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समाज

खून के रिश्तों पर भारी ममता

प्रभाकर मणि तिवारी
१३ फ़रवरी २०१८

"मैंने भले जन्म किसी और को दिया हो, लेकिन तीन साल से जिस बच्चे ने मुझे मां होने का अलौकिक सुख दिया, अब वही मेरा बेटा है. मेरे लिए खून के रिश्ते से ममता की अहमियत कहीं ज्यादा है." यह कहते हुए सलमा परवीन भावुक हो जाती हैं.

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Indien Vertauschte Kinder in Assam
तस्वीर: DW/P. Tiwari

सलमा के घर से लगभग 24 किलोमीटर दूर एक किसान अनिल बोरो की पत्नी शिवाली बोरो भी लगभग यही बात कहती हैं. वह कहती हैं, "अब यही मेरा बेटा है. शायद नियति को यही मंजूर था." यह पूरी कहानी कुंभ के मेले में बिछड़ने वाले बच्चों की किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है.

असम के बोड़ो-बहुल दरंग जिले में रहने वाली सलमा और शिवाली में यूं तो कोई समानता नहीं है. सलमा मुस्लिम हैं और उनके पति शहाबुद्दीन अहमद शिक्षक हैं. उधर, बोड़ो जनजाति के अनिल बोरो पेशे से एक किसान हैं. वह अपने सात बीघे खेतों में खेती कर रोजी-रोटी कमाते हैं. राज्य के इस इलाके में बीते कुछ सालों से बोड़ो और मुसलमानों के बीच अक्सर हिंसा भड़कती रही है. लेकिन एक घटना ने इन दोनों परिवारों को एक ऐसे धागे से बांध दिया है जिसकी मिसाल शायद ही कहीं देखने को मिले.

तीन साल पहले एक मानवीय भूल ने सांप्रदायिक और जातिगत ऊंच-नीच से ऊपर उठते हुए इलाके में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिसाल तो कायम की ही है, मजहब की दीवारें भी ढहा दी हैं. लगभग तीन साल पहले 11 मार्च, 2015 को इन दोनों महिलाओं ने जिला मुख्यालय स्थित मंगलदै सिविल अस्पताल में एक ही दिन बेटों को जन्म दिया था. लेकिन अब इसे नियति कहें, अस्पताल के कर्मचारियों का लापरवाही या संयोग, दोनों के बच्चे आपस में बदल गए थे.

अस्पताल से लौटने के बाद अपने बच्चों का रंग-रूप देख कर दोनों परिवारों को यह संदेह तो हो ही गया था कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ हुई है. उसके बाद इस गड़बड़ी को दुरुस्त करने के प्रयास शुरू हुए. इसके तहत थाने और अस्पताल में अर्जी देने और चारों अभिभावकों और दोनों बच्चों के डीएनए टेस्ट का मिलान करने में कोई पौने तीन साल गुजर गए. लंबी कानूनी प्रक्रिया और पुलिस जांच से गुजरने के बाद मंगलदै जिला अदालत ने दोनों परिवारों को बच्चों की अदला-बदली के लिए बुलाया. लेकिन वहां इसकी नौबत आने पर दोनों बच्चे रोने-चीखने लगे. वह अपनी-अपनी मां की गोद से उतरने को ही तैयार नहीं थे. तमाम कोशिशें बेकार हो जाने के बाद चारों लोगों ने तय किया कि वह बच्चों की अदला-बदली नहीं करेंगे. उनका अनुरोध सुनने के बाद जज ने उन्हें इस बारे में हलफनामा दायर करने को कहा. अब बीती 24 जनवरी को दोनों परिवारों ने हलफनामा दायर कर एक-दूसरे की कोख से जन्मी संतान को ही अपना बेटा मान लिया है.

सलमा परवीन कहती है, "लंबी कानूनी प्रक्रिया में काफी समय निकल गया. इस बीच बच्चा मुझसे काफी हिल-मिल गया था. उनकी अदला-बदला के दिन वह किसी भी सूरत में मेरी गोद से उतरने को तैयार नहीं हुआ." वह बताती है कि शिवाली की गोद में पले-बढ़े उनके बेटे का भी वही हाल था. यह देख कर दोनों परिवारों ने काफी सोच-समझ कर फैसला किया कि अब उन्होंने जिनका पालन-पोषण किया है, वही उनका बेटा है.

