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अर्थव्यवस्थाबांग्लादेश

क्या श्रीलंका जैसे संकट की तरफ बढ़ रहा है बांग्लादेश?

२१ मई २०२२

श्रीलंका की तरह बांग्लादेश ने भी बड़े पैमाने पर परियोजनाओं के लिए विदेशी कर्ज लिए हैं. जानकारी इन परियोजनाओं को सफेद हाथी बताते हैं और कहते हैं कि श्रीलंका की आर्थिक स्थिति बांग्लादेश के लिए सबक हो सकती है.

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Bangladesch | Händler in Dhaka
श्रीलंका की तरह बांग्लादेश ने भी कई परियोजनाओं के लिए भारी-भरकम कर्ज ले रखे हैं.तस्वीर: Suvra Kanti Das/ABACA/picture alliance

पिछले कुछ महीनों में श्रीलंका आर्थिक संकट में बुरी तरह घिरा हुआ है. देश जरूरी सामान की घोर किल्लत से जूझ रहा है. भुगतान संतुलन के संकट के बीच पेट्रोल खत्म हो रहा है, दवाओं की किल्लत है और विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो रहा है. 

सरकार के खिलाफ जनाक्रोश से सड़कों पर आंदोलन भड़क उठे और राजनीतिक उथलपथल मच गई. इसके चलते प्रधानमंत्री महिन्दा राजपक्षे और उनकी कैबिनेट का इस्तीफा देना पड़ा. नये प्रधानमंत्री के रूप में रानिल विक्रमसिंघ ने सरकार की कमान संभाली है लेकिन हालात में कोई सुधार फिलहाल नहीं दिख रहा है. 

बांग्लादेश में कई लोगों को डर है कि देश को श्रीलंका जैसे हालात का सामना करना पड़ सकता है. व्यापार घाटा बढ़ रहा है और विदेशी कर्ज का बोझ भी.

बांग्लादेश ने वित्तीय वर्ष 2021-2022 के पहले नौ महीनों में 61.52 डॉलर (58.48 यूरो) कीमत के सामान का आयात किया था. पिछले साल इसी अवधि में किए आयात की तुलना में यह 43.9 फीसदी की बढ़ोत्तरी थी.

दूसरी तरफ निर्यात की गति धीमी रही और इसमें सिर्फ 32.9 फीसदी का इजाफा हुआ. प्रवासी बांग्लादेशियों का भेजा धन, जो कि विदेशी पूंजी का मुख्य स्रोत है, उसमें भी 2022 के पहले चार महीनों में पिछले साल से 20 फीसदी यानी सात अरब डॉलर की गिरावट आई.

 

Bangladesch | Waren für Bazar in Dhaka
प्रवासी बांग्लादेशियों द्वारा भेजा जाने वाला पैसा देश के विदशी मुद्रा कोष का अहम हिस्सा है, जो घट रहा है.तस्वीर: Sony Ramany/NurPhoto/picture alliance

'विदेशी मुद्रा भंडार खतरनाक स्तर तक गिरेगा'

बांग्लादेश के अर्थशास्त्री और चटगांव यूनिवर्सिटी में पूर्व प्रोफेसर मुइनुल इस्लाम को आशंका है कि व्यापार घाटा आने वाले वर्षों में बढ़ सकता है क्योंकि निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा तेज गति से होने लगा है.

मुइनुल इस्लाम ने डीडब्लू को बताया, "हमारा आयात इस साल 85 अरब डॉलर का हो जाएगा. जबकि निर्यात 50 अरब डॉलर से ज्यादा नहीं होगा और 35 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को सिर्फ विदेशों से भेजे गए धन से नहीं भरा जा सकता है." वो कहते हैं, "इस साल हमें करीब 10 अरब डॉलर की कमी से जूझना पड़ेगा."

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मुइनुल इस्लाम ने इस ओर भी ध्यान दिलाया कि पिछले आठ महीनों में बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार 48 अरब डॉलर से गिरकर 42 अरब डॉलर पर आ गया है. उन्हें चिंता है कि आने वाले महीनों में वो और गिर सकता है. उसमें और चार अरब डॉलर की कमी आने की आशंका है.

इस्लाम ने जोर देकर कहा कि, "अगर निर्यात के विपरीत अधिक आयात का ट्रेंड बना रहा और हम विदेशों से भेजे गए धन से अंतराल को पाटने में नाकाम रहे, तो हमारा विदेशी मुद्रा भंडार अगले तीन से चार साल में खतरनाक स्तर तक लुढ़क जाएगा." उन्होंने इस बात की और ध्यान दिलाया कि ऐसा हुआ तो अमेरिकी डॉलर के मुकाबले, राष्ट्रीय मुद्रा की कीमत और घट जाएगी.

'सफेद हाथी' परियोजनाओं के लिए भारी भरकम कर्ज?

श्रीलंका की तरह बांग्लादेश ने भी हाल के वर्षों में विशाल लेकिन व्यर्थ की परियोजनाओं के लिए विदेशी कर्ज लिया है. आलोचक इन्हें "सफेद हाथी" प्रोजेक्ट कहते हैं इसलिए कि वे ना सिर्फ महंगे हैं बल्कि कतई लाभहीन भी हैं यानी किसी काम के नहीं.

