सऊदी अरब: फिल्में भी हैं, फिल्मकार भी लेकिन सिनेमा नहीं हैं

सऊदी अरब में साहसी फिल्मकार हैं, अनकही कहानियां हैं और मनोरंजन के लिए तरसते युवा भी हैं. यानी एक स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री के लिए भरपूर संभावना. बस सिनेमाघर नहीं हैं.

पारंपरिक और रुढ़िवादी सऊदी समाज धीरे धीरे खुल रहा है, लेकिन बेहद सावधानी के साथ. मनोरंजन के नये नये साधन आ रहे हैं. स्थानीय फिल्मकार भी अपनी कला को परवान चढ़ा रहे हैं. वे इंटरनेट के जरिए अपनी फिल्में लोगों के सामने पेश कर रहे हैं और अभिव्यक्ति की सीमाओं को विस्तार देना चाहते हैं.

दुबई के "सिनेमा अकील" के सहसंस्थापक बुथेना काजिम का कहना है, "सऊदी अरब खाड़ी क्षेत्र में फिल्म मेकिंग का भविष्य है." उन्हें हाल के वर्षों में सऊदी अरब में उभरे फिल्मकारों से बहुत उम्मीदें हैं. काजिम ने अपने सिनेमा में पिछले महीने तीन सऊदी फिल्मकारों की फिल्में दिखायीं. इनमें एक फिल्म थी "वसती" जिसका अर्थ है उदारवादी. यह फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित है जो 1990 के दशक में हुई थी. उस वक्त सऊदी अरब में एक नाटक के दौरान बेहद रुढ़िवादी लोगों का एक समूह मंच पर आ गया और उसने नाटक को बंद करवा दिया. इस घटना ने सऊदी अरब में कई साल तक थियेटर को ठप्प कर दिया.

अली कलथामी की यह फिल्म पिछले साल लॉस एंजेलेस में दिखायी गयी थी. रियाद की अल यामामाह यूनिवर्सिटी में भी इसे दिखाया जा चुका है, उसी थियेटर में जहां दो दशक पहले उस नाटक को रोका गया था.

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पुरुषों के बगैर नहीं

सऊदी अरब में औरतें किसी मर्द के बगैर घर में भी नहीं रह सकती हैं. अगर घर के मर्द नहीं हैं तो गार्ड का होना जरूरी है. बाहर जाने के लिए घर के किसी मर्द का साथ होना जरूरी है, फिर चाहे डॉक्टर के यहां जाना हो या खरीदारी करने.

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फैशन और मेकअप

देश भर में महिलाओं को घर से बाहर निकलने के लिए कपड़ों के तौर तरीकों के कुछ खास नियमों का पालन करना होता है. बाहर निकलने वाले कपड़े तंग नहीं होने चाहिए. पूरा शरीर सिर से पांव तक ढका होना चाहिए, जिसके लिए बुर्के को उपयुक्त माना जाता है. हालांकि चेहरे को ढकने के नियम नहीं हैं लेकिन इसकी मांग उठती रहती है. महिलाओं को बहुत ज्यादा मेकअप होने पर भी टोका जाता है.

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मर्दों से संपर्क

ऐसी महिला और पुरुष का साथ होना जिनके बीच खून का संबंध नहीं है, अच्छा नहीं माना जाता. डेली टेलीग्राफ के मुताबिक सामाजिक स्थलों पर महिलाओं और पुरुषों के लिए प्रवेश द्वार भी अलग अलग होते हैं. सामाजिक स्थलों जैसे पार्कों, समुद्र किनारे और यातायात के दौरान भी महिलाओं और पुरुषों की अलग अलग व्यवस्था होती है. अगर उन्हें अनुमति के बगैर साथ पाया गया तो भारी हर्जाना देना पड़ सकता है.

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रोजगार

सऊदी सरकार चाहती है कि महिलाएं कामकाजी बनें. कई सऊदी महिलाएं रिटेल सेक्टर के अलावा ट्रैफिक कंट्रोल और इमरजेंसी कॉल सेंटर में नौकरी कर रही हैं. लेकिन उच्च पदों पर महिलाएं ना के बराबर हैं और दफ्तर में उनके लिए खास सुविधाएं भी नहीं है.

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आधी गवाही

सऊदी अरब में महिलाएं अदालत में जाकर गवाही दे सकती हैं, लेकिन कुछ मामलों में उनकी गवाही को पुरुषों के मुकाबले आधा ही माना जाता है. सऊदी अरब में पहली बार 2013 में एक महिला वकील को प्रैक्टिस करने का लाइसेंस मिला था.

