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बंगाल: उपचुनाव ने बताया कि विपक्ष कितने पानी में

प्रभाकर मणि तिवारी
४ अक्टूबर २०२१

चंद महीनों पहले हुए विधानसभा चुनाव में जो बीजेपी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे रही थी, वह उपचुनाव में बिल्कुल फीकी नजर आई. ममता बनर्जी के सामने राज्य में पूरा विपक्ष बेबस दिखा.

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ममता बनर्जी ने उपचुनाव जीता
ममता बनर्जी की जीत पर किसी को शक नहीं था, बस यह देखना था कि वह कितने अंतर से जीतती हैंतस्वीर: Mani Tewari Prabhakar

पश्चिम बंगाल में बीते सप्ताह जिन तीन सीटों पर उपचुनाव हुए उनमें सबकी निगाहें कोलकाता की भवानीपुर सीट पर लगी थी. यहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवार थीं. इलाके की करीब 46 फीसदी गैर-बंगाली आबादी को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने यहां एक हिंदीभाषी प्रियंका टिबरेवाल को मैदान में उतारा था. इस सीट पर ममता की जीत कोई खबर नहीं है. उनकी जीत के भारी अंतर से भी किसी को कोई अचरज नहीं है. वोटर भी जानते थे कि वे मुख्यमंत्री को वोट दे रहे हैं.

लेकिन भवानीपुर और बाकी दो सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राज्य में विपक्षी राजनीति का मौजूदा चेहरा उजागर कर दिया है. नेतृत्व में बदलाव और आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही बीजेपी महज छह महीने पहले तक टीएमसी को कड़ी चुनौती देती नजर आ रही थी. लेकिन उपचुनाव में उसका खाता तक नहीं खुल सका. उसके विधायकों की तादाद भी लगातार घटती जा रही है. अप्रैल-मई में हुए विधानसभा चुनाव में 77 सीटें जीतने वाली भगवा पार्टी के पास अब महज 70 विधायक ही बचे हैं. कांग्रेस ने तो भवानीपुर में उम्मीदवार नहीं देने का फैसला कर अपनी लाज बचा ली. लेकिन सीपीएम उम्मीदवार की दुर्गति हो गई और उसे नोटा से महज 27 सौ वोट ही ज्यादा मिले. कई राउंड में पार्टी नोटा से भी पिछड़ी थी.

ममता की जीत

भवानीपुर विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए नाक और साख का सवाल बन गया था. दरअसल, भवानीपुर में सवाल कभी यह नहीं रहा कि ममता जीतेंगी या नहीं. यहां सबसे बड़ा सवाल था कि वे कितने वोटों के अंतर से जीतेंगी? ममता ने करीब 59 हजार वोटों के अंतर से जीत हासिल की है. इससे पहले वर्ष 2011 में हुए उपचुनाव में यहां वे करीब 54 हजार वोटों से जीती थीं. वर्ष 2016 में उनकी जीत का अंतर करीब 25 हजार था जबकि इस साल अप्रैल में हुए चुनाव में टीएमसी उम्मीदवार शोभनदेव चटर्जी ने करीब 29 हजार वोटों से जीत हासिल की थी. इससे साफ है कि अबकी जीत का अंतर दोगुने से ज्यादा है.

अपनी रिकॉर्ड जीत के बाद ममता ने कहा, "नंदीग्राम की साजिश का भवानीपुर के लोगों ने माकूल जवाब दे दिया है.” यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि नंदीग्राम में कड़े मुकाबले में ममता बीजेपी उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी से 1,956 वोटों से हार गई थी. हालांकि उन्होंने इस नतीजे को हाई कोर्ट में चुनौती दी है और यह मामला विचाराधीन है.

भवानीपुर के अलावा मुर्शिदाबाद जिले की जिन दो सीटों-जंगीपुर और शमशेरगंज में उपचुनाव हुआ, वे भी टीएमसी ने भारी अंतर से जीत ली हैं.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी
उपचुनावों में बीजेपी का प्रदर्शन उम्मीद से मुताबिक नहीं रहातस्वीर: DW/P. Mani Tiwari

जातीय समीकरण

भवानीपुर इलाका अपनी आबादी की विविधता की वजह से ‘मिनी इंडिया' कहा जाता है. इलाके में करीब 46 फीसदी गैर-बंगाली हैं और 20 फीसदी अल्पसंख्यक. ममता ने दावा किया कि इस बार उनको सभी तबके के लोगों का समान समर्थन मिला है. चुनाव नतीजों के विश्लेषण से ममता का दावा सही नजर आता है. बीते अप्रैल में विधानसभा चुनाव के समय पार्टी के उम्मीदवार शोभनदेव चटर्जी को यहां 57.71 फीसदी वोट मिले थे जबकि ममता को 71.91 फीसदी वोट मिले हैं. यानी पार्टी को मिलने वाले वोटों में करीब 25 फीसदी वृद्धि दर्ज की गई है. दूसरी ओर, पिछले चुनाव में यहां बीजेपी उम्मीदवार को 35.16 फीसदी वोट मिले थे जबकि अबकी पार्टी उम्मीदवार प्रियंका को 22.29 फीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा है.