मुइनुल इस्लाम के मुताबिक जब कर्ज चुकाने का समय आएगा तो ये "गैरजरूरी प्रोजेक्ट” मुसीबत पैदा कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि, "महज 2400 मेगावॉट क्षमता वाले एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए, हमने रूस से 12 अरब डॉलर का कर्ज लिया है. हम 20 साल में वो कर्ज चुका सकते हैं लेकिन 2025 से, हर साल साढ़े 56 करोड़ डॉलर की किस्त भरनी होगी. इसलिए ये प्रोजेक्ट एक बहुत खराब सफेद हाथी प्रोजेक्ट है."

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इस्लाम का अनुमान है कि देश को कुल मिलाकर 2024 से विदेशी कर्ज वापसी की किस्त के रूप में प्रति वर्ष चार अरब डॉलर का भुगतान करना पड़ सकता है. वो कहते हैं, "मुझे डर है कि बांग्लादेश इस समय-सीमा में ये कर्ज नहीं चुका पाएगा क्योंकि इन मेगा प्रोजेक्टों से उतनी कमाई हो ही नहीं पाएगी."

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के ढाका कार्यालय में तैनात बांग्लादेशी अर्थशास्त्री नाजनीन अहमद का का कहना है कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि परियोजनाओं पर और खर्च ना हो और उन्हें पूरा करने में देरी ना की जाए.

वो कहती हैं, "हमें विशाल परियोजनाओं को सावधानी से पूरा करना होगा. उपेक्षा और भ्रष्टाचार के लिए कोई जगह नहीं है. वे परियोजनाएं नहीं अटकनी चाहिए ना ही उसके निर्धारित बजट में बढ़ोत्तरी होनी चाहिए. अगर हम समय पर उन्हें पूरा कर पाएं तभी हम कर्ज चुका पाएंगें."

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बेशुमार कीमतों की मार गरीबों पर

कर्ज और घाटे की समस्याओं को बढ़ाती है बुनियादी जरूरत की चीजों की कीमतों में वृद्धि. फरवरी के आखिरी दिनों में भड़के रूस-यूक्रेन युद्ध ने महंगाई को और विकराल बना दिया है. बांग्लादेश इस मामले में खासतौर पर असहाय रहा है क्योंकि वह खाद्य तेल, गेहूं और दूसरे खाद्य पदार्थों के अलावा ईंधन भी बड़ी मात्रा में आयात करता है. 

अहमद के मुताबिक इन चीजों की आसमान छूती कीमतों से गरीब लोग सबसे ज्यादा पीड़ित हैं. उनका कहना है कि, "सरकार को सस्ती दरों में उपभोक्ता सामान गरीबों को मुहैया कराना चाहिए. सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के तहत उन्हें अतिरिक्त वित्तीय सहायता भी दी जानी चाहिए."

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लेकिन वो अपने देश के भविष्य को लेकर आशावादी हैं. उनका कहना है कि कोविड महामारी की वजह से पस्त पड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था में नई जान आते ही मौजूदा आर्थिक सूचकों में सुधार आ सकता है.

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "कोविड की रिकवरी वाले चरण में हमने पूरी दुनिया में मुद्रास्फीति को देखा है. यूक्रेन युद्ध से उसमें और अनिश्चितता आई है. श्रीलंका के आर्थिक संकट ने भी डर बनाया है. फिर भी, अगले कुछ वर्षों में कुछ बड़ा नहीं हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था फिर से पटरी पर आ जाएगी."

हसीना की लोगों से किफायत बरतने की अपील

प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार ने खर्चों में कटौती के लिए कई कदम उठाए हैं और विदेशी मुद्रा भंडार को बचाए रखा है. सरकार ने अधिकारियों के विदेशी दौरे रद्द करने का फैसला किया है और उन परियोजनाओं को भी स्थगित किया है जो कम महत्त्व की हैं और जिनमें दूसरे देशों से आयात की जरूरत होती है.

शेख हसीना ने लोगों से भी अपील की है कि वे फिजूलखर्ची ना करें, और किफायत बरतें. बांग्लादेश के नियोजन मंत्री एमए मनन ने मंगलवार को ढाका में एक प्रेस कॉंफ्रेंस में कहा कि, "प्रधानमंत्री ने सरकारी अधिकारियों को खर्चों में संयम रखने का निर्देश दिया है. आज उन्होंने निजी सेक्टर और आम लोगों से भी किफायत बरतने की अपील की है."

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मुइनुल इस्लाम कहते हैं कि सरकार को आर्थिक प्रबंधन में अत्यधिक सावधानी बरतनी होगी. क्योंकि आसमान छूती कीमतों के चलते चौतरफा हाहाकार मचा है जो पहले से मौजूद राजनीतिक तनावों को और भड़का सकता है. "बांग्लादेश का पिछला चुनाव अच्छा नहीं रहा था. उसमे फर्जीवाड़ा हुआ था. अगले दो साल में फिर देश में आम चुनाव होंगे. लिहाजा राजनीतिक हालात तो वैसे भी तनावपूर्ण बनी रहेगी. ऊपर से आर्थिक अनिश्चितता, आग में घी का काम कर सकती है."

वैसे तो जानकार कोई फौरी आर्थिक संकट नहीं देखते हैं फिर भी वे मानते हैं कि सुशासन और वित्तीय प्रबंधन की दरकार तो है ही. यह सब हुआ तभी बांग्लादेश उस स्थिति में घिरने से बचा रह पाएगा जिसमें आज श्रीलंका फंसा हुआ है.

रिपोर्टः अराफतुल इस्लाम