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बहुत “महंगी” पड़ी 2020 की प्राकृतिक विपदाएं

शिवप्रसाद जोशी
६ जनवरी २०२१

2020 में जलवायु परिवर्तन की वजह से 10 सबसे बड़ी मौसमी विपदाओं में से दो भारत में हुई थीं जिनसे अरबों रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा नुकसान झेलने वाले देशों में भारत भी आता है. 

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Zyklon Amphan trifft Indien und Bangladesch
तस्वीर: Imago Images/Zuma/KM Asad

ब्रिटेन की स्वयंसेवी संस्था क्रिश्चियन एड की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक पूरी दुनिया में जो दस सबसे बड़ी कुदरती आफतें आई थीं वे मानव जाति को बहुत "महंगी” भी पड़ी हैं. उनसे जानमाल के करीब 150 अरब डॉलर के नुकसान का अंदाजा लगाया गया है. इन विपदाओं की वजह से साढ़े तीन करोड़ लोगों की जानें गईं और एक करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हुए.

2020 को जलवायु ब्रेकडाउन का साल कहने वाली इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे बुरी मार गरीब देशों पर पड़ी है जहां क्षतिग्रस्त या नष्ट हुए जानमाल का कोई बीमा भी नहीं था. और ये मार चौतरफा पड़ी है, एशियाई भूभाग में आई बाढ़ हो, अफ्रीका में टिड्डियों का आतंक हो या यूरोप और अमेरिका में आए भयंकर तूफान.

जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान में वृद्धि का दीर्घकालीन प्रभाव भी इस नुकसान में साफ झलकता है. ऐसा नहीं है कि मानवनिर्मित ग्लोबल वॉर्मिंग से पहले कुदरती आफतें इंसान पर नहीं टूटी हैं लेकिन एक सदी से अधिक के तापमान के डाटा और दशकों के सैटेलाइट डाटा के जरिए हासिल हुए चक्रवात और समुद्र के स्तर में वृद्धि के आंकड़ों के आधार पर कहा जा सका है कि धरती तप रही है और विपदाएं बढ़ रही हैं- अतिवृष्टि और तूफान से लेकर लू और जंगल की आग तक, और डायबिटीज और हृदयरोग जैसी बीमारियों से लेकर वैश्विक महामारी तक.

अम्फान की तबाही

2020 में सबसे ज़्यादा "महंगी” साबित हुई 10 कुदरती आफतों में से दो का कहर भारत के विभिन्न हिस्सों पर टूटा था. मई 2020 में अम्फान नाम का सुपर साइक्लोन इस वैश्विक सूची में चौथे और जून से अक्टूबर के दौरान आई बाढ़ पांचवे नंबर पर है. बंगाल की खाड़ी में उठने वाले अम्फान ने 270 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार वाली हवाओं के साथ भारत और बांग्लादेश में तबाही मचाई थी. दोनों देशों को करीब 95 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. कम से कम 128 लोग मारे गए थे और करीब पांच करोड़ लोग विस्थापित हो गए थे.

जून और अक्टूबर के बीच असम से लेकर केरल तक, मॉनसून से हुई अत्यधिक बारिश के चलते बाढ़ और भूस्खलन की काफी घटनाएं दर्ज की गई थीं. रिपोर्ट के मुताबिक इन बाढ़ों से भारत को करीब 73 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था और दो हजार लोगों की मौत हो गई थी.

बात सिर्फ इतने बड़े आर्थिक नुकसान की नहीं है, बड़ी चिंता ये है कि ऐसी आफतें आने वाले समय में आवृत्ति और शक्ति के लिहाज से और तीव्र हो सकती हैं. जलवायु परिवर्तन ऐसी घटनाओं के लिए कैटालिस्ट की तरह काम करता आ रहा है. नवंबर 2021 में ग्लासगो में अगला जलवायु सम्मेलन होना है. 2015 के पेरिस समझौते में वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को दो डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और 2030 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन आधा करने का लक्ष्य रखा गया था. इसके तहत हर साल उत्सर्जन में करीब साढ़े सात प्रतिशत कटौती की जानी है. लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक लक्ष्य कम होने के बजाय दूर होता जा रहा है.

