1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें

रिटेल रुका, संसद चली

७ दिसम्बर २०११

भारत सरकार ने मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर में एफडीआई की सीमा बढ़ाने के फैसले को निलंबित कर दिया है. वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने यह एलान करते हुए कहा कि सब साझेदारों में सहमति होने के बाद ही इसे आगे बढ़ाया जाएगा.

https://p.dw.com/p/13O36
तस्वीर: AP

बुधवार को एक सर्वदलीय बैठक के बाद वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा में कहा कि सरकार संसद में एक प्रस्ताव रखेगी जिसके तहत, "खुदरा क्षेत्र में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को तब तक निलंबित किया जाएगा जब तक कि इस फैसले से जुड़े सारे हिस्सेदारों में सहमति नहीं बन जाती."

सत्ताधारी गठबंधन यूपीए में शामिल वे पार्टियां, जो रिटेल सेक्टर में एफडीआई के खिलाफ हैं, ने वित्त मंत्री के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है. सीपीआई नेता गुरुदास दासगुप्ता ने बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा, "यह खुदरा बाजार में एफडीआई को लागू करने के फैसले को वापस लेने के बराबर है और हम संसद के काम को आगे बढ़ने देंगे. हम सरकार से भी ज्यादा चाहते हैं कि संसद का काम चलता रहे." दासगुप्ता के मुताबिक सरकार अपने "अभिमान" की वजह से नहीं कह रही है कि उसने इस फैसले को वापस ले लिया है.

Pranab Mukherjee
वित्त मंत्री ने किया एलानतस्वीर: UNI

हालांकि संसदीय मामलों के राज्य मंत्री राजीव शुक्ला ने कहा है कि सरकार विपक्ष के सामने झुकी नहीं है. उन्होंने कहा, "एक लोकतंत्र में विचार विमर्श करना जरूरी है इसलिए सरकार ने विपक्ष को इस बैठक के लिए बुलाया. सारी पार्टियां, टीएमसी, बीजेपी और वामपंथी दलों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया है."

लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के लिए यह एक बड़ा झटका है. कुछ दो ही हफ्ते पहले भारत सरकार ने एलान किया था कि मल्टी ब्रांड रिटेल सेक्टर में 51 प्रतिशत विदेशी निवेश को अनुमति दी जाएगी. इस फैसले के तहत अंतरराष्ट्रीय सुपरमार्केट ब्रांड जैसे वॉलमार्ट और टेस्कोज को भारतीय बाजारों में आने का मौका मिलता. लेकिन कई ट्रेड यूनियनों, सत्ताधारी गठबंधन की पार्टियों और विपक्षी पार्टियों ने इस पर भारी आपत्ति जताई है. जबरदस्त विवाद के बाद संसद का कामकाज करीब 10 दिन ठप रहा.

सरकार और कई वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि भारत में एक आधुनिक रिटेल सेक्टर से ग्राहकों को फायदा होगा. नई नौकरियां पैदा होंगी और किसानों की फसल बेकार नहीं जाएगी. वहीं इस फैसले के आलोचक मानते हैं कि छोटे व्यापारियों और फल-सब्जी बेचने वालों को इससे बहुत बड़ा नुकसान हो सकता है क्योंकि ग्राहक किराने की दुकान के बजाए सुपरमार्केट जाने लगेंगे.

रिपोर्टः एजेंसियां/एमजी

संपादनः ओ सिंह

इस विषय पर और जानकारी को स्किप करें

इस विषय पर और जानकारी