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पानी के लिए होने वाले युद्ध से कैसे बचेगी दुनिया

स्टुअर्ट ब्राउन
२७ अगस्त २०२१

हर इंसान को पीने के लिए साफ पानी मिलना चाहिए. लेकिन जैसे-जैसे दुनिया की आबादी बढ़ रही है और धरती गर्म हो रही है, क्या उस स्थिति में सभी को पीने के लिए साफ पानी मिल पाएगा?

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तस्वीर: Sebastian Lopez Brach/Getty Images

अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने इस साल की शुरुआत में कहा था, "कई वर्षों तक तेल को लेकर युद्ध होते रहे. कुछ समय बाद पानी को लेकर युद्ध लड़े जाएंगे." हमारी धरती के 70 प्रतिशत हिस्से पर पानी है. ऐसे में कहना कि ‘कुछ समय बाद' पानी के लिए युद्ध होगा, नाटकीय लग सकता है. पर ऐसा वाकई में हो सकता है.

संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दशकों में कई इलाकों में पानी की कमी की वजह से संघर्ष होगा, कुपोषण के मामले बढ़ेंगे, और बड़े पैमाने पर लोग विस्थापित होंगे. खासकर, अफ्रीका में यह स्थिति विकराल हो सकती है.

तो, सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर करना क्या चाहिए? कई लोग कहेंगे कि हम तो समाधान के आसपास ही हैं.

क्या हम समुद्र के पानी को पीने लायक बना सकते हैं?

हां, हम ऐसा कर सकते हैं. और कुछ मामलों में हम पहले से ऐसा करते रहे हैं. हालांकि, इससे जुड़ी कई चुनौतियां भी हैं. सबसे पहले तो समुद्र के खारे पानी से नमक निकालने के लिए काफी ज्यादा उर्जा की जरूरत होती है. इससे CO2 का उत्सर्जन बढ़ता है.

बारिश की तरह, समुद्र के पानी से नमक को अलग करने वाले महंगे संयंत्र असमान रूप से वितरित किए गए हैं. पूरी दुनिया में मौजूद लगभग 20,000 संयंत्रों में से आधे तेल समृद्ध खाड़ी देशों में स्थित हैं. कुल मिलाकर कहें, तो इसका फायदा उच्च आय वाले देश उठा रहे हैं.

इसलिए, अफ्रीका में, जहां तीन में से एक व्यक्ति पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है, वहां समुद्र के साफ किए गए पानी की पहुंच काफी सीमित है. विशेष रूप से गरीब देशों में. ये देश असमान रूप से बारिश होने की वजह से पहले से ही सूखे से प्रभावित हैं.

पानी के लिए युद्ध होगा?

दूसरी समस्या बचा हुई नमकीन पानी है. एक बार जब ताजा पानी अलग हो जाता है, तो बचा हुआ नमकीन पानी वापस समुद्र में चला जाता है. यहां ये पानी ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देता है, जिससे समुद्र में रहने वाले जीवों की मौत हो जाती है.

अभी हम कहां खड़े हैं?

दुनिया के कई शहरों का भविष्य अधर में है. कई शहरों में अभी से ही स्थिति भयावह होने लगी है. जैसे कि दक्षिण अफ्रीका के शहर केपटाउन में. 2018 में इस शहर में पानी खत्म होने के कगार पर था. शहर में रहने वाले लोगों को पानी की आपूर्ति करने के लिए, हजारों पेड़ों को काटा गया.

मैक्सिको सिटी में भी भूमिगत जल का स्तर सूखे की वजह काफी नीचे चला गया है. पश्चिम अमेरिका में करोड़ों लोगों को हाल ही में कहा गया है कि देश के सबसे बड़े कृत्रिम जलाश्य में पानी का स्तर कम होने की वजह से उन्हें अगले साल से पानी का इस्तेमाल कम करना होगा.

तस्वीरों मेंः प्यास से छटपटाते देश

इस बीच, टेक्सस के अल पासो में, शहर की वॉटर यूटिलिटी कंपनी पानी को साफ करने का संयंत्र स्थापित कर रही है. यह संयंत्र 2028 तक सीवेज के पानी को शुद्ध और साफ करेगी और इसे पाइप लाइन के जरिए घरों तक पहुंचाया जाएगा.

