मानवाधिकारों का दोहरा खेल

अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए 54 देशों में गुप्त तरीकों से संदिग्धों को दबोचती है, उन्हें कहां से कहां पहुंचा देती है. दुनिया भर में इन अड्डों के जरिए अमेरिका और संबंधित देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों को छिन्न भिन्न कर रहे हैं.

न्यूयॉर्क स्थित मानवाधिकार संगठन ओपन सोसाइटी जस्टिस इनिशिएटिव की रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के दुश्मन समझे जाने वाले ईरान में भी कुछ ऐसे तत्व हैं जो सीआईए की मदद करते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक तेहरान ने 13 लोगों को अफगानिस्तान भेजा, जहां से उन्हें अमेरिका ले जाया गया. विश्वस्त सरकारी अधिकारी के हवाले से तैयार रिपोर्ट को 'ग्लोबल टॉर्चर' यानी वैश्विक यातना नाम दिया है.

कौन कौन हैं देश

रिपोर्ट में सीआईए की मदद करने वाले जिन 54 देशों या जगहों का जिक्र किया गया है. इनमें अफगानिस्तान, अल्बानिया, अल्जीरिया, ऑस्ट्रेलिया, अजरबैजान, बेल्जियम, बॉस्निया हर्जगोविना, कनाडा, क्रोएशिया, साइप्रस, चेक गणराज्य, डेनमार्क, जिबूती, मिस्र, इथियोपिया, फिनलैंड, जाम्बिया, जॉर्जिया, जर्मनी, ग्रीस, हॉन्ग कॉन्ग, आइसलैंड, इंडोनेशिया, ईरान, आयरलैंड, इटली, जॉर्डन, केन्या, लीबिया, लिथुएनिया, मासेडोनिया, मलावी, मलेशिया, मॉरिटानिया, मोरक्को, पाकिस्तान, पोलैंड, पुर्तगाल, रोमानिया, सऊदी अरब, सोमालिया, दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, श्रीलंका, स्वीडन, सीरिया, थाइलैंड, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात, यूके, उज्बेकिस्तान, यमन और जिम्बाब्वे हैं.

डाइऐन फाइनश्टाइन और डॉन ब्रेनन

इन देशों या जगहों में सीआईए या तो सरकार या कुछ स्थानीय गुटों के साथ मिलकर संदिग्धों का अपहरण करती है. उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता है या वहीं गैरकानूनी ढंग से हिरासत में रखकर संदिग्धों से पूछताछ होती है. जर्मनी और डेनमार्क जैसे देशों ने सीआईए को अपने वायुक्षेत्र और हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने की छूट दी है तो रोमानिया और पोलैंड जैसे देशों में सीआईए के गुप्त हिरासत केंद्र चलते हैं.

रिपोर्ट में सीआईए के हरकतों के लिए सीधे तौर पर अमेरिकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया है, "यातना, गोपनीय हिरासत और असामान्य प्रक्रिया वाले दुर्व्यवहारों में शामिल होने की वजह से अमेरिकी सरकार ने घरेलू और अतंरराष्ट्रीय कानून तोड़े हैं." अन्य देशों की सरकारों को सीधे तौर पर मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोपी कहा गया है.

एमनेस्टी इंटरनेशनल जर्मनी की यूरोप और मध्य एशिया प्रभारी मारी फोनमेनडोर्फ ने डॉयचे वेले से कहा, "इन मामलों में एक नहीं कई मौलिक नियम तोड़े जाते हैं. संदिग्धों को उठा लिया जाता है, उनके परिवार को सूचित भी नहीं किया जाता. कोई सुनवाई नहीं होती, पीड़ितों को कोई मुआवजा नहीं दिया जाता. ये एक नहीं कई कानून हैं जो कई चरणों में तोड़े जाते हैं."

सीआईए की हरकतें

ओपन सोसाइटी जस्टिस इनिशिएटिव ने रिपोर्ट में 136 ऐसे लोगों का विस्तार से जिक्र किया है, जिन्हें सीआईए ने खुफिया तरीके से बंदी बनाया. इनमें कुछ को पाकिस्तान से, कुछ को सीरिया से और बाकियों को अलग अलग देशों से उठाया गया. कुछ लोगों का तो हिरासत में लिए जाने के बाद से कोई अता पता नहीं है.

सीआईए के इस तरह के अड्डों को ब्लैक साइट्स कहा जाता है. अमेरिका में 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमलों के बाद सीआईए ने इस तरह की कारगुजारियां शुरू कीं. हिरासत के दौरान दी जाने वाली यातनाओं का जिक्र करते हुए कहा गया है कि संदिग्धों को थप्पड़ मारना, नंगा करना और सोने न देना, ये आम तरीके हैं.

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश जूनियर ने तो वॉटरबोर्डिंग की भी अनुमति दी. सीआईए के पूर्व निदेशक माइकल हेडेन स्वीकार कर चुके हैं कि तीन बंदियों को वॉटरबोर्डिंग यातना दी गई. सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक वॉटरबोर्डिंग में बंधक को एक बेंच पर बांधा जाता है, उसके पैर सिर के ऊपर होते हैं. मुंह कपड़े से ढंका जाता है और फिर उस पर 20 से 40 सेकेंड तक पानी डाला जाता है. ऐसे में बंधक को दम घुटने और डूबने का एक साथ अनुभव होता है.

