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समाज

गर्भपात कराने पर मिली जेल की सजा

२३ जुलाई २०१८

इंडोनेशिया में एक 15 साल की लड़की और उसके 18 साल के भाई को कैद की सजा सुनाई गई है. भाई का जुर्म था बहन का बलात्कार और बहन का जुर्म भ्रूण हत्या.

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Symbolbild - Ehrenmord - Pakistan
तस्वीर: picture-alliance/dpa/Keystone USA Falkenberg

यह मामला इंडोनेशिया के सुमात्रा का है. भाई कई महीनों तक बहन का बलात्कार करता रहा और आखिरकार वह गर्भवती हो गई. पुलिस के अनुसार सितंबर 2017 से उसका कम से कम आठ बार बलात्कार किया गया. बात घर से बाहर ना निकले, ऐसा सोचते हुए घरवालों ने घर पर ही बच्ची का गर्भपात कराया. लेकिन इंडोनेशिया में गर्भपात पर रोक है. हालांकि अगर महिला की जान खतरे में हो या फिर प्रेग्नेंसी की वजह बलात्कार हो, तो ऐसे में गर्भपात कराया जा सकता है. लेकिन इसके लिए भी अनुमति सिर्फ शुरुआती छह हफ्तों तक ही मिलती है और गर्भपात केवल डॉक्टर ही कर सकते हैं. इसके बाद गर्भपात को जुर्म माना जाता है और इसके लिए सजा भी होती है. ऐसा ही इस 15 साल की लड़की के साथ भी हुआ.

यह बच्ची सुमात्रा के जाम्बी प्रांत की रहने वाली है. यहां मई के महीने में गांव वालों को खेतों में एक सर कटा भ्रूण मिला. बात पुलिस तक पहुंची और छानबीन के बाद जून में दोनों भाई बहन को हिरासत में ले लिया गया. मामला अदालत में पहुंचा जहां लड़की के लिए एक साल और लड़के के लिए सात साल की कैद की सजा मांगी गई. 19 जुलाई को जज ने इस मामले में फैसला सुनाया और भाई को दो साल जबकि बहन को छह महीने की सजा सुनाई.

इसके अलावा दोनों को रिहैबिटिलेशन सेंटर भी भेजा जा रहा है. साथ ही मां को भी दोषी पाया गया है क्योंकि उसने बच्चा गिराने में मदद की. मां पर मुकदमा चल रहा है. उसका कहना है कि बेटे के ही कारण बेटी का गर्भवती होना परिवार के लिए शर्मिंदगी भरा था, इसलिए मजबूरन उसे अपनी बेटी का गर्भपात कराना पड़ा. गांव का नाम बदनाम करने के आरोप में गांव वालों ने भाई और बहन दोनों पर ही वहां आने से रोक लगा दी है.

मानवाधिकार संगठन लंबे समय से इंडोनेशिया के गर्भपात कानून की निंदा करते रहे हैं. अब इस मामले के बाद वे एक बार फिर बच्ची को मिली सजा का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस तरह से बलात्कार पीड़ित को दोहरी सजा मिलती है. जकार्ता स्थित इंस्टीट्यूट फॉर क्रिमिनल जस्टिस रिफॉर्म के कार्यकारी निदेशक अंगारा ने समाचार एजेंसी डीपीए से इस बारे में कहा, "उन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए, बजाए इसके कि वे हमारी न्याय प्रणाली के ही शिकार हो जाएं."

आईबी/एमजे (डीपीए, एएफपी)

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