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खेलकूद में

सऊदी अरब में लोगों के लिए यह स्वीकारना मुश्किल है कि महिलाएं भी खेलकूद में हिस्सा ले सकती हैं. जब सऊदी अरब ने 2012 में पहली बार महिला एथलीट्स को लंदन भेजा तो कट्टरपंथी नेताओं ने उन्हें "यौनकर्मी" कह कर पुकारा. महिलाओं के कसरत करने को भी कई लोग अच्छा नहीं मानते हैं. रियो ओलंपिक में सऊदी अरब ने चार महिला खिलाड़ियों को भेजा था.

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संपत्ति खरीदने का हक

ऐसी औपचारिक बंदिश तो नहीं है जो सऊदी अरब में महिलाओं को संपत्ति खरीदने या किराये पर लेने से रोकती हो, लेकिन मानवाधिकार समूहों का कहना है कि किसी पुरुष रिश्तेदार के बिना महिलाओं के लिए ऐसा करना खासा मुश्किल काम है.

कलथामी सऊदी अरब के सबसे मशहूर फिल्मकारों में से एक हैं. उन्होंने सी3 फिल्म कंपनी के अलावा तेलफाज11 के नाम से एक यूट्यूब चैनल भी बनाया है. 2011 में बनाये गये इस चैनल को अब तक एक अरब व्यूज मिल चुके हैं.

कलथामी की फिल्म वसती उन शॉर्ट फिल्मों में शामिल है जिन्हें पिछले साल किंग अब्दुलअजीज सेंटर फॉर वर्ल्ड कल्चर की तरफ से मिली रकम से बनाया गया है. कलथामी कहते हैं कि यह पहला मौका है जब फिल्म बनाने के लिए सरकार की तरफ से पैसा दिया गया है. सऊदी फिल्मकार अपनी फिल्मों को इंटरनेट पर स्ट्रीम कर सकते हैं. तेलफाज11 ने तो यूट्यूब के साथ करार भी किया है.

सऊदी अरब में कुछ फिल्में विशुद्ध रूप से मनोरंजन के लिए बनायी जा रही हैं जबकि कुछ फिल्में सऊदी अरब में आम लोगों के सामने आने वाली मुश्किलों पर केंद्रित हैं.

2013 में "वादजा" नाम की फिल्म ने इतिहास बनाया. यह सऊदी अरब से एकेडमी अवॉर्ड्स में भेजी गयी पहली फिल्म बनी. हालांकि उसे ऑस्कर के लिए नामांकित नहीं किया गया. यह फिल्म 10 साल की एक लड़की की कहानी पर आधारित है जो लड़कों की तरह साइकिल चलाने का सपना देखती है. इस फिल्म को महिला सऊदी निर्देशक हैफा अल-मंसूर ने लिखा और निर्देशित किया. यह फिल्म पूरी तरह सऊदी अरब में ही शूट की गयी थी.

Immanuel-Kant-Weltbürger-Preis Filmregisseurin Haifaa al Mansour

हैफा अल मंसूर सऊदी अरब के नामी फिल्मकारों में शामिल हैं

सऊदी अरब में सरकार ने मनोरंजन पर पाबंदियों में ढील देनी शुरू की है. इस वजह से वहां अब फिल्में बन रही हैं. 31 साल के सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान जब सत्ता संभालेंगे तो उनके सामने ऐसा देश होगा जिसकी आधी से ज्यादा आबादी की उम्र 25 साल से कम होगी. इनमें से ज्यादातर लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं. वे वहां पर सरकारी सेंसरशिप से दूर दुनिया भर की चीजें देख सकते हैं.

क्राउन प्रिंस सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और समाज में विविधता लाना चाहते हैं. वह चाहते हैं कि सऊदी लोग घरेलू स्तर पर ज्यादा खर्च करें, खास कर मनोरंजन पर लोगों की तरफ खर्च की जाने वाली राशि को वह दोगुना करना चाहते हैं.

हालांकि सऊदी अरब में बहुत से प्रभावशाली मौलवी और बहुत से नागरिक भी पश्चिमी तर्ज के मनोरंजन को बुरा समझते हैं, लेकिन अगर सऊदी युवराज इसे बदलना चाहते हैं तो इसका मतलब है कि सऊदी अरब में जल्द ही सिनेमा खुल सकते हैं. वह रियाद में एक थ्रीडी एक्शन फिल्म की स्क्रीनिंग भी करवा चुके हैं. जेद्दाह में भी इसी तरह कई बार फिल्में दिखायी गयी हैं.

सऊदी अरब के शहर धाहरन में पिछले कुछ सालों से होने वाले फिल्म महोत्सव को भी सरकार का समर्थन हासिल है. इस बार इस महोत्सव में लगभग 60 सऊदी फिल्में दिखायी गयीं.

एके/एनआर (एपी)