर पर पेश किया गया. हालांकि फाल्के की बेटी मंदाकिनी फाल्के पर्दे पर आने वाली पहली लड़की जरूर बनीं लेकिन तब उनकी उम्र छह सात साल रही थी. इसके बाद से भारतीय फिल्म में औरतों को प्रवेश करने में लंबा वक्त लग गया.

लाइफस्टाइल | 08.02.2013

फिल्म समीक्षक नम्रता जोशी का कहना है कि हर दौर में महिलाओं के प्रति धारणा तोड़ने की कोशिश हुई लेकिन यह नाकाम रही, "शुरुआत में सोचा जाता था कि यह अच्छे घर की लड़कियों का पेशा नहीं है." बाद में जुबैदा और गौहर जैसी लड़कियों ने भी फिल्मों में काम किया. वक्त ने औरतों को रुपहले पर्दे पर ला तो दिया लेकिन सिर्फ सजाने के लिए. उनकी भूमिका आम तौर पर गौण रही. चाहे शुरुआती ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में हों या फिर आज की तड़क भड़क वाली दीपिका पादुकोण और प्रियंका चोपड़ा.

देविका रानी ने तोड़े मिथक

देविका बनी रानी

भारत ने जब पहली बोलती फिल्म देखी, तो उसी दौर में एक ताकतवर महिला किरदार भी पाया. रवींद्रनाथ टैगोर के परिवार की तीसरी पीढ़ी से ताल्लुक रखने वाली देविका रानी को भारत की पहली महिला अदाकारा के तौर पर याद किया जाता है. तेज तर्रार देविका पूरी तैयारी के साथ फिल्मों में आईं और आते ही छा गईं. जोशी कहती हैं कि वह महिला भागीदारी के मामले में भारतीय फिल्म की क्रांति से कम नहीं थीं, "देविका रानी ने कई फिल्म अशोक कुमार के साथ की और हर फिल्म में वह उतना ही छाप छोड़ती थीं, जितना अशोक कुमार. वह उन पहली महिलाओं में थीं, जिन्होंने फिल्मों की पढ़ाई की."

बदलती धारणा

ऑस्ट्रेलिया से आई मेरी इवान्स ने भारतीय फिल्म उद्योग को झकझोर कर रख दिया. पश्चिमी परिवेश में पली बढ़ी इवान्स हंटरवाली नाडिया के नाम से मशहूर हो गईं. जोशी बताती हैं कि नाडिया ने कुछ ऐसा कर दिया, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी, "फीयरलेस नाडिया ने रॉबिन हुड जैसी भूमिका निभाते हुए फिल्म के सारे स्टंट खुद किए. चलती ट्रेन में भागने से ले कर किसी आदमी को कंधे पर उठा कर घूमने तक उन्होंने वह सब किया जिसकी उम्मीद किसी पुरुष किरदार से की जाती है."

नरगिस बनीं मिसाल

तीस के दशक में नाडिया ने जो राह दिखाई, उसे भारतीय अदाकारों ने हाथों हाथ लिया. चालीस और पचास के दशक में सुरैया, मधु बाला और मीना कुमारी की बेमिसाल अदाकारी ने भारतीय फिल्म की पहचान पूरी दुनिया में करा दी. फिर नरगिस की मदर इंडिया आई. भारतीय वेदना, भावना, शोक और शौर्य की अद्भुत छवि फिल्म के पर्दे पर उतर आई. फिल्म ऑस्कर के नामांकन तक पहुंची. हालांकि फिल्म समीक्षक जोशी की नजर में यह भी एक औरत की लाचारी ही दिखाती थी, "जिन फिल्मों के केंद्र में महिला किरदार थे वे दरअसल अबला नारी की कहानी हुआ करती थी. चाहे पाकीजा की मीना कुमारी रही हों या फिर मदर इंडिया की नरगिस. ये ऐसी फिल्में हैं जिनमें महिलाओं का दर्द, उनकी तपस्या दिखाई जाती थी. समाज के लिए इन किरदारों को अपनाना आसान है कि एक औरत अपने परिवार के लिए, अपने समाज के लिए त्याग कर रही है."

मसाले में गुम

भारतीय फिल्म अभी महिलाओं के सशक्तिकरण का जश्न मना भी नहीं पाया था कि उद्योग एंग्री यंग मैन की राह पर मुड़ गया. इकलौता मर्द किरदार पूरी दुनिया को बदलने का सामर्थ्य रखने लगा और औरत उसके साये में गैरजरूरी हो गई. सिर्फ ग्लैमर के नाम पर अदाकाराएं फिल्मों में आतीं, जो नाच गाने और कुछ भड़कीले कपड़े पहनने के साथ रुखसत हो जाया करतीं.

लेकिन फूहड़ फिल्मों के बीच बॉलीवुड ने एक करवट और ली. यह समांतर सिनेमा और अर्थपूर्ण कला फिल्मों की करवट थी. भारतीय फिल्म कमाई और कला की दो अलग अलग पटरियों पर चलने लगा. इसी दौर में शबाना आजमी और स्मिता पाटिल जैसी बेमिसाल अभिनेत्रियों ने दस्तक दी. हालांकि जेएनयू में फिल्म विज्ञान पढ़ाने वाली रंजिनी मजूमदार को इस बात से तकलीफ है कि महिलाओं की अदाकारी को एक सीमा में बांधा जाता है, "महिलाओं पर केंद्रित फिल्मों को ले कर हमारी धारणा ही दिक्कत से भरी है. जरूरी नहीं कि वह किरदार वैसा ही दिखे जैसे शबाना आजमी, स्मिता पाटिल या तब्बू निभाती आईं हैं."

विद्या बालन से उम्मीद

मजूमदार का मानना है कि महिलाओं को समाज के हिस्से के तौर पर पेश किया जाना चाहिए और उसमें उन्हें पहचान बनाने का मौका दिया जाना चाहिए, "माधुरी दीक्षित की पर्दे पर एक बहुत ही मजबूत छवि उभर कर आती थी. वह अपने समय के किसी भी पुरुष अभिनेता को टक्कर देतीं थीं. ऐसा ही श्रीदेवी के साथ था. चालबाज में उन्होंने एक यादगार किरदार निभाया."

पिछले दो दशक में भारतीय फिल्मों में महिलाओं की सिर्फ पहचान बदल रही थी, भूमिका नहीं. वह तड़क भड़क वाली लड़की के तौर पर सामने आती रही, जो पार्टियों में जा सकती है, पुरुषों के साथ शराब पी सकती है या फिर आइटम सांग कर सकती थी, लेकिन फिल्मों में लीड रोल नहीं. हालांकि फैशन जैसी फिल्मों और विद्या बालन जैसी कद्दावर अभिनेत्रियों ने इस रिवायत को तोड़ने की पहल की है.

रिपोर्टः ईशा भाटिया

संपादनः अनवर जे अशरफ

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