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बायो फ्यूल से पहली कर्मशियल फ्लाइट आज

१५ जुलाई २०११

जर्मन एयरलाइन कंपनी लुफ्थांसा ऐतिहासिक उड़ान के लिए तैयार है. लुफ्थांसा आज बायो फ्यूल से पहली कर्मशियल फ्लाइट उड़ाएगा. यह पहला मौका है जब जैविक ईंधन का इस्तेमाल कर व्यावसायिक परीक्षण उड़ान भरी जा रही है.

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तस्वीर: picture-alliance/ dpa

शुक्रवार सुबह समुद्र के किनारे बसे जर्मन शहर हैम्बर्ग से जर्मनी के सबसे बड़े फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरी जाएगी. फ्लाइट LH 013 में जैविक ईंधन भरा जाएगा. लुफ्थांसा के मुताबिक जैविक केरोसिन के जरिए उड़ान भरने वाली यह दुनिया की पहली कर्मशियल टेस्ट फ्लाइट होगी.

फ्लाइट के लिए एयरबस A-321 विमान को चुना गया है. विमान हैम्बर्ग से फ्रैकफर्ट के बीच चार बार उड़ान भरेगा. दोनों शहरों की दूरी 450 किलोमीटर है. जोखिम की स्थिति को देखते हुए विमान में सामान्य ईंधन भी भरा जाएगा. उड़ान के दौरान एक इंजन अति ज्वलनशील केरोसिन से चलेगा और दूसरा बायो फ्यूल से. छह महीने तक लुफ्थांसा ऐसी टेस्ट फ्लाइट्स का संचालन करेगा.

टेस्ट फ्लाइट्स के बाद इंजनों पर बायो फ्यूल के असर को देखा जाएगा. कंपनी का कहना है, "छह महीने के भीतर कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में 1,500 टन की कमी आएगी." परीक्षण की लागत 65 लाख यूरो आएगी, इसमें से 25 लाख यूरो का खर्च जर्मन सरकार उठाएगी.

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परीक्षण के दौरान होगी इंजनों की जांचतस्वीर: picture alliance / dpa

फिलहाल जैविक केरोसिन भरने की सुविधा सिर्फ हैम्बर्ग में ही है, इसलिए विमान को ईँधन के लिए हैम्बर्ग ही आना होगा. विमानों के लिए यह बॉयो केरोसिन फिनलैंड की एक कंपनी ने तैयार किया है. बायो फ्यूल को पौधों और जानवरों की चर्बी के मिश्रण से बनाया गया है.

टेस्ट जैसा भी रहे लुफ्थांसा के प्रयोग को भविष्य के नए दरवाजे की तरह देखा जा रहा है. टेस्ट सफल रहा तो बहुत अच्छा, अगर कुछ कमियां निकलीं तो आगे बायो फ्यूल या इंजनों में बदलाव संभव है. हर दिन हजारों की संख्या में उड़ान भरने यात्री विमान पर्यावरण को खासा नुकसान पहुंचाते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक 2025 तक दुनिया भर की एयरलाइन कंपनियों का उत्सर्जन स्तर 1.5 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड प्रति वर्ष होगा. धरती से 8,000-12,000 मीटर की ऊंचाई पर होने वाला यह उत्सर्जन ओजोन परत और वायुमंडल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है.

रिपोर्ट: डीपीए/ओ सिंह

संपादन: आभा एम

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