सलमा बताती हैं कि उन्हें अस्पताल से घर आने के एक सप्ताह बाद ही बेटे को लेकर शक हुआ था. इसकी वजह यह थी कि उसकी शक्ल-सूरत परिवार में किसी से नहीं मिलती थी. इसके उलट उसका चेहरा उस बोड़ो महिला से मिलता था जो उसी दिन उसी अस्पताल में प्रसव के लिए दाखिल हुई थी. परवीन और उनके पति ने अपने बेटे का नाम जुनैद रखा है जबकि अनिल बोरो ने अपने बेटे का रियान चंद्र.

अनिल बोरो कहते हैं, "अगर हमने जबरन बच्चों की अदला-बदली की होती तो वह रोते-रोते ही अपनी जान दे देते. इसलिए हमने मानवता के नाते इसी को नियति मान लिया है. अब हम लोग बेहद खुश हैं." छठी कक्षा में पढ़ने वाली अनिल की पुत्री चित्रलेखा भी नहीं चाहती है कि अब उसका भाई बदले. उधर, अहमद की पुत्री निडाल भी अब जुनैद को ही अपना भाई मानती है. वह इसे किसी दूसरे को देने के पक्ष में नहीं है.

वह बताते हैं कि गांव की पंचायत और अस्पताल अधीक्षक से शुरू में जब कोई सहायता नहीं मिली तो उन्होंने पुलिस के पास फरियाद की. दिसंबर, 2015 में पुलिस एफआईआर दायर करने के बाद दोबारा सबकी डीएनए जांच हुई. उसके बाद मामला अदालत के समक्ष पहुंचा. अदालत ने एक निश्चित तारीख को दोनों परिवारों को बच्चों की अदला-बदली के लिए बुलाया. लेकिन अदालत परिसर में बेहद मार्मिक दृश्य पैदा हो गया. बच्चों ने चीख-चीख कर आसमान सिर पर उठा लिया. यह देख कर दोनों परिवारों ही नहीं, अदालत परिसर में मौजूद तमाम लोगों की आंखें भी नम हो उठीं. घंटों कोशिश करने के बावजूद बच्चे जब अपने परिवारों से अलग होने को तैयार नहीं हुए तो दोनों परिवारों ने अदला-बदली नहीं करने का फैसला किया.

इन दोनों परिवारों का कहना है कि अब वह कभी इन बच्चों की अदला-बदली का प्रयास नहीं करेंगे. शहाबुद्दीन और अनिल कहते हैं, "अब हम नजदीकी रिश्तेदार बन गए हैं और यह रिश्ता आजीवन बना रहेगा." उन दोनों ने अदालत में दायर अपने हलफनामे में भी यही बात कही है. उन्होंने अदालत से इस लापरवाही के लिए अस्पताल के दोषी कर्मचारियों को सजा देने की अपील जरूर की है ताकि आगे से किसी परिवार को इस मानसिक यंत्रणा से नहीं गुजरना पड़े.

अनिल के गांव बेजपाड़ा की पंचायत समिति के सदस्य सुरेश्वर बसुमतारी कहते हैं, "मानवता का रिश्ता आखिर में हर रिश्ते पर भारी साबित हुआ. यह घटना पूरे इलाके में सांप्रदायिक सौहार्द्र की एक मिसाल बन गई है."  बसुमतारी का कहना है कि इससे बेहतर बात क्या हो सकती है कि एक हिंदू का बच्चा मुसलमान के घर में पले और मुसलमान का हिंदू के घर में.

अनिल कहते हैं कि अगर अहमद ने शुरू में इस मुद्दे को तूल ही नहीं दिया होता तो अच्छा होता. तीन साल के दोनों मासूमों जुनैद और रियान को अब तक इस बात का अहसास तक नहीं है कि उन्होंने बोड़ो और मुस्लिम हिंसा के लंबे इतिहास वाले इस इलाके में इन दोनों तबके के दो परिवारों को आजीवन एक अनूठे व अटूट रिश्ते के धागों से बांध दिया है.