ग्वांतानामो में कैंप डेल्टा

ऐसे आरोप अकेले अमेरिका पर नहीं लग रहे हैं. ईराक में तैनात ब्रिटिश फौजों के ऊपर भी सैकड़ों मामलों में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लग रहे है. कई आरोप तो अपराध साबित भी हो रहे हैं.

सीआईए की मनमर्जी

2009 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने गुआंतानामो बे जेल बंद करने का आदेश दिया. ओबामा ने सीआईए के खुफिया अड्डों पर भी नकेल कसने की बात कही. ओपन सोसाइटी जस्टिस इनिशिएटिव के मुताबिक राष्ट्रपति की बातों में कोई साफ व्याख्या नहीं थी, लिहाजा इसका फायदा उठाया गया.

अल शेख अल लिबी को हिरासत में लिए जाने का जिक्र करते हुए कहा गया है कि कैसे उसके हवाला से गलत जानकारियां लीक गई. गलत जानकारियों को सच की तरह पेश करते हुए कहा गया कि ईराक में अल कायदा के आतंकवादी रासायनिक और जैविक हथियारों की ट्रेनिंग ले रहे हैं. 2003 में इन्हीं गलत जानकारियों के आधार पर तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री कोलिन पावेल ने संयु्क्त राष्ट्र में ईराक के खिलाफ युद्ध छेड़ने की वकालत की.

दिसंबर 2012 में अमेरिकी संसद की खुफिया मामलों की विशेष समिति ने सीआईए के हिरासत और पूछताछ के तरीकों पर एक विस्तृत रिपोर्ट बनाने पर सहमति जताई. यह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई. हालांकि समिति की प्रमुख सीनेटर डाईऐन फेनश्टाइन ने सीआईए तौर तरीकों पर आपत्ति जाहिर करते हुए उन्हें गंभीर गलतियां करार दिया. उनके मुताबिक रिपोर्ट के बाद पूरे अमेरिका में इस बात पर बहस हो सकती है कि हर स्तर पर ऐसे तरीकों को रोका जाए.

दोहरे मापदंड

ओपन सोसाइटी जस्टिस इनीशिएटिव की अमृत सिंह

पश्चिमी देश अक्सर बाकी दुनिया को मानवाधिकारों की घुट्टी पिलाते हैं, लेकिन ग्लोबल टॉर्चर रिपोर्ट बता रही हैं आम इंसान के अधिकार कुचलने में पश्चिमी देश भी पीछे नहीं. एमनेस्टी इंटरनेशनल जर्मनी की मारी फोनमेडोर्फ कहती हैं, "अमेरिका में जारी हुई रिपोर्ट में हमारे लिए कोई चौंकाने वाली बात नहीं हैं. हम लंबे समय से इन मुद्दों को जानते और उठाते रहे हैं. हम सरकारों से मांग कर रहे हैं वे मानवाधिकारों का सम्मान करें."

मारी से जब यह पूछा गया कि क्या मनावाधिकारों पर पश्चिम के मापदंड दोहरे हैं तो उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि जर्मनी और दूसरे यूरोपीय देश जब बाकी देशों में मानवाधिकार की बात करते हैं तो उन्हें अपने यहां हो रहे उल्लंघन को भी देखना चाहिए. दिक्कत यह है कि कोई भी देश या सरकार खुद को आरोपी की तरह नहीं देखना चाहती, लेकिन यह सही नजरिया नहीं है. सामाधान यही है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन न किया जाए."

आतंकवाद और मानवाधिकार

अमेरिका में 9/11 के आतंकवादी हमलों ने पूरे पश्चिमी जगत को हिला दिया. हमले की कड़ियां यूरोप और खास तौर पर जर्मनी से जुड़ती हुई अफगानिस्तान तक पहुंच गई. उसके बाद धीरे धीरे अरब जगत में फैला कट्टरपंथ नजर आने लगा. खुफिया एजेंसियां अक्सर यह दलील देती हैं कि हर बार कानूनी रास्ता अपनाया तो बहुत देर होगी. निगरानी के नए नए तरीके विकसित हो रहे हैं. ज्यादातर देशों में सरकारी एजेंसियां इंटरनेट, टेलीफोन और बैंक लेन देन के जरिए भी संदिग्धों पर नजर रख रही हैं. आतंकवाद का खतरा मानवाधिकारों के उल्लंघन की सबसे बड़ी आड़ बन जाता है. मारी कहती हैं, "मानवाधिकारों का ख्याल रखते हुए भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी जा सकती है." लेकिन कैसे, इसका ठोस जबाव फिलहाल मानवाधिकार संगठनों के पास भी नहीं है.

रिपोर्ट: ओंकार सिंह जनौटी

संपादन: मानसी गोपालकृष्णन

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