कोविड-19 महामारी से त्रस्त दुनिया में इन कुदरती आफतों से हुई तबाहियों ने गरीबों को और पीछे धकेला है. हिंद महासागर क्षेत्र में वैश्विक तापमान बढ़ने से साइक्लोन की ताकत भी बढ़ती जा रही है और नुकसान पहुंचाने की क्षमता भी. अम्फान के अलावा भारत पिछले साल जून में एक और शक्तिशाली साइक्लोन- निसर्ग के वार को झेल चुका है.

पर्यावरण से जुड़ी लड़ाइयां और चिंताएं

वैज्ञानिकों का मानना है कि 2020 अतिरेक रूप से गरम साल था, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में 30 से 33 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किए गए थे. जलवायु परिवर्तन कितना बड़ा खतरा बनता जा रहा है इसका एक अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पिछले साल के पहले छह महीनों में ही 200 से अधिक प्राकृतिक विपदाएं आ चुकी थीं. ये आंकड़ा 21वीं सदी के 2000-2019 की अवधि में 185 विपदाओं के औसत से ऊपर है. 2019 के मुकाबले 2020 में कुदरती आफतों की घटनाओं में पहले छह महीने की अवधि में 27 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.

पर्यावरण से जुड़ी लड़ाइयों और चिंताओं को इसीलिए खारिज करने की मूर्खता नहीं की जा सकती. परियोजनाएं और निर्माण जरूरी हैं लेकिन वे समावेशी और सुचिंतित विकास के पैमानों पर होने चाहिए ना कि अंधाधुंध! उत्तराखंड में चार धाम सड़क परियोजना को लेकर विवाद थमा नहीं है, इसी तरह सुप्रीम कोर्ट की बहुमत से हरी झंडी के बावजूद सरकार के सेंट्रल विस्ता प्लैन को लेकर पर्यावरणवादियों और अन्य एक्टिविस्टों में शंकाएं और सवाल बने हुए हैं. वैसे एक राहत की बात ये है कि भारत हरित ऊर्जा अभियान को भी जोरशोर से चलाता दिख रहा है.

गोवा में कुदरत को बचाती एक युवा वैज्ञानिक

कुछ सप्ताह पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के कच्छ में 30 हजार मेगावॉट बिजली उत्पादन वाले और उनके मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े पुनर्चक्रित ऊर्जा पार्क का शिलान्यास किया था. खबरों के मुताबिक ये विशाल प्रोजेक्ट एक लाख 80 हजार एकड़ यानी सिंगापुर के आकार जितने भूभाग में फैला हुआ है. इसमें सौर पैनल, सौर ऊर्जा भंडारण यूनिट और पवनचक्कियां लगाई जाएंगी. दावा है कि इस प्रोजेक्ट से हर साल भारत कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जन में पांच करोड़ टन की कटौती करने में सफल हो सकेगा. ये परियोजना भारत के उस महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य का हिस्सा है जिसके तहत 2022 तक 175 गीगावॉट और 2030 तक 450 गीगावॉट पुनर्चक्रित ऊर्जा का उत्पादन किया जाना है. इससे हर साल 20 अरब डॉलर के बिजनेस अवसर भी बनने की बड़ी उम्मीद भी जताई गई है.

सौर ऊर्जा के अलावा गैस पाइपलाइन के जरिए भारत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोशिशों में जुटा है. सरकार की योजना अगले चार से छह साल में देश में 16 हजार किलोमीटर लंबी प्राकृतिक गैस पाइपलाइन बिछाकर चालू करने की योजना भी है. पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने 450 किलोमीटर लंबी कोच्चि-मंगलुरू गैस पाइपलाइन का उद्घाटन किया था. भारत के प्राथमिक ऊर्जा स्रोतो में गैस का हिस्सा अभी करीब छह प्रतिशत है जबकि वैश्विक औसत 24 प्रतिशत है. 2030 तक भारत इस हिस्से को 15 प्रतिशत करना चाहता है. हरित ऊर्जा का दायरा बढ़ाना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपने कार्बन फुटप्रिंट में 2005 के स्तरों से 2030 तक 33-35 प्रतिशत कटौती करने का लक्ष्य रखा है.

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