कठिन समय में कड़े कदम उठाने की जरूरत होती है. हालांकि, नामीबिया जैसे पानी की कमी वाले देशों में गंदे पानी को पीने लायक बनाने का काम दशकों से हो रहा है. इस प्रक्रिया में समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने से कम खर्च आता है और उर्जा भी कम खर्च होती है.

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1.5 डिग्री सेल्सियस वॉर्मिंग की वजह से गंभीर सूखा पड़ेगा और शहरों में रहने वाले 35 करोड़ और लोगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा. लीक हुई यह रिपोर्ट 2022 तक जारी हो सकती है.

जलवायु परिवर्तन पर इंटरगवर्नमेंटल पैनल ने हाल ही में बताया है कि अगले दशक में यह स्थिति पैदा हो सकती है. जब तक हम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी नहीं करेंगे, तब तक वॉर्मिंग और पानी की कमी से जुड़ी समस्या का सामना करना पड़ेगा. स्थिति विकराल होती जाएगी.

अभी हम क्या कर सकते हैं?

हमें अपनी जीवनशैली में बड़े बदलाव करने होंगे. यह बदलाव शावर से नहाने के समय को कम करना और अपने कपड़े और कारों को कम धोने जैसा आसान नहीं है. हम जो कुछ भी अपने शरीर पर और शरीर के लिए इस्तेमाल करते हैं, हमें उस पर कड़ी नजर रखनी होगी. इंसानों की तरह, कुछ कपड़ों और खाद्य पदार्थों में दूसरों की तुलना में बहुत ज्यादा पानी खर्च होता है.

एक किलो एस्प्रेसो कॉफी बीन्स तैयार होने में लगभग 19,000 लीटर पानी की खपत होती है, जबकि एक जोड़ी जींस बनाने के लिए लगभग 10,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. एक किलो बीफ के लिए 15,000 लीटर पानी की जरूरत होती है. ऐसे में आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं कि आपकी वजह से कितना पानी खर्च हो रहा है.

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वहीं दूसरी ओर, गाजर और टमाटर जैसी एक किलो सब्जियां उगाने में महज 200 लीटर पानी खर्च होता है. यहां तक कि एक किलो अंगूर उगाने में 500 लीटर पानी की जरूरत होती है. अगर आपको 500 लीटर पानी ज्यादा लग रहा है, तो बीफ को याद कर लीजिए.

जैसे-जैसे पानी की कमी होगी, ये संसाधन मिलने मुश्किल हो जाएंगे. पानी को बचाने के लिए हमें चॉकलेट के जुनून से भी निपटना होगा. एक किलो चॉकलेट को तैयार करने के लिए 17,000 लीटर से अधिक पानी खर्च होता है. चॉकलेट को स्वादिष्ट बनाने के लिए बादाम का भी इस्तेमाल होता है. इस बादाम को उगाने में भी काफी ज्यादा पानी खर्च होता है. ऐसे में अब सूखे की मार झेल रहे कैलिफोर्निया में किसान अखरोट के पेड़ काट रहे हैं.

विकल्प क्या है?

गाजर खाकर जिंदा रहें या भांग के रेशों से बने कपड़े पहनें? यह एक रास्ता है. हालांकि, सिर्फ इससे समस्या का समाधान नहीं होगा. जल पद्चिन्ह (वॉटर फुटप्रिंट) के विचार के जनक डच प्रोफेसर अर्जेन वाई होइकेस्ट्र के अनुसार, मांस की खपत में कटौती से पानी का इस्तेमाल 35 प्रतिशत से अधिक कम हो सकती है. हालांकि, यह पर्याप्त नहीं होगा.

कृषि में ताजे पानी का 70 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल होता है. सिंचाई के लिए इस्तेमाल करने के दौरान, पानी का एक बड़ा हिस्सा वाष्प बनकर उड़ जाता है. ऐसे में सिंचाई के बुनियादी ढांचे को भी बेहतर बनाने की जरूरत है.

पेड़ लगाना भी समाधान का एक हिस्सा हो सकता है. इस साल की शुरुआत में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि कृषि भूमि को जंगल में बदलने से वर्षा को बढ़ावा मिल सकता है, खासकर गर्मियों में.

इन सब के साथ जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करना जल बचाने का बेहतर उपाय है. ये सभी कारक साथ मिलकर पानी के लिए होने वाले संघर्ष को रोक सकते हैं, लाखों लोगों की जान बचा सकते हैं और लोगों को विस्थापन का दर्द झेलने से बचा सकते हैं.

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