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फेसबुक के जरिए पुलिस तफ्तीश

१९ नवम्बर २०१२

जर्मनी के न्याय मंत्री सोशल मीडिया को पुलिस छानबीन में मददगार बनाने के तौर तरीके पर चर्चा कर रहे हैं. पुलिस महकमे ने पहले ही कुछ सफलताएं हासिल की हैं लेकिन आंकड़ों की सुरक्षा से जुड़ा विभाग चिंतित है.

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तस्वीर: Ana Soliz Landívar

जर्मन राज्य लोवर सैक्सनी की क्षेत्रीय पुलिस के फेसबुक पेज पर एक सादा संदेश पड़ा है, "आंद्रेया बी के हत्या की सीसीटीवी तस्वीरें मौजूद हैं. हनोवर पुलिस को तलाश है उस शख्स की जिसने उसके बैंक कार्ड का इस्तेमाल कर कैश मशीन से पैसे निकाले." इस संदेश के बाद एक अनुरोध किया गया है कि इस मामले में कोई जानकारी हो तो उसे फोन या ईमेल के जरिए भेजें. पुलिस की वेबसाइट पर मौजूद एक लिंक फेसबुक इस्तेमाल करने वालों को सीसीटीवी के उन तस्वीरों तक ले जा ती है जिसमें संदिग्ध को एटीएम के जरिए पैसे निकालते देखा जा सकता है.

तुरंत सबूत पाने का तरीका

लोवर सैक्सनी राज्य तहकीकात में फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों में सबसे आगे है. हेसेन की पुलिस भी सोशल मीडिया वेबसाइटों का इस्तेमाल कर रही है और जर्मनी के बाकी पुलिस अधिकारी भी जल्दी ही इसमें शामिल हो रहे हैं. प्रांतीय न्याय मंत्रियों को उम्मीद है कि नया तरीका अपराध के मामलों को जल्द सुलझाने में मददगार होगा. न्याय मंत्रियों की उम्मीद बेमानी नहीं लेकिन इसके बाद आंकड़ों की सुरक्षा के अधिकार को लेकर सवाल उठ रहे हैं और यह भी कि क्या कानून के लिहाज से यह उचित होगा.

सबसे पहले हनोवर के पुलिस विभाग ने 2011 में फेसबुक पेज बनाया. जून से लेकर अब तक लोवर सैक्सनी अपनी खोज में फेसबुक के साथ सहयोग कर रही है. और नया तरीका काफी कामयाब भी हुआ है. लोवर सैक्सनी के पुलिस प्रवक्ता के मुताबिक आंद्रेया बी के मामले में ही पुलिस को बहुत सारे सुराग मिले. पुलिस प्रवक्ता ने बताया, "फेसबुक के जरिए हम बहुत जल्दी बहुत सारे युवाओं और किशोरों तक पहुंच जाते हैं, गवाहों से मिली जानकारी पर हमें बहुत निर्भर करना पड़ता है."

Polizei vor einem Zaun
तस्वीर: AP

ज्यादा से ज्यादा लोगों के फेसबुक से जुड़ने के कारण पुलिस को मदद मिल रही है, उनका यह भी मानना है कि अपराध करने वालों में युवाओं की तादाद ज्यादा है. फेसबुक पर लोवर सैक्सनी पुलिस के पहले ही हजारों दोस्त बन चुके हैं और ये लोग पुलिस को उसकी तफ्तीश या तलाशी में जानकारी भेजते रहते हैं. पेज इस्तेमाल करने वाले पुलिस की वेबसाइट से जानकारियों को भी इसमें डालते रहते हैं. पुलिस प्रवक्ता के मुताबिक, "अब तक 10 अपराध के मामले हमने फेसबुक के जरिए सुलझाए हैं."

आंकड़ों की सुरक्षा

पुलिस इस मामले में भले ही उत्साह से भरी हो लेकिन आंकड़ों की सुरक्षा से जुड़े लोग आशंकित हैं. उनकी आलोचना झेलने के बाद लोवर सैक्सनी की पुलिस को फेसबुक से जुड़े तहकीकात में बदलाव करना पड़ा है. पहले किसी भी संदिग्ध के बारे में जानकारी सीधे फेसबुक पेज पर डाल दी जाती थी जिसका मतलब था कि यह पूरी जानकारी अमेरिकी सर्वर पर भी चली जाती थी. यह कानून के खिलाफ है.

राज्य के आंकड़ों की सुरक्षा विभाग के उपायुक्त राइनर हैमर के मुताबिक कोई भी जानकारी तभी डाली जा सकती है जबकि संबंधित व्यक्ति इसके लिए तैयार हो या फिर कानून साफ तौर पर इसकी इजाजत देता हो. हैमर ने बताया, "इस तरह की जानकारी कानूनी रूप से केवल जर्मनी और यूरोपीय संघ में ही डाली जा सकती है. अमेरिका या तीसरे किसी देश तक भेजने की मंजूरी केवल असाधारण मामलो में ही है. ऐसे मामले केवल राज्य या संघीय कानून से जुड़े ही हो सकते हैं. फेसबुक के जरिए पुलिस छानबीन इसमें साफ तौर पर नहीं है." हैमर ने डीडब्ल्यू को बताया कि संदिग्धों के बारे में कोई भी जानकारी लोवर सैक्सनी पुलिस के सर्वर तक ही सीमित कर दी गई है.