सबसे खराब स्थिति रही सीपीएम उम्मीदवार श्रीजीव विश्वास की. उनको महज 3.56 फीसदी वोट ही मिल सके. हालांकि शुरुआती कई राउंड तक नोटा को मिले वोटों से भी पीछे चलने वाले श्रीजीव को इस बात का संतोष हो सकता है कि आखिर में उनके और नोट में पड़े वोटों के बीच करीब 27 सौ वोटों का अंतर रहा. बीते विधानसभा चुनाव में यहां लेफ्ट-कांग्रेस गठजोड़ के उम्मीदवार को 4.09 फीसदी यानी करीब एक हजार वोट ज्यादा मिले थे.

अब सवाल उठ रहा है कि वर्ष 2011 में सत्ता से बाहर होने वाली सीपीएम क्या बंगाल की राजनीति में पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है? पार्टी के वरिष्ठ नेता रबीन देब कहते हैं, "विधानसभा चुनाव में हमारा प्रदर्शन बेहद खराब रहा और खाता तक नहीं खुला था. अब छह महीने से भी कम समय में होने वाले उपचुनाव से पहले हमें संगठित होने का मौका नहीं मिल सका. लेकिन नतीजा इतना खराब होने की उम्मीद नहीं थी.” उनका आरोप है कि मुख्यमंत्री को जिताने के लिए पूरा सरकारी तंत्र मैदान में उतर गया था.

कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सांसद प्रदीप भट्टाचार्य कहते हैं, "सीपीएम की इतनी दुर्गति होगी, यह किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. अगर हमने उम्मीदवार खड़ा किया होता तो इससे कई गुना ज्यादा वोट मिले होते. शमशेरगंज और जंगीपुर के नतीजे इसका सबूत हैं. इससे पता चलता है कि हमारी पार्टी बंगाल की राजनीति में अब भी प्रासंगिक है.”

बीजेपी की अंतरकलह

भवानीपुर सीट पर उपचुनाव से पहले बीजेपी में आंतरिक कलह भी लगातार तेज हो रही थी. मतदान से ठीक पहले जहां आसनसोल के सांसद बाबुल सुप्रियो ने टीएमसी का दामन थाम लिया, वहीं अचानक प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा दिया गया. उनकी जगह बालूरघाट के सांसद सुकांत मजूमदार को यह जिम्मेदारी सौंपी गई. तेजी से बदले इस घटनाक्रम से साफ है कि बीजेपी कभी चुनौती देने की स्थिति में नहीं रही. चुनाव अभियान के दौरान भी केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पूरी और स्मृति ईरानी के अलावा कोई बड़ा नेता यहां नजर नहीं आया.

जहां तक प्रियंका टिबरेवाल को टिकट देने का सवाल है, पार्टी के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं था. पहले मिथुन चक्रवर्ती समेत कई बड़े नामों को भवानीपुर में मैदान में उतरने के लिए मनाया गया था. लेकिन सबने हाथ खड़े कर दिए थे. आखिर में पहले दो चुनाव हार चुकी प्रियंका को ही मैदान में उतारा गया. इलाके के जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए पार्टी को उम्मीद थी कि वे जीत भले नहीं सकें, ममता को खासी टक्कर दे सकती हैं. लेकिन नतीजों से साफ है कि पार्टी के तमाम समीकरण गड़बड़ा गए. हालांकि नतीजों के बाद अब पार्टी के नेता चुनावी धांधली के आरोप उठा रहे हैं. मतदान के दौरान पार्टी ने करीब दो दर्जन शिकायतें चुनाव आयोग को भेजी थीं. लेकिन आयोग ने निराधार बताते हुए उनको खारिज कर दिया था.

Bangladesch Mamta Bannerjee in Dhaka
कुछ हल्कों में ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का चेहरा माना जा रहा हैतस्वीर: Getty Images/AFP/M. Uz Zaman

विपक्ष का चेहरा

क्या भवानीपुर की भारी जीत ने ममता बनर्जी को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उनको विपक्षी राजनीति का सबसे अहम चेहरा बना दिया है. टीएमसी नेताओं के अलावा सपा नेता अखिलेश यादव तो कम से कम ऐसा ही मानते हैं. अखिलेश यादव ने जीत पर शुभकामनाएं देते हुए ममता को ही विपक्षी गठबंधन का चेहरा करार दिया है. एनसीपी नेता शरद पवार,तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन, झारखंड के हेमंत सोरेन और कांग्रेस के नेता कमलनाथ और आनंद शर्मा समेत दर्जनों नेताओं ने ममता को जीत की बधाई दी है.

टीएमसी के वरिष्ठ नेता फिरहाद हकीम कहते हैं, "ममता ने भवानीपुर की भारी जीत के साथ ही मोदी-विरोधी यात्रा शुरू कर दी है. हर तबके के लोगों ने ममता का समर्थन किया है. इसलिए अब उनके मोदी-विरोध का सबसे बड़ा चेहरा होने पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता.”

लेकिन बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार इससे सहमत नहीं है. वह कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का कोई मुकाबला नहीं है. इसलिए प्रधानमंत्री बनने का ममता का सपना महज सपना ही बन कर रह जाएगा.”

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