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कार्टून से कटाक्ष जरूरीः असीम

२० सितम्बर २०१२

असीम त्रिवेदी बोलते हैं तो बोलते चले जाते हैं. जैसे उनके पास कहने को बहुत कुछ है, शायद उनके अंदर आग धधक रही है. राजद्रोह के आरोप में जेल से छूटकर कानपुर पहुंचे तो हीरो जैसा स्वागत हुआ. डॉयचे वेले से खास बातचीत.

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तस्वीर: DW

डॉयचे वेलेः अचानक बन गए सैलिब्रिटी के स्टेटस को कैसे ले रहे हैं.

असीम त्रिवेदीः अच्छा लग रहा है. अब मुझे एक बात समझ आ गई कि मैंने जो किया ठीक किया. हर तरफ लोग मेरे साथ नजर आ रहे हैं. मुंबई से दिल्ली आते समय विमान की एक पायलट ने मेरे साथ फोटो खिंचवाया. वह बोली, "बड़े बड़े मंत्री और नेता आते जाते रहते हैं कभी किसी के साथ फोटो खिंचवाने की इच्छा नहीं हुई, पर आपके साथ जी चाहा." मुझे ऐसा लग रहा है कि जैसे आर्मी में सम्मान मिलता है, वैसा मिला है. लगता है कि मैंने देश के लिए कुछ किया है.

Indien Cartoonist Aseem Trivedi
तस्वीर: AP

डॉयचे वेलेः विवादित कार्टून बनाने का विचार कब और कैसे आया. क्या थे वे हालात, कौन सा था वह लम्हा जब इस कार्टून ने जन्म लिया.

असीम त्रिवेदीः अन्ना का आंदोलन चल रहा था और सरकार ने भरोसा दिया था कि मजबूत लोकपाल लाएगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. वह निराशा की घड़ी थी. वर्तमान व्यवस्था से इतनी मायूसी हुई कि अंदर तक हिल गया. तभी सोचा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ एक पूरी कार्टून सीरीज बनाऊंगा. वह सब कुछ बताऊंगा जो ठीक नहीं है. प्रासंगिक नहीं है. सच्चाई को सामने लाया जाना चाहिए. एक अभियान के रूप में इसे आगे बढ़ाना चाहिए, तभी वो कार्टून बन गए.

डॉयचे वेलेः सरकार से निराशा है यह मौजूदा व्यवस्था से.

असीम त्रिवेदीः सरकारें तो आती जाती रहती हैं. कई राज्यों में अलग अलग पार्टियों की सरकार हैं, जो बदलती रहती हैं. कहां कुछ बदला. मौजूदा सिस्टम ही चौपट है. जब नेता जाति और धर्म के नाम पर जीतेंगे तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कैसे काम करेंगे. हमने भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है. हर जगह 100-200 रुपये में काम कराने की आदत पड़ गई है, इसे बदलना पड़ेगा.

डॉयचे वेलेः आप कार्टूनिस्ट कैसे बन गए? क्या घर में ऐसा माहौल था या कोई ट्रेनिंग ली.

असीम त्रिवेदीः अचानक ही बन गए. हाई स्कूल कर रहे थे तब अखबारों के कार्टून में दिलचस्पी बढ़ी. उसी दौरान कॉमिक्स भी बहुत पढ़ते थे. उन्होंने भी प्रेरित किया. तब तक कागज पर यूंही स्केच बनाने लगे थे. बात 2004 की है. इंटर करने के बाद आईआईटी की कोचिंग कर रहे थे कि लगा कुछ और करना चाहिए. एक साप्ताहिक अखबार निकालने की सोची लेकिन पैसे नहीं थे. कानपुर के ही एक अखबार में बात की तो कार्टून बनाने का मौका मिल गया. उस सीरीज का नाम मैंने ही सुझाया, "हास्यमेव जयते". मैंने यह शीर्षक आचार्य रजनीश के आश्रम से निकलने वाली पत्रिका ओशो टाइम्स से लिया था. बस चल पड़ा काम, फिर यहीं कानपुर के कई अखबारों में कार्टून बनाने लगा. फिर मुझे एक बड़े अखबार में पटना में नौकरी मिल गई. लेकिन जल्दी वह नौकरी छोड़ दी क्योंकि रिपोर्टर बताता था कि क्या बनाओ क्या न बनाओ. मुझे ठीक नहीं लगा. मैंने तय किया कि मैं इस तरह के इलेस्टेशन से अपने आपको बचाऊंगा.

डॉयचे वेलेः कैसे काम करेंगे आगे, क्या कार्यक्रम है भविष्य का.

Indien Festnahme Zeichner Aseem Trivedi
तस्वीर: AP

असीम त्रिवेदीः तय किया है कि जब तक फ्रीलांसर के तौर पर काम चलेगा, करूंगा. नौकरी नहीं करूंगा. कोई कान्ट्रैक्ट भी उतने का ही लूंगा, जिससे जीविका चलती रहे और यह समय बताएगा कि मै क्या करूंगा. क्योंकि ज्यादा चोट करने का समय है, ज्यादा लोगों तक पहुंचना जरूरी है.

डॉयचे वेलेः एक कार्टूनिस्ट की भूमिका के बारे में आप क्या सोचते हैं?

असीम त्रिवेदीः देखिए सीरिया और मिस्र में जो कुछ भी हुआ उसके पीछे कुछ कार्टूनिस्टों का बहुत बड़ा हाथ है. वहां के अली फरजंद जैसे कार्टूनिस्ट के तो असद सरकार ने हाथ ही काट लिए थे. जाहिर है कि उसका कारनामा बड़ा रहा होगा. अरब क्रांति का वह बहुत बड़ा प्रतीक बन चुका है.

डॉयचे वेलेः तो क्या भारत में भी इसी तरह कुछ करने का इरादा है.

असीम त्रिवेदीः देखिए यहां की स्थिति अलग है और सीमाएं भी. मेरा मानना है कि कार्टून को अखबारों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, जहां एक छोटे से कोने में उसे रख दिया जाता है. दिन पर दिन कार्टून छोटा होता रहा है. लेकिन जबसे सोशल मीडिया आया है तबसे स्कोप बहुत बढ़ गया है. हर एज ग्रुप के लोगों तक यह पहुंच रहा है. अब कार्टून अखबार का मोहताज नहीं रह गया है. इसे ऐसे स्थापित करें कि वह अपने आप में आवाज बन जाए क्योंकि उसमें बहुत ताकत है. और धारदार कार्टून बनाने होंगे.

डॉयचे वेलेः तो कैसा रहा आपका अब तक का कार्टून बनाने का सफर.

असीम त्रिवेदीः बहुत अच्छा, मैं खुश हूं कि मैंने जो किया उसे देश ने पसंद किया.

इंटरव्यूः सुहेल वहीद

संपादनः ए जमाल

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