सैक्सनी के पुलिस प्रवक्ता का कहना है कि पुलिस को इस रूप में भी अब तक सफलता मिल रही है. हालांकि आंकड़ों की सुरक्षा विभाग के अधिकारी अभी भी आलोचना कर रहे हैं. उनका कहना है, "एक बार इंटरनेट पर जानकारी डाल देने के बाद उसे हटाया नहीं जा सकता. आप इसे अपने सर्वर से हटा सकते हैं लेकिन जो आंकड़े कॉपी कर लिए गए हैं उन्हें दोबारा हासिल करना मुश्किल है." अधिकारियों के मुताबिक इसका नुकसान यह है कि एक बार किसी अपराध के सिलसिले में किसी शख्स का नाम आ जाने पर हमेशा उसका नाम उस अपराध के साथ इंटरनेट की सर्च इंजन में आता रहेगा. ऐसे लोग हमेशा अपराधी के तौर पर पहचाने जाते रहेंगे. हाल ही में इसके कुछ उदाहरण देखने को भी मिले हैं.

हैमर को खासतौर से इस बात की चिंता है कि फेसबुक पर पहले से ही निजी जानकारियों को सार्वजनिक करने के आरोप लग रहे हैं. यहां से मिली जानकारियो का इस्तेमाल विज्ञापन कंपनियां कर रही हैं. हैमर का मानना है कि ऐसी वेबसाइट का इस्तेमाल कर सरकार नैतिक रूप से उलझन में फंस जाएगी. लोवर सैक्सनी की पुलिस इस बात को गंभीरता से समझती है लेकिन साथ ही अपराध के पीड़ितों को भी बचाना चाहती है. उनका कहना है, "हम मुर्गियों को चोरी में फेसबुक का इस्तेमाल नहीं करना चाहते, हम केवल अहम मामलों में ही इसका उपयोग करना चाहते हैं."

रिपोर्टः क्रिस्टीना रूथ/एनआर

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

German justice ministers are discussing how to use social media to help in police investigations. Some police departments have already successfully tried the approach - but data protection authorities are very concerned.

"+++ Murder of Andrea B. - CCTV pictures exist +++ the Hanover police are looking for a person who used the bank card of murder victim Andrea B. to withdraw money from a cash dispenser …"

The text, a sample post from the Facebook page of the regional police of Lower Saxony, is followed by the request that all relevant information be passed on by phone or e-mail. A link to the website of the police directs Facebook users to a page with the CCTV pictures of the suspect at the cash dispenser.

A quick way to find witnesses

The state of Lower Saxony is at the forefront of using Facebook to help in their investigations. Police in Hesse also use the social media site, and soon officers across Germany could be following suit. Regional justice ministers hope the new approach will help solve crimes, said Hesse Justice Minister Jörg-Uwe Hahn at a summit of the ministers last week, but the question of whether this practice is in line with data protection rights and the rule of law is still up for discussion.

The Hanover police department was the first to set up a Facebook page in 2011. Since June, Lower Saxony is centrally coordinating its searches via Facebook. And the new measure is proving to be a success, according to Frank Federau, press spokesman for the Lower Saxony police. In the case of Andrea B., for example, Federau said they received numerous clues from Facebook users.

"Through Facebook, we very quickly reach many teenagers and young people - and, especially in this age group, we depend heavily on information and clues from witnesses," he explained. And, as is the case with the majority of Facebook users, criminal offenders are also often young people.

Young people, in particular, can be reached via Facebook

The Facebook page of the Lower Saxony police has already several thousand "friends" who are all kept up to date on the police's current manhunts. The users of the page can also share information from the police website, comment, or "like" the page, which will make it visible to all their Facebook friends.

"We know that our system is widely accepted, and we often get information and tips from our users," said Federau. "We've already solved 10 crimes where the first hint came via Facebook."

Data protection issues

But while the police may be enthusiastic, data protectionists are skeptical. Their strong criticism has led the Lower Saxony police to modify its Facebook-aided investigations.In the past, information about the suspect was put directly on the Facebook page, which meant it was placed on a server in the US. This is against the law, explained Rainer Hämmer, deputy data protection commissioner of Lower Saxony. According to Hämmer, data is only allowed to be passed on when the person in question agrees or when the law explicitly permits it.

"Such data can only legally be passed on within Germany or the European Union. For the data to be passed on to third countries – like the US – this is only permitted in really exceptional cases. And those cases are put down in laws on the federal or the regional level. Police investigations via Facebook are clearly not mentioned here," Hämmer told DW. As a result, data on suspects is now restricted to the servers of the Lower Saxony police.

Federau says the police have so far seen success with the approach

But data protection authorities have further criticisms about the practice. "What is once on the Internet can't just be removed. You can delete it from your server, but there is no way that you can get back data that has been copied to some other servers," said Hämmer. Experts warn that this could endanger the reintegration of former offenders into society – on the web they would continue to be marked as criminals.

Moral concerns

Hämmer has concerns about Facebook in particular: the website is already under fire for a lack of privacy and its policy of handing out information to other companies for advertising purposes. Hämmer believes that it's morally dubious for the state to be using the website.

The Lower Saxony police force takes such concerns seriously, but it also seeks to protect the victims of crimes. Federau said anything that is posted is first given the green light by a judge, and comments posted on the page are continuously monitored to prevent misuse - such as, for instance, the mobbing of suspected offenders.

"With investigations using Facebook, you of course have to be very careful – it's only a means of last resort for us," said Federau. "We don't use Facebook if someone stole a chicken. We only do this in the case of significant crimes."

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